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आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।

January 02, 2008

अंदाज अपना अपना

अंदाज अपना अपना


कल हमने अपनी एक सहेली को फ़ोन किया, नये वर्ष की शुभ कामनाएं देनी थीं, फ़ोन पर आते ही सहेली बोली, "टेल मी", लगा किसी ने हथौड़ा ही मार दिया हो, अगर उसके कहे का अंग्रेजी अनुवाद करुं और उसके वाक्य को पूरा करुं तो कहेगें " टेल मी, वॉह्ट केन आई डू फ़ोर यू"। कितना ठंडापन, मानो सहेली से नहीं मशीन से बात कर रहे हैं जो आज कल किसी भी बड़े दफ़्तर में फ़ोन करने पर आप का स्वागत करती हैं। सिर्फ़ कमी इतनी ही थी कि उसने ये नहीं कहा कि अगर नव वर्ष की शुभकामनाएं देनी हैं तो डायल वन, अगर कोई काम है तो डायल दो……॥ऐसी बात नहीं कि वो हमसे बात नहीं करना चाह्ती थी,इनफ़ेक्ट, ये हथौड़ा मारने के बाद( जिसका उसे एहसास भी नहीं था) वो काफ़ी देर तक मुझसे आत्मियता से बतियाती रहे, पर कहीं न कहीं हम आहत मह्सूस कर रहे थे।

दरअसल कसूर उसका नहीं था कसूर था भाषा का। मेरी सहेली दक्षिण भारतीय है और ज्यादातर अंग्रेजी ही में बात होती है, "टेल मी" कहना आम बात है, यही बात कोई मराठी में कहता तो कहता "बोला, काय महण्तात", मतलब बोलिए क्या बोलते हैं आप। इसमें अग्रेजी के जुम्ले से ज्यादा अपनत्व लगता है और हिन्दी भाषी फ़ोन पर कहता," कहिए, कैसे है आप?" वो और भी मीठा लगता है।

बात सिर्फ़ भाषा की हो ऐसा भी नहीं, बदलते वक्त के साथ जिन्दगी जीने के अंदाज बदल गये हैं, वक्त बचाने के लिए लोग स म स की भाषा में बात करने लग गये हैं , फ़िल्मों के नाम ही देख लिजिए, आप नव पीढ़ी को कहते सुनेगें डी डी ऐल जे(दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगें)/ के के के ज़ी(कभी खुशी कभी गम)/टी ज़े पी(तारे जमीं पर) देखने जा रहे हैं। पहले कोई फ़ोन करता था तो मन में जिज्ञासा होने के बावजूद पूछना अभद्र्ता लगती थी कि भई क्युं फ़ोन किया, इधर उधर की बातों के बाद वो पूछा जाता था वैसे कुछ काम था क्या? फ़ोन करने वाला अक्लमंद होता था तो जल्दी मुद्दे पर आ जाता था, एकदम मुद्दे पर आना भी रूड माना जाता था, अब ऐसे में आज कल का ये टेल मी गोली सा लगेगा ही। हम खुद को समझा रहे थे कि तुम तो पुरानी हो गयी हो, ओल्ड फ़ैशन्ड अब कहां ये सब शिष्टाचार निभाये जाते हैं, बदल डालो खुद को। आप इस पोस्ट की लंबाई से अंदाजा लगा सकते हैं कि हम नहीं बदले।

हिन्दी चिठ्ठाकारी ने बदलने नहीं दिया हमें। ब्लोगिंग का अपना एक संसार है, यहां अलग अलग प्रातों के लोग मिले,दोस्त बने, उनसे फ़ोन पर या चैट पर भी बात होती है। वहां हमें वही अपने पुराने (क्या उन्हें पुराना कहें?)शिष्टाचार मिले, जल्दी में भी लोग शिष्टाचार भूलते नहीं और हथौड़ा नहीं मारते। ऐसी तृप्ती मिलती है मानो कोई रिशतेदार घर आये हों और गप्पों के दौर चल रहे हों, सिर्फ़ चाय की कमी, वो हम पूरी कर लेते हैं।

