पिछली पोस्ट हमने करीब दो महिने पहले लिखी थी( पता है बहुत बेकार स्कोर है), इस बीच बहुत कुछ घट गया, बहुत कुछ पढ़ा, कहीं टिपिया पाये कहीं नहीं। अक्सर ऐसा हुआ कि हमने पोस्ट पढ़ी, मन ही मन में टिपियाया और निकल गये। कारण ये था कि हम पिछले दो महीने से एक कोर्स कर रहे थे, कोई मजबूरी नहीं थी, बस अपनी मर्जी थी। कोर्स तो जोश में जॉइन कर लिया लेकिन इतने सालों बाद जब परीक्षा में बैठना पड़ा तो नानी याद आ गयी। पिछली बार मैने परीक्षा दी थी 1978 में। पता है, पता है, आप में से कई लोग तो पैदा भी नहीं हुए होगें और बाकी उस साल में नाक पौछतें, निक्कर संभालते गोटियाँ खेलते होगें। परिक्षा का जिस दिन परिणाम निकलना था, हमारे हाथ पांव ठंडे हो रहे थे। फ़ैल हो जाते तो कैरिअर पर कोई असर नहीं पड़ना था लेकिन कॉलेज की सहेलियां कितना हंसेगी सोच कर ही जान निकली जा रही थी। भगवान ने लाज रख ली और 80% ले कर पास हो लिए, जान बची तो लाखों पाये, लौट कर बुद्धु घर को(ब्लोगजगत में ) आये।
यूँ तो सभी ब्लोग्स पर जब पोस्ट पढ़ते हैं तो कहने को कुछ न कुछ मन में आता ही है लेकिन आज की पोस्ट को स्टीम्युलेट (हिन्दी में क्या कहेगें?) करने का सेहरा जाता है ज्ञान जी की पोस्ट को 'ब्लॉग पोस्ट प्रमुख है, शेष गौण'। ई-मेल में ही इस पोस्ट को पढ़ते ही मुझे याद आ गया एक खत जो मैनें अभी कुछ दिन पहले बलविन्दर पाबला जी को लिखा था। अपनी उस याद को आप सब से बांटने के लिए मैं वो खत ज्यों का त्यों यहां दे रही हूँ।
लेकिन वो खत आप लोगों से बांटने के पहले ये तो बता दूँ कि पाबला जी से मेरी मुलाकात अभी कुछ दिन पहले ही हुई है और मुझे पता चला कि वो वेब डिजाइनिंग में बहुत दक्ष हैं। मैं उनसे कुछ तकनीकी सहायता ले रही थी( उसके बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगी)। उसी संदर्भ में ये खत लिखा गया था……।
"पाबला जी
सादर प्रणाम,
हम तो इस बात से ही खुश हैं कि कोई हमारे स्टुपिड से सवालों का जवाब देने को भी तैयार है, इस हिसाब से आप मेरे गुरु हो लिए…प्रणाम गुरु जी……।
कहते हैं कि लोग बुढ़ापे में सठिया जाते हैं, अजीब अजीब हरकतें करने लगते हैं, अजीब अजीब (बम्बइया भाषा में अजीब बोले तो कहेगें अतरंगी) इच्छाएं मन में जन्म लेने लगती हैं। मैं साठ की तो नहीं हुई हूँ( अभी काफ़ी दूर हूँ उस मंजिल से) लेकिन सठिया जरूर गयी हूँ( जब साठ की होऊंगी तब पता नहीं क्या करूंगी) अपनी पूरी मसरुफ़ियत के बावजूद ब्लोगिंग की लती हो गयी हूँ। यहां तक तो गनीमत थी लेकिन उसके साथ साथ मुझे ये इन्टरनेट के फ़ंडे सीखने का शौक भी चर्राया है……डा अमर कुमार के ब्लोग पर विषय से संबधित कार्टून लगा देखा तो आश्चर्य से आखें फ़टी की फ़टी रह गयीं। ज्ञान जी के ब्लोग पर चलता इंजिन मुझे उतना ही अच्छा लगता है जैसे किसी बच्चे को प्लास्टिक की पटरी पर गोल गोल दौड़ती रेलगाड़ी…॥ फ़ुर्सतिया जी के ब्लोग पर खिले फ़ूल और हाशिये में लगा राजकपूर के गानों का विडियो……यूनुस जी के ब्लोग पर इस्तेमाल किए फ़ोन्ट्स का स्टाइल, मनीष और मीत जी के ब्लोग पर पहले ईस्निप (जिसे मैं थर्मामीटर कहती हूँ, वैसा ही दिखता था) से लोड किये गाने, अभिषेक के ब्लोग पर लगी ढेर सारी फ़ोटोस थम्बनेल के रूप में(उसे थम्बनेल कहते हैं ये भी अभी अभी पता चला है),अजित जी के ब्लोग के अक्सर बदलते रंगरूप, होली के अवसर पर बैंगणी भाइयों की फ़ोटोशॉप से खेली होली कौन भुला सकता है, किसी के ब्लोग पर ढोलक बजाता ढीगंना का आइकोन और भी न जाने क्या क्या ....
