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January 26, 2008

ये है बोम्बे मेरी जां

60 के दशक में जब हम पहली बार बम्बई आये अपने पूरे बोरिया बिस्तर समेत तो हमारे सबसे छोटे मामा और सबसे छोटे चाचा भी आये। जिन्हों ने बम्बई न देखा हो उनके लिए आज भी बम्बई का जबरदस्त आकर्षण है, तब भी था, इस ख्याल से कि हमारी बहन अब बम्बई वासी होने जा रही है मामा ऐसे पुलकित थे मानो हम लोग विदेश में बसने जा रहे हैं। मामा चाचा दोनों जवां, अभी अभी कॉलेज की पढ़ाई खत्म कर के निकले थे। आखों में कई बेसिर पैर के सपने। रोह सुबह दोनों बसों के रूट समझ कर बम्बई की सड़के नापने निकल जाते। मन में आस होती कि शायद अपनी मन पसंद हिरोइन स्टुडियो जाती दिख जाए और इनका जीवन धन्य हो जाए। उम्र का तकाजा था, आई टॉनिक भी खूब पीते थे। लेकिन संतुष्ट नहीं।
हमारे एक रिश्तेदार जो बरसों से बम्बई में थे उनसे ये दोनों बहुत खुले हुए थे,रोज शाम को उन रिशतेदार के घर महफ़िल जमती, हम भी शामिल होते। मेरे मामा और चाचा आहें भरते, बम्बई का नाम तो बहुत है पर अपने दिल्ली जैसी बात नहीं
क्युं भाई
अरे यहां कोई लड़की चलती ही नहीं , सब दौड़ती हैं, बस के पीछे, ट्रेन के पीछे, दिल्ली की लड़कियों को देखो, सुबह कॉलेज के लिए भी निकलें तो पूरी सज संवर कर, काजल लिप्सटिक से लैस, और यहां देखो, कोई इक्का दुक्का लड़की हील वाली सैंडल पहने मिलेगी, सब फ़्लैट चप्प्लें पहने हुए। इनको देख कर कोई कवि क्या लिखेगा "क्या चाल है तोरी"। यहां की लड़कियों को न कपड़ा पहनने का शऊर है न चलने का।
अरे भाई हील पहनेगी तो दौड़ कर बस या ट्रेन कैसे पकड़ेगी, हमारे रिश्तेदार समझाते। बसें तो तब भी भरी हुईं आती थी, और लोकल ट्रेन तो एक मिनिट भी मुश्किल से रुकती है।
मेरे मामा चाचा तो खैर निराश हो कर चले गये, लेकिन आज इतने साल बाद भी कुछ नहीं बदला है। उलटे आवास दफ़तर से और दूर चले गये है शहर की परिधी बढ़ गयी है।
बम्बई में लगभग 99% औरतें काम पर जाती हैं। एक साधारण महिला जो नारीमन पॉइंट पर काम करती है और डोंबिवली या विरार रहती है, उसकी दिनचर्या सुबह पांच बजे से शुरु होती है। सुबह उठ कर पतिदेव के लिए, बच्चों के लिए डब्बे बनाने, बच्चों को तैयार करना, बाई भी सुबह 6 बजे तक आ जाती है उससे पूरा काम करवाना,एक कप चाय बैठ कर पी सके ऐसा तो नसीब कहां, खड़े खड़े ही बच्चों को तैयार करते हुए ठंडी चाय एक ही सांस में गटक ली जाए तो गनीमत है, कभी कभी वो भी भूल जाती है।
सुबह सात बजे बच्चों को लगभग खीचते हुए स्कूल में छोड़ना, फ़िर लगभग भागते हुए, हांफ़ते हुए प्लेटफ़ार्म पर पहुंचना,ये मुए रेलवे वाले भी प्लेट्फ़ार्म दरवाजे के पास ही क्युं नहीं बना देते, ब्रिज चढ़ना पड़ता है, मन में गुमड़ते विचार- गैस बंद की कि नहीं, घर की चाबी ली की नहीं। ये ट्रेन क्युं नही आई अभी तक, आज फ़िर लेट का रिमार्क लगेगा, ये रेलवे वाले भी ट्रेन क्युं टाइम पर नहीं चला सकते।