मेरे सभी चिठ्ठाकार दोस्तों को नव वर्ष की शुभकामनाएं।

देखा कितनी देर लगा दी असली बात कहने में, मेरे बम्बई के दोस्त कहेगें इत्ती देर लगाओगी कहने में तो गाड़ी छूट जाएगी तुम टिकट खरीदती रह जाओगी, कोई बात नहीं हम दूसरी गाड़ी का इंतजार कर लेगें और तब तक अपने दोस्तों से और बतिया लेगें क्युं ठीक है न दोस्तों?
भाषा से ही जुड़े मेरे कुछ अनुभव कविताई रूप में ढालने की कौशिश की है
कितनी भन्नाई थी जब पहली बार आदर से 'बाई' कहलाई थी
दीदी के बदले स्नेह से 'ताई' कहलाई थी
तरसे ये कान कितने बरसों से
सुनने को झल्ली, पागल, ढ्क्कन,
जब बार बार ट्युबलाइट कहलाई थी
आलू,प्याज,छौंका, अरहर की दाल
बन गये कांदा, बटाटा और तुअर की दाल
जब हम कहें खुद को "हम"
अगलें बगलें झाकें लोग बाग
जब हम कहें "आप" तो छोटे समझें
ये है ताना या गुस्सा,
"तू" और "तुम" संबोधन से दोस्त लेते
दिल की घनिष्ट्ता नाप ,
शिकायत उनकी
अभी भी दिल में दूरी है
कैसे बताएं ये मेरे संस्कारों की मजबूरी है

December 28, 2007

गाजर मीठी है

गाजर मीठी है

1960 के दशक में बम्बई आने के बाद से और पिछले 25 सालों की नौकरी में शायद ही छुट्टियों में बाहर जाने का लुत्फ़ उठाया हो। कहते हैं सपनों में जीने का जो मजा है वो सपने साकार होने में शायद नहीं। सपने गधे के आगे टंगी गाजर के जैसे हैं जिन्हें पाने की आस में गधा चलता चला जाता है। पता नहीं गधा गाजर खाये तो उसे अच्छी लगे या नहीं। अगर उसे वो गाजर मिल जाये तो शायद सोचे अरे नाहक ही इतनी मेहनत की। खैर जो भी हो, अपनी हालत भी कुछ उस गधे जैसी ही थी। विनोद जी की एक कविता पढ़ी थी फ़ुरसतिया जी के ब्लोग पर, उसकी कुछ पक्तियां याद आती हैं जिन्हों ने हमारे दिल में घर बना लिया
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम-2
पिंजरे जैसी इस दुनिया में पंछी जैसे ही रहना है
भर पेट मिले दाना पानी, लेकिन मन ही मन दहना है
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम
जैसे तुम सोच रहे साथी वैसे आजाद नहीं हैं हम

आगे बढ़ने की कौशिश में, रिशते नाते सब छूट गये
तन को जितना गढ़ना चाहा, मन से उतना ही टूट गये
जैसे तुम सोच रहे साथी वैसे आबाद नहीं हैं हम
जैसे तुम सोच रहे साथी, ……………………………"


हमारी क्या हमारे माता पिता की भी वही हालत थी। इस भागती दौड़ती जिन्दगी में कभी कुछ फ़ुरसत के क्षण मिलते तो हमारे पिता अपने बचपन के किस्से सुनाते जिन्हें हम बड़े चाव से सुनते। कहानियां तो सभी घर में सुनायी जाती हैं और बच्चे बड़े चाव से सुनते हैं पर हमारे घर की कहानी में थोड़ा रोमांच था, थोड़ा दर्द्।