ब्लोगजगत ऐसा लगता है जैसे कोई मेला लगा है और मैं दुकानों के बाहर खड़ी हर दुकान पे सजी चीजें ललचाई नजरों से निहार रही हूँ…।काश मैं भी ये सब चीजें ले पाती। ये सब वो खिलौने हैं जो मेरी पहुंच के बाहर हैं ....बहुत सिर फ़ोड़ा, कई घंटे बरबाद किए लेकिन आज तक इन सब बातों को समझ नहीं पायी। सोचा कोई क्लास जॉइन कर लूँ, लेकिन सब ने कहा कि ये सब क्लास में नहीं सिखाते, खुद ही सीखना पड़ता है। झट से जाके वेबडिजाइनिंग पर एक मोटी सी किताब खरीद लाई…।घर पर आ कर खोली तो पाया कि मेरे लिए तो ये काला अक्षर भैंस बराबर है जी, उसे अपने किताबों की अलमारी में सबसे पीछे डाल दिया…:)।
कहते हैं कि अगर किसी चीज के लिए बहुत प्रबल इच्छा हो तो भगवान भी आप की सुन लेते हैं…।कुछ ऐसा ही हुआ होगा…द्विवेदी जी ने जब कहा कि आप को फ़ोन कर लूँ तो मेरा पहला सवाल ये था कि मैं तो ये नाम पहली बार सुन रही हूँ, क्या वो मेरे बारे में जानते हैं। द्विवेदी जी ने हंसते हुए कहा था कि अरे पाबला जी को आप को बहुत अच्छे से जानते है, बस आप फ़ोन कर लिजीए।मुझे याद भी दिलाया कि आप अक्सर 'अदालत' ब्लोग की बात करती हैं वो मैं नहीं लिखता पाबला जी लिखते हैं…हमें बड़ा आश्चर्य हुआ, हम तो यही समझे थे कि द्विवेदी जी लिखते हैं। कुछ कौतुहल और कुछ असमंजस की स्थिती में मैंने आप का नंबर घुमाया था…लेकिन आप इतनी आत्मियता के साथ बतियाये कि लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रही हूँ, और एक सिलसिला चल निकला…। आप से और गुरुप्रीत से मुझे इतना अपनापन मिला कि मुझे लगता है मानो आप लोग मेरे ही परिवार का हिस्सा हों। ………"
तो ज्ञान जी के ब्लोग पर कइयों को वो सब खिलौने डिस्ट्रेक्शन लगते होगें लेकिन कुछ मेरे जैसे भी होगें जो चलते इंजिन और ऊपर चलती पट्टी और ध्यानमगन कृष्ण जी को भी देखने आते होगें, रोज देखते है लेकिन फ़िर भी मन नहीं ऊबा। ये ऐसे ही है कि कुछ छात्र गणित प्रेक्टिस करने के समय रेडियो जरूर चला लेते हैं और कुछ बंद कर देते हैं । सब की पसंद अपनी अपनी।
सुस्वागतम
आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।
February 19, 2009
December 01, 2008
क्या कहूँ
बम्बई की घटनाओं से अभी उबर नहीं पाये हैं। इतनी जल्दी उबर जाते तो हम ही न ग्रह मंत्री हो जाते…।:)
अब इन अंधियारे 59 घंटों का जिक्र सब तरफ़ है तो मन में कुछ न कुछ तो चलेगा ही। (ज्ञान जी से इस शीर्षकचोरी की माफ़ी मांगते हुए)मेरी मानसिक हलचल के कुछ और उदगार । ख्यालों का सिलसिला जारी है।
आतंकी हमलों से बम्बई तो क्या पूरा देश अन्जान नहीं है पहली बार थोड़े न हुए हैं। कश्मीर में आये दिन होते ऐसे हमलों के हम आदी हो चुके हैं, अखबार में पढ़ कर इतने विचलित नहीं होते। बिल्कुल ऐसे ही जैसे पहले पंजाब में होते ऐसे हमले आम बात लगते थे। मीडिया में भी ऐसी घटनाएं एक दो दिन सुर्खियों में रहतीं और फ़िर तुरंत दूसरे ही दिन से कोई और खबर सुर्खी बन जाती। इस बार भी हमें पक्का विश्वास था कि शुक्रवार को ताज आजाद करा लिया गया, आतंकी मारे गये, खेल खत्म्। अब मीडिया कोई और सुर्खियां ढूंढ चुका होगा, ज्यादा से ज्यादा शाम तक खबरें बदल जाएगीं । लेकिन ऐसा नहीं हुआ,शुक्रवार का पूरा दिन बीता, फ़िर शनिवार बीता और आज इतवार भी बीत गया, यानि कि घटना खत्म होने के तीन दिन बाद भी मीडिया में वही ताज पर हमले की खबर सरगर्मी पर है। क्या पाकिस्तानी आका यही नहीं चाहते थे?