प्लेट्फ़ार्म के किनारे तक जा जा कर झांकना, मानों इसके इस तरह लटकने से ट्रेन जल्दी आ जाएगी। दूर से ट्रेन आती दिखे तो साड़ी उठा कर कमर में खौंस लेना, बैग आगे कर लेना जेबकतरों के डर से, देख कर ऐसा लगता है मानों कोई शेर शिकार करने को तैयार हो। गाड़ी नजदीक आते ही कूद कर अंदर घुसने की कौशिश न करे तो पूरे एक घंटे का सफ़र खड़े खड़े ही गुजारना पड़े।दरवाजे के पास मच्छी वालीयां अपनी टोकरी लिए मजे से बतियां रही हैं यहां नाक सड़े जा रही है।क्या करें पंगा भी तो नहीं ले सकते।
एक घंटे बाद वी टी पर या चर्चगेट उतर फ़िर बस की लाइन में लगो नारिमन पॉंइंट जाने के लिए, टेक्सी वाले मुए डबल दाम मांगते हैं, अब रोज रोज टेक्सी करो तो बचाओ क्या? जैसे तैसे दफ़्तर पहुंच कर सांस में सांस आती है। फ़ौरन केंटीन वाले को गरम चाय का ऑर्डर, अब जाके दिन की पहली चाय ठीक से पी है वो भी मनों शक्कर के साथ, मुंह कड़वा हो जाता है, हजार बार समझाया कि इतनी शक्कर न डाले पर वो तो एक कान से सुन दूसरे से बाहर्। रोज सोचती है कल से थर्मस में अपनी चाय लाएगी पर वक्त ही नहीं मिल पाता।
शाम चार बजे से नजरें घड़ी की सुइयों पर अटक जाती हैं जैसे ही पांच बजे वो बैग वैग ले कर दफ़तर से आनन फ़ानन में बाहर, बॉस बोलता है सब कामचोर हैं, मुफ़त में तन्ख्वाह लेना चाहती हैं , वो एक कान से सुन दूसरे कान से बाहर निकाल देती है। तेज तेज चलते चलते सब्जी का थैला बैग से बाहर निकल आता है। भाजी पाला खरीद भारी भरकम थैलों के साथ वी टी स्टेशन और फ़िर शेर के शिकार करने जैसे कूद कर गाड़ी में घुसना ताकि सीट मिल सके, अगर खिड़की के पास वाली सीट मिल जाए तो क्या बात है। सीट मिलते ही वो अपने दुखते पैरों में से चप्पल निकाल पांव फ़ैलाने की कौशिश करती है। सब्जी निकाल वहीं छीलना, काटना, टाइम मैनेंजमैंट में परांगत( बॉस कुछ भी सोचे), एक घंटे बाद डोंबिवली स्टेशन आने से एक स्टेशन पहले वो खड़ी हो जाती है। जितना सुबह चढ़ना मुशकिल है उतना ही शाम को उतरना। सबसे आसान तरीका है भीड़ के आगे खड़े हो जाओ, भीड़ खुद बखुद ढ्केल देगी।
स्टेशन उतर फ़िर वही मुआ ब्रिज चढ़ो, गनिमत है स्टेशन के बाहर ही गरमागरम रोटियां मिल जाती है, दो रुपये की एक, दस रोटियां पैक करवा, रास्ते में से बच्चे को बेबी सिट्टर के पास से वापस ले सात बजे घर पहुंचती है, सामान पटक बच्चे की दिन भर की जमी बातें सुनती सीधे किचन में, ट्रेन में काटी भाजी को छोंकना, पतिदेव के आने से पहले, गंदे कपड़े मशीन में डालना, घर बेतरदीबी से बिखरा पड़ा है उसे संभालना, दूसरे बच्चे का होम वर्क, यूनीफ़ार्म को प्रेस, किताबों को कवर चढ़ाना, करते करते रत के 11 बजे किचन साफ़ कर बिस्तर पर पड़ रहना।
अब बताइए कब हाई हील की चप्प्ले पहने या लिप्स्टिके लगाए, शीशे में ठीक से शक्ल देखे भी हफ़्तों गुजर जाते हैं। इतवार के दिन कोई किसी के घर आता जाता नहीं, पूरे हफ़ते की थकान निकालनी और नींद पूरी करनी, फ़िर नये हफ़ते इस भट्टी में झोकें जाने के लिए