दरअसल हमारी दादी जी हमारे पिता(पहली संतान) को जन्म देते ही भगवान को प्यारी हो गयीं तो बाद में हमारे पिता का अपने ननिहाल से कोई संपर्क नहीं रहा।खैर वो कहानी फ़िर कभी, अभी तो हम बात कर रहे हैं अपने पिता के सपने की। उनकी बहुत इच्छा थी कि एक बार सपरिवार वैष्नो देवी के दर्शन कर सकें और लौटते हुए अपने ननिहाल ले जा सकें। एक बार वो गये भी पर हम साथ न जा सके। बस हम सब सपने ही देखते रह गये और पिता जी स्वर्ग सिधार गये और कुछ साल बाद माता जी भी पिता का ये सपना पूरा न होने का मलाल लिए चल दीं। माता का जाना हमें झक्झोर कर रख गया। हमने सब व्यस्तानों को किनारे करते हुए उसी साल माता के दर्शन का प्रोग्राम बना लिया। एक तरह से ये माता पिता को श्रद्धांजली देने जैसा था।

हमें इस बात का भी एह्सास न था कि माता का मंदिर कटड़ा में है जम्मु में नहीं। खैर माता के दर्शन कर लौटते वक्त हमने जम्मु के रास्ते लौटने का निश्चय किया। हमारे पिता का ननिहाल जम्मु में ही बसता है ऐसा सुना था उनसे। बचपन की सुनी उन कहानियों में से सिर्फ़ इतना याद था कि जम्मु में एक रघुनाथ का मंदिर है जिसके बाहर या नीचे उनके मामा की कैंटीन है या दुकान है(पता नहीं) और उनका सरनेम मनचंदा है। बस इतनी ही जानकारी के साथ हम उन्हें उस अनदेखे परिवार को अनजाने शहर में ढूंढने निकले। मन में ये भी उपापोह चल रही थी कि हम उनसे कभी मिले नहीं। उनमें से एक मामा जो शायद कश्मीर में रहते थे और साड़ियों की दुकान चलाते थे वो कभी बम्बई आये थे देखने की क्या बम्बई में दुकान खोली जा सकती है, जब कट्टरवादियों ने हिन्दुओं को कश्मीर से खदेड़ा था तब हम अपनी ससुराल में रहते थे तो उनसे मिलना न हो सका था।

खैर हॉटेल में सामान रख हम पहले रघुनाथ का मंदिर ढूंढने निकले वो तो आसानी से मिल गया काफ़ी प्रसिद्ध मंदिर है फ़िर हमने ढूंढना शुरु किया मंनचदा, कई दुकानों में पूछा कोई नहीं जानता था। मोबाइल से बम्बई अपने छोटे भाई को फ़ोन लगाने की कौशिश की, वो बरसों पहले हमारे पिता के साथ माता के मंदिर गया था, पर कश्मीर में तब सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मोबाइल काम न करते थे, सिर्फ़ एस टी डी बूथ से फ़ोन कर सकते थे, वो भी न लगा। दरअसल रघुनाथ मंदिर का जो चित्र हमने अपनी कल्पना में खींचा था ये उससे बिल्कुल अलग था। दो तीन बार आतंकवादी हमले होने के बाद मंदिर की सुरक्षा बढ़ा दी गयी थी और उसके नक्शे में कुछ फ़ेर बदल कर दी गयी थी।

पूछ्ते पाछ्ते किसी ने बताया कि मंदिर में जाने का एक रास्ता पीछे से भी है सोचा ये भी आजमां लें। काफ़ी लंबा रास्ता पार कर जब हम उस दरवाजे पर पहुंचे तो महिला संतरी खड़ी थी, भारी चैकिंग होती थी। उसके सवालों का क्या जवाब देते कि किससे मिलना है। किसी तरह अंदर पहुंच ही गये। बायें हाथ को मुड़ते ही एक लंबा सा गलियारा दिखा जिसके अंत में कैंटीन नुमा कमरा दिख रहा था। हिचकिचाते से कदमों से हमने वो गलियारा पार किया। शुक्र है उस समय वंहा कोई ग्राहक नहीं था। कांउटर पर बैठे आदमी को हमने धीरे से प्रश्नीली आवाज में पूछा
"मंनचदा?",
उसने आश्चर्य से भवें ऊपर उठाईं, हमने झिकझिकते हुए कहा