शाम को एक सहेली के आव्हान पर शहीदों को श्रद्धांजली देने के लिए आयोजित एक रैली में हिस्सा लेने गये। वापस घर आ कर टी वी खोला तो हर चैनल पर वही एक बात थी, जनता अपना आक्रोश जाहिर करने के लिए सड़कों पर उतरी। रैली में भी वही देख कर आ रहे थे। टी वी में जो फ़ोटोस दिख रही थीं उसमें रैली में हिस्सा लेते लोग संभ्रात धनी परिवारों से दिख रहे थे और महिलाएं ज्यादा दिख रही थीं। ऐसा ही आक्रोश हमने कारगिल युद्ध के समय महसूस किया था ,खुद अपने अंदर और दूसरों में भी। इन दोनों घटनाओं के समय जनता का गुस्सा पाकिस्तान की तरफ़ तो है ही लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा गुस्सा सरकार की नपुंसकता पर है, मंत्रियों के घटनाओं को हल्के तौर पर लेने से है। आर आर पाटिल का कहना कि 'बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती हैं' न सिर्फ़ ओछा लगा बल्कि फ़िल्मी भी लगा, मानो शाहरुख खान से ये डायलाग चुराया हो, सिर्फ़ आगे सिनोरिटा नहीं कहा। विलासराव देशमुख का आज ताज का दौरा करना अपने फ़िल्मी बेटे के साथ और फ़िल्म डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा के साथ एक और ओछेपन का सबूत था। राम गोपाल वर्मा ने जरूर अपनी नयी फ़िल्म का प्लोट लिख लिया होगा, विलासराव के बेटे को हीरो का रोल दे दिया होगा और शूटिंग की लोकेशन देखने आया होगा। अरे, शहीदों का खून तो सूख जाने दिया होता।
कारगिल के समय भी हमारे कई जांबाज सिपाहियों को अकारण मौत को गले लगाना पड़ा था क्युं की किसी मंत्री ने, किसी नौकरशाह ने कारगिल में जरुरत पड़ने वाले समान को सिपाहियों को मुहैया कराना फ़जूल समझा था अपना विदेश घूमना ज्यादा जायज लगा था उन्हें। इस बार भी कई पुलिस अफ़सर और पुलिस कर्मी इस लिए बलि चढ़े क्युं कि हेल्मेट और बुलैटप्रूफ़ जैकेट हल्की क्वालिटी की थी या जंग खायी हुई थीं।
केरला के चीफ़ मिनिस्टर का उन्नीकृष्णन के घर जा कर तमाशा करना देख सर शर्म से झुक गया। हम सोच रहे थे राजनेता और राजनीति कितनी धरातल में धंस गयी है कि अब ये लोग मुर्दों के बल पर सत्ता का खेल खेलने लगें। इस प्रजातंत्र में किसी को अपने स्वजन के जाने पर शांती से प्र्लाप करने का भी अधिकार नहीं रह गया। रोना है तो मीडिया के कैमरे के सामने और किसी न किसी मिनिस्टर के कुर्ते के छोर को पकड़ कर ही रोओ ताकि सब तुम्हारे ये आंसू भुना सकें। हमारे झुके हुए सर को देख धरा ने हमें टोका और कहा " एक्यूज मी, ये तुम्हारे जगत के राजनेता और राजनीति की गंदगी ढोने की ताब मुझ में नहीं है, कहीं और जा कर फ़ेकों"
शिव जी की पोस्ट लगा हमारे ही मन की भावनाओं को उजागर करती है, इसे देखिए
खैर उसकी बात तो हम अनसुनी कर गये, लेकिन एक बात रह रह कर मन में उठ रही है, कारगिल के समय हमने बम्बई में कम से कम जनता को इस तरह अपने आक्रोश का प्रदर्शन करते नहीं देखा था, क्या इस बार आक्रोश ज्यादा है या इस बार पहली बार अमीरों को आतंकवाद ने छुआ है इस लिए प्रदर्शन कहीं ज्यादा सगंठित है और इसी लिए दिख भी रहा है। गरीब जनता ट्रेनों में , टेक्सियों में , बाजारों में हर बार मार खा कर चिल्ला चुल्लु कर चुप हो जाती थी ,कोई सुनने वाला न होता था। पर इस बार अमीरों के घरों में आग लगी है, सरकार पर इस लिए दवाब ज्यादा है या इस बार मीडिया ज्यादा सक्रिय हो गया है और जनता के आक्रोश को जगाये रखना चाहता है, अगर हां तो क्युं? क्या मीडिया को अभी तक इस से बड़ी कोई खबर नहीं मिली या इस लिए कि चुनाव नजदीक हैं और सरकार अमीरों के दवाब से बौखला रही है और मीडिया मजे ले रहा है।
इन सब बातों में एक बात अच्छी हुई( हमारे हिसाब से)और वो ये कि वी पी सिंह के मरने पर ज्यादा ताम झाम नहीं हुआ। एक तरह से गुमनामी की मौत मरा। कहते हैं न कर्मों का फ़ल यहीं मिलता है।…॥:) अब हमें ये बात क्युं अच्छी लगी ये फ़िर कभी।
अपने मन के इन उदगारों को क्या नाम दूं समझ नहीं पा रही, आप ही बता दीजिए क्या कहूँ ?
