शाम यही कोई साढ़े पाँच बजे घर लौटे थे, पेट में चूहे वर्ल्ड कप जीत चुके थे, बहुत दिनों के इंतजार के बाद वर्षा रानी का मूड ठीक हुआ है और बम्बईवासियों ने राहत की सांस ली है। बरखा रानी ने घर की बाहरी दिवारें धो पौंछ दी हैं और कमरे के अंदर की छत पर भी सो चार हाथ चला दिए हैं। टी वी पर न्यूज चैनल चला कर हम खाने की प्लेट लिए सोफ़े पर अलसाये से पसरे पड़े थे कि मोबाइल की घंटी टनटना उठी। हैल्लो कहा तो दूसरी तरफ़ से घुघूती जी की आवाज खनखना उठी,
"हम आप के इलाके में हैं"।
एक क्षण में सारा आलस्य काफ़ूर हो गया, सोफ़े से लगभग उछल कर उठते हुए हमने पूछा
"आप का ड्राइवर लोकल आदमी है"?
हाँ!
"ड्राइवर को फ़ोन दीजिए"
ड्राइवर को हमने समझाया कि कैसे आना है, पता चला कि वो मेरे घर से पांच मिनिट की दूरी पर हैं। अभी हम नौकरानी को बता ही रहे थे कि क्या बनाओ कि घंटी बजी और घुघूती जी और घुघूता जी दरवाजे पर थे। हम घुघूती जी को पहली बार देख रहे थे,नहीं नहीं देखा तो बाद में, दरवाजा खुलते ही घुघूती जी ने गले जो लगा लिया। एक दूसरे से मिल हम दोनों इतनी आनंदित हो रही थी कि बिन बात के हंस रही थी, सही कहना ये होगा कि छोटी बच्चियों की तरह गिगल कर रही थीं। उनके पतिदेव हम दोनों की मनोस्थिति समझ कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। हमने घर आ कर अभी घर की खिड़कियां भी नहीं खोलीं थी, जल्दी जल्दी उन्हें बिठा कर हमने खिड़की खोली, बरखा में भीगी ताजी हवा का झोंका तन मन को सरोबार कर गया। घुघूती जी से न रहा गया और वो बाल्कनी की ओर खिचीं चली गयीं। कहने सुनने को इतना कुछ था हम दोनों के पास कि डेढ़ घंटा कैसे बीत गया पता ही न चला।
कुछ दिन पहले जब अचानक घुघूती जी ने वेरावल से फ़ोन दनदनाया था और कहा था कि मैं बोम्बे आने वाली हूँ, हम पहली बार उनकी आवाज सुन रहे थे, मन में एक उत्सुकता थी कि घुघूती जी कैसी दिखती होगीं, कैसे बात करती होगीं, क्या वो वैसी ही होगीं जैसी मेरी कल्पना में हैं या कुछ और्। ये उत्सुकता इस लिए भी ज्यादा थी क्युं कि मैने आज तक नेट पर घुघूती जी की या उनके परिवार के किसी सद्स्य की कोई फ़ोटो नहीं देखी थी। लेकिन चैट पर न जाने कितने घंटे हम उनसे बतियाये हैं। उनसे इतनी ढेर सारी बातें कर मुझे अक्सर ऐसा लगा कि उन में और मुझ में काफ़ी कुछ एक जैसा है( अब ये मत पूछिए कि क्या?) उनके सेंस ऑफ़ ह्युमर ने हमारी दोस्ती को जोड़ने में सीमेंट का काम किया है।
घुघूती जी कुछ महीनों के लिए बोम्बे शिफ़्ट हो रही हैं, कुछ एक हफ़्ता पहले वो फ़ोन पर बम्बई के अलग अलग इलाकों के बारे में पूछताछ कर रही थीं, हम भी लोभ रोक नहीं पाये और उनको विश्वास दिलाया कि जिस इलाके में हम रहते हैं उनके लिए वही सबसे अच्छा इलाका है। कल जब उन्हों ने कहा कि हम बम्बई पहुंच गये हैं तो मन किया कि सब काम धाम छोड़ उनसे मिलने चले जाएं, लेकिन ऐसा करना मुमकिन न था। खैर हमने उनके नबी मुंबई में मकान देखने का जुगाड़ जमाया। दूसरे दिन कम से कम फ़ोन पर मिलने का वादा किया। दूसरे दिन उन्हें फ़ोन करने का इरादा बनाते बनाते दिन शाम में ढल गया। हम बहुत गिल्टी महसूस कर रहे थे और सोच ही रहे थे कि उन्हें फ़ोन लगाये। लेकिन जब कुछ मिनिट बाद उन्हें अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनसे मिलने का सपना सच हो गया। बाय द वे वो बिल्कुल वैसी हैं जैसा मैने सोचा था