धड़कने हमारी राजधानी से भी तेज दौड़ रही थीं कि पता नहीं क्या कहें कहीं मनचंदा नहीं हुए तो, अपनी निराशा के बारे में हम सोचना भी नहीं चाहते थे। अचानक उस व्यक्ती के चहेरे पर मुस्कान खेल गयी हालांकि आश्चर्य अभी भी बना हुआ था। हमारा परिचय पाते पाते उन्होंने हमें अपने अंक में ले लिया और आखें बरबस भर आईं। पता चला वो हमारे पिता के बीच वाले मामा थे। बातों का दौर शुरु हुआ, हमने अपने पिता के ननिहाल का ब्यौरा अब ठीक से सुनना शुरु किया। इतने में उन्होंने किसी को फ़ोन किया और जल्द ही एक 35/40 के आस पास का व्यक्ती आ गया। पता चला वो हमारे पिता का ममेरा भाई है (बड़े मामा का लड़का) और हमें घर लिवा लाने के लिए उनकी माता जी का विशेष आग्रह है। मना करने का तो सवाल ही न था।

हम अपने पिता के सबसे बड़े मामा के घर पहुंचे। मामा जी तो अब नहीं थे पर मामी जी ने हमारा स्वागत किया, उनकी उस नन्द की पोती का जिन्हें उन्हों ने कभी देखा नहीं था जो उनके शादी कर के आने से पहले परलोक सिधार चुकी थीं। मेरे पिता के मामा के पोते और उनके बच्चे और हम अजीब सुखद मिलन था, सब एक दूसरे को जिन्दगी में पहली बार मिल रहे थे। मामी जी (जिन्हें अब सब दादी कह रहे थे), पतोहू बहुएं, बच्चे इतने खुश थे हमें देख कर की हम ब्यां नहीं कर सकते। मामी जी की पोती जो दंसवी की परिक्षा में बैठ्ने वाली थी बुआ बुआ कर के हमसे ऐसे बातें कर रही थी जैसे घर के आंगन में फ़ुदकती गौरया। मामी जी ने अपनी उम्र की मजबूरी को दरकिनार करते हुए दूसरे दिन हमें सब रिशतेदारों से मिलाया ये सफ़र उनके लिए इतना आसान न था। पर सब रिशतेदार ऐसे खुश थे और हैरान थे जैसे हम हैरी पॉटर की किताब में से निकल आये हों।

हम देख सकते थे कि इन सब के स्नेह में बिभोर होता देख मेरे पिता कितना तृप्त महसूस कर रहे होगें और मानो हमसे कह रहे हों देखा मैं न कहता था मेरे ननिहाल जैसा कोई नहीं । हाँ डैडी आप की ननिहाल जैसा सच में किसी का ननिहाल नहीं हो सकता। कभी कभी गाजर मीठी भी होती है, सिर्फ़ उसके पीछे भागिए मत रुक कर खा कर भी देख लिजिए।

December 27, 2007

पन्नालाल

आठ साल पहले घर से बाहर जाते हुए एक 17 /18 बरस का मासूम सा नौजवान गैरेज में बैठा दिखाई दिया। हमें देखते ही बड़ी तत्परता के साथ गेट खोलने आगे बढ़ लिया। अक्सर हमारे चौकीदार के मित्रगण उससे मिलने आते ही रहते थे और चौकीदार की ऐसे कामों में मदद भी करते रहते हैं । हम जल्दी में थे कोई ध्यान नहीं दिया। शाम को लौटे तो उसी नौजवान को एक शर्मीले से अभिवादन के साथ गेट खोलते पाया। पूछने पर पता चला वो नया चौकीदार नियुक्त हुआ है।