तैयार्।

हर हाल में चेहरे पर हसीं बरकरार, ये है बोम्बे मेरी जान

January 24, 2008

मिनाक्षी जी बम्बई में



23/1/08



मिनाक्षी जी बम्बई में



आज हम मिनाक्षी जी से मिलने बोम्बे हॉस्पिटल गये। वो अपने 21-22 वर्षिय पुत्र, वरुण के साथ आयी हुई हैं उसका इलाज करवाने। उनका पुत्र 13 वर्ष की उम्र से जोड़ो के दर्द से पीड़ित है और असहनीय दर्द से जूझ रहा है। इतने जवान बच्चे को बैसाखियों के सहारे खड़े होते और व्हील चैअर पर बैठते देख दिल रो उठा। मिनाक्षी जी से मैं पहली बार मिल रही थी, यूं तो रोज ही चैट पर बतियाते हैं, पर उन्होने कभी वरुण की बिमारी का जिक्र नहीं किया था, इस लिए देख कर बड़ा धक्का लगा।



हम वहां करीब दो बजे पहुंचे तो देखा दोनों मां बेटा हमारे इंतजार में थे। मां तो मां बेटा भी जिज्ञासु था इस ब्लोगरनी को देखने के लिए। एक दूसरे को देखते ही मन ऐसे खिल गया जैसे हम एक दूसरे को बरसों से जानते हों, सब नेट का कमाल है। गले मिलने के बाद शुरु हुआ बातों का दौर्। वरुण को खास जिज्ञासा इस लिए थी कि मिनाक्षी जी ने उसे बताया था कि हम मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर हैं।

वरुण यूं तो इलक्ट्रोनिक इनजिनियरिंग के लास्ट सेमेस्टर में है, पर उसे मनोविज्ञान में भी काफ़ी रुचि है। हमारे हाथ में एक बड़ा सा थैला था, उनकी जिज्ञासा होना लाजमी था, हमने बताया कि हम एक पुस्तक प्रदर्शनी से आ रहे हैं और कुछ किताबे खरीद कर लाए हैं, सुनते ही वरुण की आखें चमक उठीं। पता चला वो किताबे पढ़ने का बहुत रसिया है, वो उठने की कौशिश करने लगा तो हमने फ़ौरन किताबों का थैला उसके बिस्तर पर रख दिया। उन किताबों में एक किताब शेयर मार्केट पर थी बस वहीं से शेयर का विषय छिड़ गया।

पता चला वरुण शेयर मार्केट में उतरना चाह्ता है पर उसे पता नहीं कि कैसे उतरा जाए, हमें जो भी अधकचरा ज्ञान है उसी के बल पर हम शेखी बघारते रहे और वो बिचारा हम से इम्प्रेस्ड होता रहा। अभी ये बातों का दौर चल ही रहा था कि नर्स आ गयी वरुण को एक्स रे के लिए ले जाना था। बड़े अनमने मन से वरुण उठा, दरवाजे के पास पहुंच मिनाक्षी जी से पूछा आंटी कब तक रहेंगी, हम समझ गये कि अभी उसका मन हमारी बातों से भरा नहीं और उसको डर है कि उसके वापस आने तक हम चले जाएंगें। हमने वादा किया कि हम उसके आने तक रुकेगें, तब वो मुस्कुरा कर व्हील चैअर पर बैठ गया।