सुस्वागतम
से पधारे हैं, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।
July 16, 2009
हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था
Posted by
anitakumar
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7/16/2009 01:16:00 AM
17
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श्रेणी दोस्त
May 28, 2009
मुझे कुछ कहना है
छब्बीस की चिठ्ठाचर्चा में अनूप जी ने हमारे बेटे की सगाई की खबर जोड़ हमारी पारिवारिक खुशी को ब्लोगजगत से जोड़ दिया है और सभी ब्लोगर मित्रों की शुभकामानाएं पा कर हम दुगुनी खुशी महसूस कर रहे हैं। आज से दो साल पहले( जी हां दो साल हो गये) जब हम ब्लोगजगत में आये थे तब इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि ब्लोगजगत हमारे विस्तृत परिवार का हिस्सा बन जाएगा और हम अपने सब सुख दुख इस परिवार से यूं बाँट रहे होगें जैसे अपने आस पास मौजूद मित्रों से भी नहीं बाँट रहे होगें। किसे पता था कि सुबह आठ बजे पाबला जी के बच्चों को शुभकामनाएं भेजने के लिए जब कंप्युटर ऑन करुंगी तो अनूप जी दिख जायेगें और मैं अपनी जिन्दगी के एक बड़ी खबर सबसे पहले उनसे बाँट रही होऊंगी, अपनी सहेलियों को बाद में फ़ोन करके दस बजे बताऊँगी जब सब अपने अपने ग्रहस्थी के कामों से निपट चुकी होगीं।
आज घर पर हूँ और बहुत दिनों के बाद कुछ खास काम नहीं कर रही, कितने ही विचार, कितनी ही यादें उथल पुथल मचाये हुए हैं। आदित्य ने जब पच्चीस में पांव रखा था तभी हर मां की तरह हमें भी उसकी शादी की चिन्ता सताने लगी थी। मेरी इस चिन्ता पर मेरे पति,बेटा, और मेरी सहेलियां सब हंस पड़े थे। सबका ये कहना था कि अभी तो आदित्य बच्चा है। लेकिन हम नहीं माने बस कन्या ढ़ूढ़ाई अभियान शुरु कर दिया। कई पापड़ बेलने पड़े। जब इस काम में लगे तब पता चला कि किताबें आप को दुनिया भर की जानकारी दे दें लेकिन दुनियादारी नहीं सिखा सकतीं उसके लिए तो जिन्दगी की किताब पढ़नी पढ़ती है। रिश्ता पक्का होते ही अगली चिन्ता जो हमें सताने लगी वो ये कि हमें तो कोई रीति रिवाज पता ही नहीं, किसी कोर्स की किताब में नहीं सिखाए जाते न्।
अब पिछ्ले दो साल से ऐसी आदत पड़ गयी है कि जब भी मन विचलित होता है हम नेट पर आ जाते हैं और कोई न कोई दोस्त बात करने के लिए मिल जाता है और मन हल्का हो जाता है। बहुत दिनों से कुछ न पोस्ट करने के बावजूद लोगों से संपर्क बना हुआ है। हम में सब्र की बहुत कमी है, जब एक बात ठान लेते हैं तो उसे उसी समय पूरा करने की कौशिश करते हैं। लेकिन हर अभियान का संपन्न होना हमारे हाथ में तो नहीं। ऐसे ही एक दिन उदास हुए हम नेट पर आ बैठे, द्विवेदी जी मिल गये। हमने अपने मन की बैचेनी उनसे बाँटी, उन्हों ने हमसे आदित्य की जन्म तारीख पूछी और पता कर के बताया कि बात जून तक बनने की आशा है, और देखिए बात मई में बन गयी। ( सभी अविवाहित ब्लोगर मित्रों को कहां लाइन लगानी है पता चल गया न? )…॥:)