नाम है पन्नालाल देखने में सुन्दर, पतला पर स्वस्थ बदन का,अभी मसें भी न भीगी थीं। हमारे और ज्यादा पूछ्ने पर डरते डरते बताया -गांव झरोनिया, जिल्हा इलहाबाद, दसंवी फ़ैल, पिता किसान, चार भाई। इससे ज्यादा कुछ बताता तब तक हमारी सोसायटी का दूसरा चौकिदार उसे हमारी प्रश्नावली से बचा कर ले गया। दूसरे चौकीदार को हम कुछ कह न पाए, कैसे कहते, उनकी उम्र होगी लगभग पचास पचपन की, पूरा नाम तो हम भी भूल चुके हैं उन्हें हम बुलाते हैं तिवारी जी, पता चला वो यू पी से हैं और एम ए पास हैं हिन्दी में । गांव में कोई नौकरी का जुगाड़ नही हो सका तो शहर चले आये और कोई नौकरी न मिली तो चौकीदारी ही कर ली, इस बहाने किराए का मकान तो नहीं लेना पड़ेगा। अब दोनों पंप रूम में खाना बनाते हैं और वहीं गैरेज में सो लेते हैं। शुरुवात में आज से आठ साल पहले दोनों की पगार 1000 रुपये प्रति माह थी अब बड़ कर 3000 रुपये प्रति माह है।

हमने जब सुना कि तिवारी जी एम ए पास है और चौकीदारी कर रहे हैं तो मन रो उठा। हमने उनको सुझाया कि वो दूसरी जगह कोई और नौकरी क्युं नहीं तलाश करते, पर उनका कहना था कि हिन्दी को कौन पूछता है और उनके पास कोई अनुभव भी नहीं था और फ़िर दूसरी नौकरी में किराए पर खर्च कर जितना पैसा बचा पायेंगे अब भी उतना ही बचाते हैं। हमने सुझाया कि सारा दिन यूं ही ऊंधते रहने से अच्छा है वो कुछ बच्चों की ट्युशन ले लें। उनके पास कोई तर्क नहीं था हमारी बात काटने का, इस लिए देखते हैं कह कर टाल गये। उनकी ड्युटी लगती थी रात की लिहाजा वो दिन में सोते हुए नजर आते थे, पर लोगों को ये भी शिकायत थी कि वो रात को भी घोड़े बेच कर सोते हैं। एम ए पास होने के बावजूद अगर उन्हें कोई बाहर का काम दे दिया जाए तो उन्हें पिस्सु पड़ जाते थे। बाहर का काम जैसे पानी, बिजली का बिल भरना, सबके टेलिफ़ोन के, बिजली के बिल जमा कर एक साथ भर कर आना, सोसायटी के बैंक के काम निपटाने। बम्बई की दौड़ती भागती जिन्दगी में इन सब कामों के लिए हम लोग चौकीदारों पर काफ़ी निर्भर करते हैं।

इसके विपरीत पन्नालाल जो पहले बड़ा शर्मीला सा बच्चा लगता था अब काफ़ी कारगर सिद्ध हो रहा था। बाहर के काम वो चुटकियों में समझ जाता था और बड़ी मुस्तेदी से करता था। धीरे धीरे वो कई ग्रहणियों का मुंहलगा पसंदीदा चौकीदार बन गया। और क्युं न होता वो इतना महनती जो था , लोगों की सब्जी, ब्रेड, इत्यादी खरीदने से लेकर शाम को बच्चे संभालने तक का काम वो करता था। हर मर्ज की दवा है पन्नालाल्। आप को घर में काम करने वाली बाई चाहिए पन्नालाल को बोल दिजिए, शाम तक कई बाइयां आप के घर पहुंच जांएगी, ऊंची बिल्डिंगों में अक्सर मधुमक्खी के छ्त्ते की परेशानी आये दिन होती रहती है, आप के घर मधुमक्खी ने छ्त्ता बना लिया है, पर आप उसे जला कर अपनी दिवार का पेंट खराब नहीं करना चाहते अभी अभी तो करवाया था, पन्नालाल के पास उसका भी हल है-बेगॉन स्प्रे, आप के पास 200 गमले हैं जिनकी गुढ़ाई, निराई करनी है, पन्नालाल हाजिर है। आप के घर का दरवाजा हवा से बंद हो गया है और आप बाहर अटक गये हैं पन्नालाल को बुलाइए। कारें धोते तो अक्सर चौकीदार हर सोसायटी में आप को मिल जाएगें पर आश्चर्य तो हमें तब हुआ जब सात साल पहले हम अपनी कार को मन चाहे ढंग से पार्किंग में लगा नहीं पा रहे थे, और पन्नालाल आया और बोला मैं लगा देता हूँ। उसके आत्मविश्वास को देखते हुए हम न नहीं कर पाए न पूछ पाए गाड़ी चलानी आती है क्या? उसने गाड़ी इतनी बड़िया पार्क की हम पूछे बिना रह नहीं पाए। बड़ी लापरवाह नम्रता के साथ उसने बताया कि वो गांव में जीप चलाया करता था। उस समय तो ठीक से समझे नहीं पर बाद में पता चला कि वो वहां जीप से सवारियां ढोने का काम किया करता था । उसके बाद कई दिनों तक हमें इस बात का प्रलोभन रहता था कि गाड़ी पार्क करने के लिए उसे दे दें। वो भी खुशी खुशी करता था पर इस प्रलोभन पर काबू पाया ये सुच कर कि हम कब ठीक से पार्क करना सीखेंगे। लेकिन टायर पंक्चर हो जाए तो उसे बदलने की जिम्मेदारी अभी भी उसी की है।