अब इन अंधियारे 59 घंटों का जिक्र सब तरफ़ है तो मन में कुछ न कुछ तो चलेगा ही। (ज्ञान जी से इस शीर्षकचोरी की माफ़ी मांगते हुए)मेरी मानसिक हलचल के कुछ और उदगार । ख्यालों का सिलसिला जारी है।
आतंकी हमलों से बम्बई तो क्या पूरा देश अन्जान नहीं है पहली बार थोड़े न हुए हैं। कश्मीर में आये दिन होते ऐसे हमलों के हम आदी हो चुके हैं, अखबार में पढ़ कर इतने विचलित नहीं होते। बिल्कुल ऐसे ही जैसे पहले पंजाब में होते ऐसे हमले आम बात लगते थे। मीडिया में भी ऐसी घटनाएं एक दो दिन सुर्खियों में रहतीं और फ़िर तुरंत दूसरे ही दिन से कोई और खबर सुर्खी बन जाती। इस बार भी हमें पक्का विश्वास था कि शुक्रवार को ताज आजाद करा लिया गया, आतंकी मारे गये, खेल खत्म्। अब मीडिया कोई और सुर्खियां ढूंढ चुका होगा, ज्यादा से ज्यादा शाम तक खबरें बदल जाएगीं । लेकिन ऐसा नहीं हुआ,शुक्रवार का पूरा दिन बीता, फ़िर शनिवार बीता और आज इतवार भी बीत गया, यानि कि घटना खत्म होने के तीन दिन बाद भी मीडिया में वही ताज पर हमले की खबर सरगर्मी पर है। क्या पाकिस्तानी आका यही नहीं चाहते थे?
शाम को एक सहेली के आव्हान पर शहीदों को श्रद्धांजली देने के लिए आयोजित एक रैली में हिस्सा लेने गये। वापस घर आ कर टी वी खोला तो हर चैनल पर वही एक बात थी, जनता अपना आक्रोश जाहिर करने के लिए सड़कों पर उतरी। रैली में भी वही देख कर आ रहे थे। टी वी में जो फ़ोटोस दिख रही थीं उसमें रैली में हिस्सा लेते लोग संभ्रात धनी परिवारों से दिख रहे थे और महिलाएं ज्यादा दिख रही थीं। ऐसा ही आक्रोश हमने कारगिल युद्ध के समय महसूस किया था ,खुद अपने अंदर और दूसरों में भी। इन दोनों घटनाओं के समय जनता का गुस्सा पाकिस्तान की तरफ़ तो है ही लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा गुस्सा सरकार की नपुंसकता पर है, मंत्रियों के घटनाओं को हल्के तौर पर लेने से है। आर आर पाटिल का कहना कि 'बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती हैं' न सिर्फ़ ओछा लगा बल्कि फ़िल्मी भी लगा, मानो शाहरुख खान से ये डायलाग चुराया हो, सिर्फ़ आगे सिनोरिटा नहीं कहा। विलासराव देशमुख का आज ताज का दौरा करना अपने फ़िल्मी बेटे के साथ और फ़िल्म डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा के साथ एक और ओछेपन का सबूत था। राम गोपाल वर्मा ने जरूर अपनी नयी फ़िल्म का प्लोट लिख लिया होगा, विलासराव के बेटे को हीरो का रोल दे दिया होगा और शूटिंग की लोकेशन देखने आया होगा। अरे, शहीदों का खून तो सूख जाने दिया होता।
कारगिल के समय भी हमारे कई जांबाज सिपाहियों को अकारण मौत को गले लगाना पड़ा था क्युं की किसी मंत्री ने, किसी नौकरशाह ने कारगिल में जरुरत पड़ने वाले समान को सिपाहियों को मुहैया कराना फ़जूल समझा था अपना विदेश घूमना ज्यादा जायज लगा था उन्हें। इस बार भी कई पुलिस अफ़सर और पुलिस कर्मी इस लिए बलि चढ़े क्युं कि हेल्मेट और बुलैटप्रूफ़ जैकेट हल्की क्वालिटी की थी या जंग खायी हुई थीं।
केरला के चीफ़ मिनिस्टर का उन्नीकृष्णन के घर जा कर तमाशा करना देख सर शर्म से झुक गया। हम सोच रहे थे राजनेता और राजनीति कितनी धरातल में धंस गयी है कि अब ये लोग मुर्दों के बल पर सत्ता का खेल खेलने लगें। इस प्रजातंत्र में किसी को अपने स्वजन के जाने पर शांती से प्र्लाप करने का भी अधिकार नहीं रह गया। रोना है तो मीडिया के कैमरे के सामने और किसी न किसी मिनिस्टर के कुर्ते के छोर को पकड़ कर ही रोओ ताकि सब तुम्हारे ये आंसू भुना सकें। हमारे झुके हुए सर को देख धरा ने हमें टोका और कहा " एक्यूज मी, ये तुम्हारे जगत के राजनेता और राजनीति की गंदगी ढोने की ताब मुझ में नहीं है, कहीं और जा कर फ़ेकों"
शिव जी की पोस्ट लगा हमारे ही मन की भावनाओं को उजागर करती है, इसे देखिए
खैर उसकी बात तो हम अनसुनी कर गये, लेकिन एक बात रह रह कर मन में उठ रही है, कारगिल के समय हमने बम्बई में कम से कम जनता को इस तरह अपने आक्रोश का प्रदर्शन करते नहीं देखा था, क्या इस बार आक्रोश ज्यादा है या इस बार पहली बार अमीरों को आतंकवाद ने छुआ है इस लिए प्रदर्शन कहीं ज्यादा सगंठित है और इसी लिए दिख भी रहा है। गरीब जनता ट्रेनों में , टेक्सियों में , बाजारों में हर बार मार खा कर चिल्ला चुल्लु कर चुप हो जाती थी ,कोई सुनने वाला न होता था। पर इस बार अमीरों के घरों में आग लगी है, सरकार पर इस लिए दवाब ज्यादा है या इस बार मीडिया ज्यादा सक्रिय हो गया है और जनता के आक्रोश को जगाये रखना चाहता है, अगर हां तो क्युं? क्या मीडिया को अभी तक इस से बड़ी कोई खबर नहीं मिली या इस लिए कि चुनाव नजदीक हैं और सरकार अमीरों के दवाब से बौखला रही है और मीडिया मजे ले रहा है।
इन सब बातों में एक बात अच्छी हुई( हमारे हिसाब से)और वो ये कि वी पी सिंह के मरने पर ज्यादा ताम झाम नहीं हुआ। एक तरह से गुमनामी की मौत मरा। कहते हैं न कर्मों का फ़ल यहीं मिलता है।…॥:) अब हमें ये बात क्युं अच्छी लगी ये फ़िर कभी।
अपने मन के इन उदगारों को क्या नाम दूं समझ नहीं पा रही, आप ही बता दीजिए क्या कहूँ ?