रिश्ता पक्का होने के बाद तय हुआ कि पहले 'रोके' की रस्म कर ली जाए। हम ने हां तो कर दी लेकिन अंदर ही अंदर बहुत परेशान थे। कारण ये था कि हमें पता नहीं था कि 'रोके' की रस्म में क्या करना होता है। नजदीकी रिश्तेदारों में ले दे के सिर्फ़ दो छोटी भाभियां हैं, उनमें से भी जो बम्बई में ही रहती है वो गुजराती है और जो इंदौर में रहती है वो पंजाबी। खैर हमने इंदौर फ़ोन लगाया, पूछने के लिए कि क्या करना है, कुछ सहेलियों से पूछा, लेकिन दिमाग में टोटल कन्फ़्युशन था। परेशान से हम नेट पर आ गये। दोस्त तो बहुत दिखाई पड़े ऑनलाइन, पर उस समय हमें किसी महिला सहेली की जरूरत महसूस हो रही थी, अभी हम सोच ही रहे थे कि किससे बात करें कि लो हमें मिल गयीं मिनाक्षी जी। बस हमने आधे घंटे उन्हें चैट पर अटकाये रखा और उन्हों ने भी बड़े सब्र से हमारे छोटे बड़े सभी सवालों का जवाब देते हुए एकदम सही सलाह दी। उनकी दी जानकारी के बल पर हम ये काम भी सही सलामत निपटा आये। आज ही एक पुरानी पोस्ट पढ़ रहे थे कि हिन्दी ब्लोगजगत में हिन्दी ब्लोगजगत के एक परिवार जैसा होने का डंका काफ़ी बज चुका और अब उससे ऊपर उठ कर सोचना चाहिए कि हम हिन्दी ब्लोग क्युं लिखते हैं( कुछ ऐसा ही लिखा था पोस्ट में)। मुझे लगता है कि लोग ब्लोग लिखना चाहे किसी भी कारण से शुरु करें और चाहे कितनी ही हिन्दी ब्लोगजगत की उपलब्धियां क्युं न हों , पर सबसे बड़ी उपलब्धी है यहां जो भी आता है खुद को इस तेजी से बड़ते परिवार का हिस्सा बनते पाता है और इतने मित्र पा जाता है जितने की उसने कल्पना भी नहीं की होती। आगे का आखों देखा हाल भी आप के साथ बांटूगी , इस लिए नहीं की आप जानना चाहेगें बल्कि इस लिए कि मैं आप के साथ अपने अनुभव बांटना चाहूंगी।
(ये पोस्ट दो दिन पहले लिखी गयी थी लेकिन नेट ने धोखा दे दिया और हम इसे आज पब्लिश कर पा रहे हैं।)
Posted by
anitakumar
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5/28/2009 05:38:00 PM
38
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श्रेणी बस यूँ ही
April 19, 2009
गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"
गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"
वैसे तो हमने अखबार पढ़ना बहुत कम कर दिया है। अखबार हमारी सेहत के लिए हानिकारक हैं। पूरा अखबार रेप, इनसेस्ट, या राजनीतिज्ञों की फ़ैलायी नफ़रत, धोखागड़ी के मामलों से पटा पड़ा रहता है, पढ़ते पढ़ते बेकार में रक्तचाप बड़ जाता है। लेकिन आज इतवार का दिन और बहुत दिनों बाद फ़ुर्सती सुबह के कुछ पल्। आराम से चाय की चुस्की के साथ सोचा चलो अखबार ही देख लें। पहले पन्ने पर तो था कि संजय दत्त ने मायावती को जादू की झप्पी और पप्पी देने की इच्छा जताई, हम क्ल्पना मात्र से ही मुस्कुरा उठे। संजय को अपनी ये तमन्ना पूरी करने के लिए मायावती के जन्मदिन पर एक जिम उपहार के रूप में भेजना होगा तभी उनका ये सपना पूरा होने की कुछ संभावना बन सकती है।
पेज पलटते ही एक खबर पर नजर पड़ी, " गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"
यकीनन खबर चौंकाने वाली थी। खबर कुछ यूँ थी कि ब्रिटेन में एक 47 वर्षीय महिला दोपहर के बारह बजे अपने घर आराम कर रही थी। अदालत ने उसके पति को घरेलू मारपीट की वारदात की वजह से छ: महीने के लिए पत्नी से दूर रहने को कहा था। लेकिन ये जनाब दोपहर बारह बजे घर में घुसे और आते ही पंलग पर आराम करती अपनी पत्नी के माथे पर गोली दाग दी। गोली खोपड़ी को चीरती पीछे से निकल गयी। इतने में पत्नी के एक पड़ौसी रिश्तेदार ने पुलिस को फ़ोन कर दिया था। अब ये अपनी पुलिस तो थी नहीं जो क्रियाकरम होने के बाद तेरहवीं पर आती, तो आनन फ़ानन में पुलिस हाजिर हो गयी। तब तक पति देव मकान के पिछवाड़े जा कर खुद को भी गोली मार कर टें बोल लिए। जब पुलिस अफ़सर उस महिला के पास पहुँचा तो महिला न सिर्फ़ होश में थी बल्कि अपने लिए किचन में जा कर चाय बना लाई थी, हां माथा एक कपड़े से दबा रखा था। लेकिन उसने अफ़सर को पूछा