उसकी मुस्कुराहट मिनाक्षी को भी आनंदित कर गयी। हमने किसी और ब्लोग पर मिनाक्षी जी के अतिथी सत्कार के बारे में पढ़ा था, वरुण के जाने के बाद उन्हों ने उसी आवभगत का परिचय दिया। हम कहते ही रहे कि आप हॉस्पिटल में हैं और आवभगत की कोई जरुरत नहीं पर वो कहां मानने वाली थी, झट से दुबई से लाई मिठाई और कई प्रकार के व्यंजन हमारे सामने आ गये।



थोड़ी देर में वरुण भी लौट आया, साथ में डाक्टर भी, डाक्टर के जाने के बाद बातों का सिलसिला फ़िर से शुरु हुआ। अब की बार हम स्टुडेंट बने और वरुण मास्टर, हम जानना चाह्ते थे ऐसी कौन सी साइट्स है जहां मुफ़्त में प्रूरी किताब पढ़ी जा सकती हैं, मुफ़तिया है न हम्। वो हमको समझाता रहा कि कैसे उन साइट्स पर जाएं। करते करते शाम के चार बज गये। हम अब लौटना चाहते थे, घर वहां से कोई 40 किलोमीटर की दूरी पर है और हम सुबह से निकले थे। ये हमारी मजबूरी थी वर्ना तीनों में से किसी का मन नहीं भरा था।


वो एक दो घन्टों में ही हम एक दूसरे के साथ ऐसे जुड़ गये कि हमें लग रहा था मानों अपनी बहन को छोड़ कर जा रहे हैं। मिनाक्षी जी ने मना करने के बावजूद जबरन ढेर सारी मिठाई दे कर हमें विदा किया और घर पहुंचते ही फ़ोन पर सलामती की खबर देने को कहा। बहुत अच्छा लगा सुन कर, कई बरसों बाद ऐसी हिदायत सुन रहे थे।


छ: बजे हम घर पहुंचे, पहुंचते ही मिनाक्षी जी को फ़ोन किया, रास्ते में ही हमने मन बना लिया था, उनसे कह दिया कि 25 को फ़िर मिलने आयेगें। फ़ोन पर ही हम मह्सूस कर सकते थे कि उन्होंने सकोंचवश कहा नहीं था पर उनके मन की बात कह रहे थे, उनकी खुशी उनकी आवाज में झलक रही थी।


सच इस हिन्दी ब्लोगरी ने हमारी तो दुनिया ही बदल कर रख दी है। इतने अच्छे अनुभव होने के बाद लगता है कि अगर और ब्लोगर मित्रों से भी मुलाकात हो कितना अच्छा हो। इस पोस्ट को पढ़ने वाले सभी दोस्त बम्बई में आमंत्रित हैं……:)

January 22, 2008

मात्र झलक

 

 

कल युनुस जी के निमंत्रण पर हम पति समेत विविध भारती के  स्टुडिओ पहुंचे थे, हमारे अलावा बोधीस्तव और आभा जी और दो और जोड़े वहां पहुंचे थे। विविध भारती की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर विविध भारती  कई खास कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है, पिछ्ले महीने आय आय टी के छात्रों के साथ एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था और इस महीने प्रेम और दांपत्य जीवन पर विशेष कार्यक्रम करने का आयोजन था। कुल चार जोड़े आमंत्रित थे, शायद उम्र के हिसाब से। एक जोड़ा 70 -74 साल का, फ़िर हम 50-55 तक, फ़िर बोधिस्तव जी का जोड़ा 40 -44 तक और तीसरा जोड़ा 20-30 साल तक का जो अभी भी विवाह बंधन में बंधने के लिए माता पिता की सहमति का इंतजार कर रहे हैं। प्रोग्राम कुछ कुछ मौज मस्ती की प्रतियोगिता के रुप में था, सुधीर दलवी(शिरडी के सांई बाबा में सांई बाबा की भूमिका निभाने वाले) और हिमानी शिवपुरी(कुछ कुछ होता है में हॉस्टल के मैट्रन का रोल निभाने वाली) जज थे। उम्र के अलावा चारों जोड़े अलग अलग प्रांतों से- सबसे प्रौढ़ जोड़ा गुजरात से, हमारा जोड़ा पंजाब और केरला का मिश्रण, बोधिस्तव जी का जोड़ा उत्तर प्रदेश से, और सबसे युवा जोड़ा महाराष्ट्र से।