November 30, 2008
कुछ ख्याल
परसों से बहुत से चिठ्ठों पर मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बारे में ढेरों पोस्ट लिखी गयीं, कविताएं लिखी गयीं। किसी में नेताओं के प्रति आक्रोश(और वो सही भी है)था तो किसी में हम हिन्दूस्तानियों की बेबसी पर मौन आसूँ थे, कहीं युद्ध का ऐलान था तो कहीं 'हम सब एक हैं' के (खोखले) नारे थे। हम भी तीन दिन से टी वी से चिपके बैठे थे। उन तीन दिनों में जिन्दगी मानों थम सी गयी थी, ताज के बाहर तैनात मीडियाकर्मियों के साथ साथ हमारे भी दिन और रात में कोई फ़र्क नहीं रह गया था।
बहुत से ख्याल , बहुत सी भावनाएं गुजरीं मन से इन तीन दिनों में। पता नहीं क्युं इस युद्ध के लाइव कवरेज को देखते हुए मन में एक बार भी ब्लोग पर कुछ लिखने का ख्याल नहीं आया। न ही इस बात का ख्याल आया कि दूसरों ने क्या कहा वो पढ़ा जाए। सच कहूँ तो कंप्युटर का ही ख्याल नहीं आया और आप सब के जैसे ही मैं भी ब्लोगजगत की लती उस समय एक बार फ़िर टी वी लती हो गयी।
पहला ख्याल जो मन में आया वो ये कि ये अठ्ठारह बीस साल के छोकरों से लड़ने के लिए हमारे सबसे बेहतरीन सैन्य बल (जिसको मारकोस कहा जा रहा था) बुलाने की जरुरत पड़ गयी, क्या दुनिया हम पर, हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर हंस नहीं रही होगी, ओसामा बिन लादेन की विद्रुप हंसी हमारे कानों में सीसे सी पिघल रही थी।
जैसे जैसे वक्त गुजर रहा था मन मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि अब तक नहीं निकाल पाये उन चूहों को। माना कई कारण थे, निर्दोष लोग बंधक थे, ये चूहे गुर्रिला वार में दक्ष थे, हमारे कमांडोस के पास ज्यादा जानकारी उपल्ब्ध नहीं थी,(इन चूहों के पास ताज होटल के अंदर का पूरा नक्शा था, सैनिकों को ये बात पता चली उनके छूटे हुए सामान में से एक सीडी से। अगर उन्हों ने ताज के अंदर का नक्शा बना लिया था तो क्या ताज के मालिकों से हमारे सैनिकों को ताज का अंदर का नक्शा नहीं मिल सकता था। या सब लोग क्रिकेट के मैच के जैसे टी वी पर मैच देखने बैठ गये थे।) बताइए, अपने ही देश में हमारे कमांडोस को जरूरी जानकारी देने वाला कोई नहीं था, सब आसूँ बहाने में और जो शहीद हो गये उनकी जयजयकार करने में व्यस्त थे। कमांडोस तो आये रात को दो बजे जब की रात दस बजे से ये साफ़ हो गया था कि आंतकवादी ताज में छुपे बैठे हैं, क्या किसी को इस बात का ख्याल आया कि ताज के अंदर के नकशे की जरूरत पड़ सकती है और कमांडोस के आने से पहले उसे तैयार रखना चाहिए। ऐसे में याद आ रहा था इसराइलों का इन्टेबी जाना और दुश्मन को दुश्मन के ही घर पर मार कर अपने देशवासियों को छुड़ा लाना। दूसरे ही पल ये भी सोच रहे थे कि हमें क्या पता कि वहां क्या क्या किया गया, हमारी जानकारी तो मीडिया से मिली जानकारी पर ही आधारित है, शायद वो सब किया भी गया हो।
टी वी देखते देखते एक और ख्याल जो मन में उठा वो था जब नरीमन हाउस पर विजय पा ली गयी। वहां आस पास के लोगों ने सड़कों पर उतर कर इस जीत का जशन मनाया, गदगद हो कर सैनिकों का धन्यवाद किया गया, उन पर फ़ूल बरसाये गये। हम भी फ़ूले नहीं समा रहे थे और अपने कमांडोस पर उतना ही गर्व महसूस कर रहे थे जितना वहां की जनता जता रही थी। लेकिन हमने देखा कि कमांडोस इस सारी वाहवाही से अनछुए चुपचाप जाकर बसों में बैठ गये वापस ताज की तरफ़ जाने को। ये थे असली हीरो- जान पर खेल कर भी अपने काम को अंजाम तक पहुंचाने के बाद भी किसी तारीफ़ की अपेक्षा नहीं। मन में ये भाव कि इसमें बड़ाई क्या है, हमने अपना काम किया है जैसे सब करते हैं , हां ! काम ठीक ठाक संपन्न हो गया इस बात का संतोष है। एक कमांडो ने तो प्रेस फ़ोटोग्राफ़र को फ़ोटो लेने से भी मना कर दिया। हमारे जहन में कौंध रही थी इसके विपरीत उभरती सौरव गांगूली की हवा में कमीज लहराती फ़ोटो मानो पता नहीं सिर्फ़ अपना काम ही नहीं किया कोई जंग जीती हो। यहां जंग जीते हुए लोग ( जो शायद सौरव की ही उम्र के होगें) कितने संयत थे। फ़िर भी जनता का दिया धन्यवाद बड़ी विनम्रता के साथ हल्के से अभिवादन के साथ स्वीकार कर रहे थे।