अजी ये तो कुछ भी नहीं, अवाक तो हम उस दिन रह गये थे जब पन्नालाल एक दिन हमारे पास आया और बोला

"मैने सुना है आप दूसरा मकान खरीदना चाहती हैं?
हमने हंस कर कहा।
हां है कोई नजर में?
बोला " हां "


उस दिन हमें पता चला कि वो इस्टेट एजेंसी का साइड बिसनेस करता है। हमारे घर के पास तीन चार इंजीरियंग कॉलेज हैं और कई छात्र बाहर से पढ़ने आते हैं। इन कॉलेजों में होस्टेल नहीं हैं और छात्र कॉलेज के पास किराए के मकान तलाश करते है तो पन्नालाल और उसके गांव से आये और साथियों ने मिल कर बिन दुकान के ये धंधा शुरु कर लिया। जून के महीने में ये चौकीदार सारा सारा दिन गेट के पास खड़े पाए जाएंगे, छात्रों के झुंड जो दलाली देने से बचना चाह्ते हैं इन लोगों से पूछ्ते हैं कोई मकान मिलेगा और ये कम दलाली में उन्हें मकान दिला देते हैं। इसी तरह से किस सोसायटी में कौन सा मकान बिक रहा है सब खबर रहती है। अक्सर जिस बिल्डिंग में दलाल की दुकान होती है उसका चौकीदार भी इनका दोस्त होता है जैसे ही कोई ग्राहक दलाल की दुकान से निकला ये उसे घेर घार कर कम दलाली में मकान दिलाने की कौशिश करते है।

पन्नालाल अपने हिसाब का बड़ा पक्का है, बिना पैसे लिए वो कोई काम नहीं करता, अगर उसकी लाई हुई बाई आपने रक्खी तो वो बाई से कमीशन लेता है काम दिलाने का, अगर आपने उसे नीचे से गुजरते ठेले वाले को रोकने को कहा तो जो कुछ भी खरीदो उसे नजराना देना पड़ेगा। है तो दसवीं फ़ैल पर अग्रेजी काफ़ी समझ लेता है। ऊपर लिखे सब काम वो पैसे ले कर ही करता है।