प्रोग्राम के सूत्रधार थे युनुस जी और ममता जी( ये भी एक जोड़ा अपनी अस्ली जिन्दगी में)।

प्रोग्राम बहुत मजेदार रहा, करीब 3 बजे से रात के साढ़े सात बजे तक रिकॉर्डिग हुई। शादी से पहले से लेकर आज तक की दांपत्य जीवन पर अनेक सवाल, कुछ के जवाब पहले ही एक फ़ार्म पर भरवा लिए गये थे और फ़िर मिला कर देखा जा रहा था कि हम एक दूसरे के बारे में कितना जानते  हैं। पांच इनाम रखे गये थे सिर्फ़ मौज के लिए- बेस्ट जोड़ा, बेस्ट पति, बेस्ट पत्नी, बेस्ट प्रेमी, बेस्ट प्रेमिका।

बेस्ट जोड़े का इनाम तो सबसे प्रौढ़ जोड़े को मिलना चाहिए इस में किसी की दो राय नहीं थी। वो जोड़ा ऐसा जोड़ा था जिन्हों ने शादी पहले की और प्रेम बाद में, ठ्क्कर जी  जब पूछा गया कि अगर उनकी शादी उनकी पत्नी से न हो पाती तो क्या वो जान पर खेल जाते, उन्होंने कहा अगर हम  शादी से इन्कार कर देते तो हमारे घरवालों की जान पर बन आती क्योंकि लड़की  तो घर वालों ने ही पंसद की  थी। ये जोड़ा शादी की शायद 40वीं साल गिरह मना चुका है। सुन कर बहुत अच्छा लगा कि आज से 40 साल पहले भी वो न सिर्फ़ लड़की को देखने गये बल्कि उसके साथ 8 दिन घूमे भी, भावी पत्नी के लिए गीत भी गाए। हमें तो लगा था कि उस जमाने में लड़का लड़की एक दूसरे को शादी के बाद ही देख पाते थे।

बोधिस्तव जी से पूछा गया कि आभा जी के जूते का नंबर क्या है तो बोले छ: जबकी आभा जी ने लिखा था पांच, गलत जवाब, अब बोधी जी थोड़ा खिसिया गये, तुंरत बोले नहीं बाटा का छ: और वुडलैंड का पांच। हा हा हा….… आभा जी के वजन में भी गड़बड़ा गये (उठाने की प्रेक्टिस छूट गयी लगती है…।:))

एक जवाब जो सब पतिदेव ठीक से दे सके, वो था पत्नी का मनपंसद हीरो, हमें भी सुन कर आश्चर्य हुआ कि सबसे छोटी भावी पत्नी से लेकर सबसे प्रौढ़ पत्नी तक सब का एक ही जवाब था- अमिताभ बच्चन। ऐसा क्या है अमिताभ में, उस पर फ़िर कभी चर्चा करेंगें।

हां बोधी जी और हमारे पतिदेव की मनपंसद हिरोइन एक ही थी- वहिदा रहमान्।

बेस्ट प्रेमी और प्रेमिका का खिताब तो सबसे युवा जोड़े को मिलना ही था जिनकी अभी शादी नहीं हुई, बाकी बचे थे बेस्ट पति और बेस्ट पत्नी का खिताब, तो बेस्ट पति का खिताब मिला विनोद जी को (मेरे पतिदेव) और बेस्ट पत्नी का खिताब मिला आभा जी को……:)

और भी बहुत कुछ था लेकिन मैं सब बता दूंगी तो आप सुनेंगें क्या? 3 फ़रवरी को दोपहर 2।30 बजे से शाम 5।30 तक सुनिए न मजेदार नौंक झौंक विविध भारती पर्। ये तो  मात्र झलक है।

और हां,  कल कई  और यादें ताजा हुईं तो वो भी आप के साथ बांट रही हूं लेकिन दूसरी पोस्ट के रूप में। आशा है की आप उसे भी झेल ही लेंगें।