ये कहते हुए जरा झिझक सी महसूस हो रही है पर इमानदारी से बताएं तो हम भी चैनल बदल बदल कर देख रहे थे कि कौन सा चैनल सबसे अच्छी जानकारी दे रहा है (हालांकि इस बात की चिन्ता भी थी कि कहीं इस लाइव कवरेज से कमांडोस को अपना काम करने में दिक्कत तो नहीं आ रही)। हमारा वोट गया 'इन्डिया टी वी' के नाम्। इन्डिया टी वी के केमरामैन महेश, रिपोर्टर सौरभ शर्मा, प्रकाश, सरिता सिंह का काम काबिले तारिफ़ रहा। और इसी चैनल के सचिन चौधरी जो कमांडोस के साथ ताज के अंदर थे और वहां से मोबाइल द्वारा रिपोर्टिंग कर रहे थे, इस बात का ध्यान रखते हुए कि ऐसी कोई जानकारी न दी जाए जो कमांडोस के लिए मुश्किल पैदा कर दे, काबिले तारिफ़ था। पहली बार हमारा ध्यान इन मीडियाकर्मियों की तरफ़ गया जो अपनी जान का खतरा उठाते हुए बिना खाये पिए, बिना सोये रिपोर्टिग करते रहे और फ़िर भी दर्शकों का ध्यान इस बात की ओर खीचते रहे कि मीडियाकर्मी जो ताज के बाहर डटे हुए थे उन्हें तो रिप्लेसमेंट मिल जाएगी लेकिन जो कमांडोस अंदर दो दिन से पोसिशन संभाले बैठे हैं वो भी बिन कुछ खाये, सोये उन चूहों को खोज रहे हैं, बंधकों को छुड़ा रहे हैं। सबसे ज्यादा हैरानी तो हमें तब हुई जब इन्डिया टी वी के रिपोर्टर ने पकड़े हुए आंतकवादी के साथ हुई अपनी बातचीत दर्शकों तक पंहुचा दी। इतनी जल्दी ये रिपोर्टर उस आंतकवादी तक कैसे पहुंच गया, पुलिस ने उस आंतकवादी से बात कैसे करने दी इस रिपोर्टर को। सुना है सरकार ने अब इंडिया टी वी से जवाबतलब किया है कि उन्हों ने ऐसा क्युं किया। हम सरकार से पूछते हैं कि किसी को भी इस आतंकवादी के पास पहले जाने ही क्युं दिया गया।
इस आतंकी हमले में मरने वालों में जहां एक तरह कई नामी गिरामी लोग थे तो दूसरी तरह कई आम आदमी भी थे। दूसरों के जैसे हम भी उन सब के लिए उदास हैं, उनके परिवार के दुख में शामिल हैं। लेकिन मेरे ख्याल उन आतंकवादियों की तरफ़ भी जा रहे हैं, जिन्हें मैं गुस्से में चूहे कह रही हूँ। थे तो वो मुश्किल से बीस बीस साल के बच्चे, क्या देखा था उन्होंने जिन्दगी में। जिस तरह की ट्रेंनिग( शारीरिक और मानसिक) वो ले कर आये थे यकीनन वो काफ़ी वक्त से उन आकाओं के साथ रहे होगें जो अपने स्वार्थ के लिए, अपने अहं के लिए आतंकवाद को जन्म देते हैं, उनके लिए ये बच्चे सिर्फ़ बलि के बकरे से ज्यादा कुछ न थे और ये बरगलाये हुए बच्चे इस बात से बेखबर थे। मुझे पक्का यकीन है कि इन में से कोई भी बच्चा न आई एस आई के या अल कायदा के सरगनाओ का बेटा रहा होगा। ये दिन थे इनके किसी कॉलेज की कैंटीन में गाने गाते हुए लड़कियों के निहारने के, भविष्य के सपने बुनने के, ये दिन थे इनके माता पिता के अपने बच्चों को परवान चढ़ता देख हर्षाने के, लेकिन हुआ क्या? इतनी जांबाजी से मरे तो भी दुनिया भर में थू थू हुई और इनके आकाओं ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा इनके मां बाप से ' सब किस्मत की बात है, ये अल्लाह की खिदमत करने गये हैं' ,अगर अल्लाह की खिदमत करना इतना ही सबब का काम है तो मुल्ला जी खुद क्युं नहीं ये पुण्य कमाते।
बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हर तरफ़ (ये धर्म के ठेकेदार हो या नेता) इंसानी कौम अपनी मौज के लिए, अपने स्वार्थ के लिए आने वाले भविष्य की कौमों को खा रही है। हम सोच रहे हैं कि जानवरों में ज्यादा मानवता है या इंसानों में।
बहुत से ख्याल , बहुत सी भावनाएं गुजरीं मन से इन तीन दिनों में। पता नहीं क्युं इस युद्ध के लाइव कवरेज को देखते हुए मन में एक बार भी ब्लोग पर कुछ लिखने का ख्याल नहीं आया। न ही इस बात का ख्याल आया कि दूसरों ने क्या कहा वो पढ़ा जाए। सच कहूँ तो कंप्युटर का ही ख्याल नहीं आया और आप सब के जैसे ही मैं भी ब्लोगजगत की लती उस समय एक बार फ़िर टी वी लती हो गयी।
पहला ख्याल जो मन में आया वो ये कि ये अठ्ठारह बीस साल के छोकरों से लड़ने के लिए हमारे सबसे बेहतरीन सैन्य बल (जिसको मारकोस कहा जा रहा था) बुलाने की जरुरत पड़ गयी, क्या दुनिया हम पर, हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर हंस नहीं रही होगी, ओसामा बिन लादेन की विद्रुप हंसी हमारे कानों में सीसे सी पिघल रही थी।
जैसे जैसे वक्त गुजर रहा था मन मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि अब तक नहीं निकाल पाये उन चूहों को। माना कई कारण थे, निर्दोष लोग बंधक थे, ये चूहे गुर्रिला वार में दक्ष थे, हमारे कमांडोस के पास ज्यादा जानकारी उपल्ब्ध नहीं थी,(इन चूहों के पास ताज होटल के अंदर का पूरा नक्शा था, सैनिकों को ये बात पता चली उनके छूटे हुए सामान में से एक सीडी से। अगर उन्हों ने ताज के अंदर का नक्शा बना लिया था तो क्या ताज के मालिकों से हमारे सैनिकों को ताज का अंदर का नक्शा नहीं मिल सकता था। या सब लोग क्रिकेट के मैच के जैसे टी वी पर मैच देखने बैठ गये थे।) बताइए, अपने ही देश में हमारे कमांडोस को जरूरी जानकारी देने वाला कोई नहीं था, सब आसूँ बहाने में और जो शहीद हो गये उनकी जयजयकार करने में व्यस्त थे। कमांडोस तो आये रात को दो बजे जब की रात दस बजे से ये साफ़ हो गया था कि आंतकवादी ताज में छुपे बैठे हैं, क्या किसी को इस बात का ख्याल आया कि ताज के अंदर के नकशे की जरूरत पड़ सकती है और कमांडोस के आने से पहले उसे तैयार रखना चाहिए। ऐसे में याद आ रहा था इसराइलों का इन्टेबी जाना और दुश्मन को दुश्मन के ही घर पर मार कर अपने देशवासियों को छुड़ा लाना। दूसरे ही पल ये भी सोच रहे थे कि हमें क्या पता कि वहां क्या क्या किया गया, हमारी जानकारी तो मीडिया से मिली जानकारी पर ही आधारित है, शायद वो सब किया भी गया हो।
टी वी देखते देखते एक और ख्याल जो मन में उठा वो था जब नरीमन हाउस पर विजय पा ली गयी। वहां आस पास के लोगों ने सड़कों पर उतर कर इस जीत का जशन मनाया, गदगद हो कर सैनिकों का धन्यवाद किया गया, उन पर फ़ूल बरसाये गये। हम भी फ़ूले नहीं समा रहे थे और अपने कमांडोस पर उतना ही गर्व महसूस कर रहे थे जितना वहां की जनता जता रही थी। लेकिन हमने देखा कि कमांडोस इस सारी वाहवाही से अनछुए चुपचाप जाकर बसों में बैठ गये वापस ताज की तरफ़ जाने को। ये थे असली हीरो- जान पर खेल कर भी अपने काम को अंजाम तक पहुंचाने के बाद भी किसी तारीफ़ की अपेक्षा नहीं। मन में ये भाव कि इसमें बड़ाई क्या है, हमने अपना काम किया है जैसे सब करते हैं , हां ! काम ठीक ठाक संपन्न हो गया इस बात का संतोष है। एक कमांडो ने तो प्रेस फ़ोटोग्राफ़र को फ़ोटो लेने से भी मना कर दिया। हमारे जहन में कौंध रही थी इसके विपरीत उभरती सौरव गांगूली की हवा में कमीज लहराती फ़ोटो मानो पता नहीं सिर्फ़ अपना काम ही नहीं किया कोई जंग जीती हो। यहां जंग जीते हुए लोग ( जो शायद सौरव की ही उम्र के होगें) कितने संयत थे। फ़िर भी जनता का दिया धन्यवाद बड़ी विनम्रता के साथ हल्के से अभिवादन के साथ स्वीकार कर रहे थे।