पन्नालाल की एक आदत हमें बहुत खराब लगती है वो अपने काम से काम नहीं रखता, बिल्डिंग में सबके घर में क्या चल रहा है उसे पूरी जानकारी रहती है। एक दिन जब हमारी डाक आयी तो हम उसके नाम का खत अपने पते पर देख कर चौंक गये। पता लगा कि हमारा इन्सयौरेंस का काम जो एंजेट देखता है उस पर पन्नालाल की कई दिन से नजर थी। एक दिन जिज्ञासावश उसने उस एंजेट को नीचे घेर लिया पूछ्ने के लिए वो क्युं आता है? हमारा एंजेट भी इलाहाबादी, तो साहब उसने इसको इंस्यौरेंस के बारे में जानकारी दी। अब इनके मन में भी आया की एक पॉलिसी ली जाए, समस्या सिर्फ़ मकान का पता किसका दें वो थी सो हमसे पूछे बिना हमारे पते पर पॉलिसी ले ली गयी, सोसायटी के सेक्रेटरी के पते पर बैंक एकाउंट खोला गया। गुस्सा तो हमें बहुत आया लेकिन उसकी अपनी जिन्दगी संवारने की ललक को देखते हुए हमारा गुस्सा उड़नछू हो गया। ये एक आदमी था जो अपने सपने साकार करने के लिए किसी बाधा को बीच में न आने देता था और एक बार मन में कुछ निश्चय कर लिया तो फ़ुर्ती से आगे बड़ता था।

एक दिन हम रात को लौटे तो देखा ये महाराज आराम से कुर्सी पर पांव फ़ैलाए गैरेज में टी वी देख रहे हैं। टी वी-- कई प्रश्न दिमाग में कौंध गये। पूछ्ने पर पता चला उसने खुद खरीदा है शायद सेकेंड हैंड, ब्लैक एंड वाइट, पर केबल कनेक्शन कहां से लिया, ये गुत्थी मैं आज तक नहीं सुलझा पायी। उसकी सिर्फ़ एक ही समस्या है। हमारी बिल्डिंग में एक रिटार्यड अकंल जी रहते हैं जिनका तीन चौथाई दिन नीचे घूमते या गैरेज में बैठ कर गुजरता है। अब जब से पन्नालाल टी वी लाया है तब से उन्होने घर पर टी वी देखना ही छोड़ दिया है। अब पन्नालाल को भी 25 साल की उम्र में जबरन आसाराम जी को सुनना पड़ता है और रामदेव बाबा को देखना पड़ता है।

दिन की ड्युटी में उसे ये नौकरी से अलग दूसरे धंधे करने में बड़ी तकलीफ़ हो रही थी, दिन भर सोसायटी में बंध जाए तो मकान कैसे दिखाए। उन दिनों हम खजानची थे सो हमको आकर बोला देखिए ये मेरे साथ बहुत ज्यातती है, मुझे ही क्यों दिन की ड्युटी पर रक्खा जाता है हमेशा। हमने समझाया कि तिवारी जी बाहर के काम करने में सक्षम नहीं इस लिए। पर ये तो उसकी काबलियत की सजा जैसे था। बात हमें जंच गयी और नियम बना कि आधा महीना वो रात की ड्युटी करेगा और आधा महीना तिवारी जी। तिवारी जी को बात पसंद न आयी क्युं कि दिन में काम ज्यादा रहता है पर आखिरकार मानना ही पड़ा। वो उसके साइड बिसनेस की चुगली भी नहीं लगा सकते थे क्योंकि हम खुद इस बात को बढ़ावा देते थे कि बिना नौकरी से बेइमानी किए अपने खाली वक्त में तुम ऐसा कुछ जुगाड़ करना चाहो तो करो। सोच रही हूँ इसे हिन्दी में पढ़ने के लिए धीरुभाई अंबानी की जीवन गाथा दे दूँ। सपने थोड़े और बड़े हो जाएगें।

इसी पन्नालाल का एक और पहलू भी है उसके इस चालाक, तेज तरार रूप से एकदम अलग। उसका बड़ा भाई बाजू वाली बिल्डिंग में चौकीदार है, वो तिवारी जी जैसा, लेकिन पन्नालाल उसकी बहुत इज्जत करता है, करनी भी चाहिए। पर इन्तहा ये है कि पन्नालाल को अपनी पत्नी का नाम तक नहीं पता और एल आई सी पॉलिसीस पर नॉमिनेशन में बड़े भाई का नाम लिखाया है। बहुत समझाया पर ये तो लक्ष्मण है न्। ये है आज का युवा, भारत के भविष्य का एक हिस्सा