"यहां क्या हो रहा है? तुम यहां क्या कर रहे हो? अब आये हो तो चाय पियो।"
महिला को हेलिकोप्टर से तुंरत अस्पताल ले जाया गया और उम्मीद की जा रही है कि वो पूर्णरुपेन स्वस्थ हो जायेगी। लोग परेशान हैं, अरे गोली लगे तो आदमी को मर जाना चाहिए,ये थोड़े के चाय पीने बैठ जाओ और फ़िर आराम से अस्पताल जाओ और ठीक हो कर आ जाओ। कल को टाटा टी वाले कहेगें "देखाआआआअ, हमारी चाय का कमाल।"
इसे पढ़ कर हमें इंगलैंड में ही घटा एक और किस्सा याद आ गया, मनोविज्ञान की किताबों में अक्सर इसका जिक्र रहता है और छात्रों की यादों में रचा बसा रहता है।
बात सन 1848 की है। रेल की पटरी बिठाने का काम चल रहा था। अब जमीन कहीं समतल तो कहीं ऊबड़ खाबड़ थी। पटरी बिठाने वाली टीम में से एक पच्चीस साल के नौजवान के जिम्मे ये काम था कि जमीन को समतल बनाने के लिए चट्टानों में ड्रिल मशीन से सुराख कर उसमें थोड़ा बारुद भर कर ऊपर से रेता से ढक दो और फ़िर बिजली के फ़्युस और लोहे की छड़ों की मदद से चट्टान को उड़ा दिया जाए। उस दिन इस नौजवान का थोड़ा सा ध्यान बंटा और लोहे की तीन सेंटीमीटर मोटी और 109 से मी लम्बी छ्ड़ चट्टान के बदले उसके गाल को चीरती हुई खोपड़ी से आकाश की तरफ़ उड़ ली। ये नौजवान हक्का बक्का रह गया लेकिन तत्काल होश संभाला। वो बात करने और साथी की म
दद से चलने की स्थिती में था। वो नौजवान न सिर्फ़ बच गया बल्कि एक लंबे जीवन का सफ़र तय करके गया।
हाँ, ये बात और है कि इस हादसे ने उसकी पूरी पर्सनलिटी ही बदल दी। हादसे से पहले वो एक जिम्मेदार, अक्लमंद, सर्वजन प्रिय व्यक्ति था जिसका उज्जवल भविष्य सबको दिखाई दे रहा था। हादसे के बाद जैसे जैसे समय गुजरा उसके माता पिता ने चैन की सांस ली, उसके शारिरीक स्वास्थय में, बातचीत में, उठने बैठने, चलने फ़िरने में कहीं कोई कमी नहीं आयी थी, सब पहले जैसा ही था। यहां तक की उसकी नयी चीजें सीखने की काबलियत, यादाश्त या बुद्धीमत्ता पर भी कोई असर न पड़ा था।
लेकिन कुछ न कुछ तो असर पड़ना ही था। उसके स्वभाव में एक अजीब प्रकार का सनकीपन, उंदडता, मौजीपना, गैरजिम्मेदारानापन नजर आने लगा। माता पिता का श्रवण कुमार अब समाज के किसी भी नियम को तोड़ना अपना धर्म समझने लगा। गाली गलौच करना, दूसरों से झगड़ा करना उसकी खास आदत बन गयी और लोग उससे कतराने लगे। लोगों से किए वायदे तोड़ना उसका शौक बन गया। किसी जमाने में सबसे निष्ठावान, जिम्मेदार माना जाने वाला मजदूर अब नौकरी से हाथ धो बैठा इसके बावजूद की मालिक उसे निकालना नहीं चाहते थे पर उस पर भरौसा भी नहीं किया जा सकता था।
क्या आप को भी ऐसा ही कोई किस्सा मालूम है, यदि हाँ तो बताइए न…॥
Posted by
anitakumar
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4/19/2009 03:38:00 PM
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