ये कहते हुए जरा झिझक सी महसूस हो रही है पर इमानदारी से बताएं तो हम भी चैनल बदल बदल कर देख रहे थे कि कौन सा चैनल सबसे अच्छी जानकारी दे रहा है (हालांकि इस बात की चिन्ता भी थी कि कहीं इस लाइव कवरेज से कमांडोस को अपना काम करने में दिक्कत तो नहीं आ रही)। हमारा वोट गया 'इन्डिया टी वी' के नाम्। इन्डिया टी वी के केमरामैन महेश, रिपोर्टर सौरभ शर्मा, प्रकाश, सरिता सिंह का काम काबिले तारिफ़ रहा। और इसी चैनल के सचिन चौधरी जो कमांडोस के साथ ताज के अंदर थे और वहां से मोबाइल द्वारा रिपोर्टिंग कर रहे थे, इस बात का ध्यान रखते हुए कि ऐसी कोई जानकारी न दी जाए जो कमांडोस के लिए मुश्किल पैदा कर दे, काबिले तारिफ़ था। पहली बार हमारा ध्यान इन मीडियाकर्मियों की तरफ़ गया जो अपनी जान का खतरा उठाते हुए बिना खाये पिए, बिना सोये रिपोर्टिग करते रहे और फ़िर भी दर्शकों का ध्यान इस बात की ओर खीचते रहे कि मीडियाकर्मी जो ताज के बाहर डटे हुए थे उन्हें तो रिप्लेसमेंट मिल जाएगी लेकिन जो कमांडोस अंदर दो दिन से पोसिशन संभाले बैठे हैं वो भी बिन कुछ खाये, सोये उन चूहों को खोज रहे हैं, बंधकों को छुड़ा रहे हैं। सबसे ज्यादा हैरानी तो हमें तब हुई जब इन्डिया टी वी के रिपोर्टर ने पकड़े हुए आंतकवादी के साथ हुई अपनी बातचीत दर्शकों तक पंहुचा दी। इतनी जल्दी ये रिपोर्टर उस आंतकवादी तक कैसे पहुंच गया, पुलिस ने उस आंतकवादी से बात कैसे करने दी इस रिपोर्टर को। सुना है सरकार ने अब इंडिया टी वी से जवाबतलब किया है कि उन्हों ने ऐसा क्युं किया। हम सरकार से पूछते हैं कि किसी को भी इस आतंकवादी के पास पहले जाने ही क्युं दिया गया।
इस आतंकी हमले में मरने वालों में जहां एक तरह कई नामी गिरामी लोग थे तो दूसरी तरह कई आम आदमी भी थे। दूसरों के जैसे हम भी उन सब के लिए उदास हैं, उनके परिवार के दुख में शामिल हैं। लेकिन मेरे ख्याल उन आतंकवादियों की तरफ़ भी जा रहे हैं, जिन्हें मैं गुस्से में चूहे कह रही हूँ। थे तो वो मुश्किल से बीस बीस साल के बच्चे, क्या देखा था उन्होंने जिन्दगी में। जिस तरह की ट्रेंनिग( शारीरिक और मानसिक) वो ले कर आये थे यकीनन वो काफ़ी वक्त से उन आकाओं के साथ रहे होगें जो अपने स्वार्थ के लिए, अपने अहं के लिए आतंकवाद को जन्म देते हैं, उनके लिए ये बच्चे सिर्फ़ बलि के बकरे से ज्यादा कुछ न थे और ये बरगलाये हुए बच्चे इस बात से बेखबर थे। मुझे पक्का यकीन है कि इन में से कोई भी बच्चा न आई एस आई के या अल कायदा के सरगनाओ का बेटा रहा होगा। ये दिन थे इनके किसी कॉलेज की कैंटीन में गाने गाते हुए लड़कियों के निहारने के, भविष्य के सपने बुनने के, ये दिन थे इनके माता पिता के अपने बच्चों को परवान चढ़ता देख हर्षाने के, लेकिन हुआ क्या? इतनी जांबाजी से मरे तो भी दुनिया भर में थू थू हुई और इनके आकाओं ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा इनके मां बाप से ' सब किस्मत की बात है, ये अल्लाह की खिदमत करने गये हैं' ,अगर अल्लाह की खिदमत करना इतना ही सबब का काम है तो मुल्ला जी खुद क्युं नहीं ये पुण्य कमाते।
बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हर तरफ़ (ये धर्म के ठेकेदार हो या नेता) इंसानी कौम अपनी मौज के लिए, अपने स्वार्थ के लिए आने वाले भविष्य की कौमों को खा रही है। हम सोच रहे हैं कि जानवरों में ज्यादा मानवता है या इंसानों में।
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