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October 25, 2007

कंगारू

कंगारू
टी 20 इंटरनेशनल जीतने की खुशी में ताज इंटर्कॉटिनेट्ल में एक रात्री भोज का आयोजन हुआ। धोनी की तरफ़ से खास न्यौता आया, आखिर पुराने छात्र हैं हमारे, हाँ ये बात और है कि वो कभी क्लास में न नजर आये और उनका नाम हमारी ब्लैक लिस्ट में था। पर आज हमारे मन में कोई शिकायत नहीं थी, आखिरकार टी 20 जीत देश का नाम रौशन किया था, और फ़िर ताज जैसे महंगे हॉटेल में भोज, वो भी एकदम मुफ़्त्।

हॉटेल पहुंचे तो देखा कई राजनेता, फ़िल्लम इस्टार, मिडिया वाले और न जाने कौन कौन धोनी को बगल में पोस्टर सा चिपकाये फ़ोटू खिचवाये रहे हैं। सिर्फ़ आखों से अभिवादन का आदान प्रदान हुआ, धोनी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान, मानो कहते हो, देखा तुम तो कहती थी ऐसे ही चला तो वी टी स्टेशन पर चने बेचते नजर आओगे, वैसे भी अंग्रेजी आती नही, अगूंठा छाप कहीं के, उस फ़ट्फ़टिया की ड्राइवरी करते नजर आओगे, अब कौन से चने के झाड़ पर बैठे है हम्। फ़ीकी सी हंसी के साथ हमने हां में सिर हिलाया। समझ गये कि ये वक्त रिश्तों के सेतु संवारने का नहीं।

इधर उधर नजर दौड़ाई तो एक तरफ़ कौने में ऑस्ट्रेलियन खिलाड़ी गंभीर चेहरे लिए किसी गहरी मत्रंणा में डूबे नजर आये। कोई उनकी तरफ़ ध्यान न दे रहा था, न वो किसी की तरफ़ ध्यान दे रहे थे। उनके बगल वाली खाली टेबल हमें सबसे सुरक्षित लगी धोनी के फ़ारिग होने का इंतजार करने के लिए। फ़िर हमारी कान लगाने की पुरानी आदत जायेगी थोड़े न।

रिक्की पोटिंग - जो हुआ बहुत बुरा हुआ, इनका तुक्का दूसरी बार कैसे चल गया। समझ नहीं आ रहा, ये लोग तो हार स्पेशलिस्ट हैं, जीती हुई बाजी एन वक्त पर छोड़ देना इनकी फ़ितरत है, कहां गयी इनकी संस्कृती अतिथी दैवो भव:, पहले आप्। सच्ची बहुत बतमीज हो गये हैं।दुनिया में हमारी क्या साख रह जायेगी।

मैथ्यु- मेरी बीबी का तो ऑलरेडी स म स आ चुका है- तलाक, तलाक , भला उसकी भी कोई इज्ज्त है कि नहीं, क्या मुहं दिखाय अपनी सहेलियो को, उसका पति एक टुच्ची सी बच्चों वाली टीम से हार गया।

साइमंड- मौका मिलने दो, हनुमान बन इनकी लंका में आग न लगाई तो मेरा नाम भी बंदर, सॉरी, साइमंड नहीं।

रिक्की- चुप यार, हमेशा कन्फ़्युजड रहता है, अबे अपुन इन्डियीन टीम से हारे हैं, श्री लकंन टीम से नहीं ( हालाकिं अब ये रोज होगा ऐसा ख्तरा बड़ता जा रहा है)और ये हनुमान कौन है?

मन्ने तो लागे है जी कि ये सारा किया धरा शाहरुख खान का है। जिधर जाता है जीत उसके पीछु पीछु लग लेती है। अब बताओ, इन्ने कोई काम न हे जो किरकिट देखन साउथ अफ़्रिका आ गये।
हाँ सही कह रहे हो बंधु, क्यों न शाहरुख को अपनी टीम का चियर लीडर का अनुबंध दिया जाए। ये चियर लिडरनियां तो जी जरा लकी न निकलीं। लेकिन रिक्की भाई एक बात एकदम क्लीयर कर दियो, ये शाहरुख चक दे इंडिया न बोले।

क्लार्क- हाँ, मन्ने तो लागे है ये चक दे इंडिया गाना ही अपनी वाट लगाये है। मैं जब भी इनको घेरु हूँ, वो डी जे चक दे चक दे लगा दे और पूरा स्टेडियम खड़ा हो जावे। अब ये तो भई ज्यासती है ने हम बिचारे 11 और ये लोग 11000, कोई न्याय है भला, दिल तो करता था इस चक दे को चक्कु से चॉक ही कर दूं।
ब्रिट ली गंभीर मुद्रा में अब तक गिटार के तार ठीक कर रहे थे, बोले - मुझे लगता है ये दीपिका पदुकौन को स्टेडियम में आने से रोकना होगा।
रिक्की अचकचाए कौन दीपिका, और सुन्दर कन्या को आने से क्युं रोकना होगा, सुन्दर नजारे न हुए तो पूरी रात मैदान में कैसे कटेगी।
ब्रिट- तुम देखे न भैया, उसकी एक शर्मिली सी मुस्कुराहट पर धोनी कैसे घूम जाता था, बॉल सीधा स्टेडियम की छ्त को छूती दीपिका के पैरों पर गिरती। भई, इनका तो इश्क का तोहफ़ा हो गया खेल खत्म होने से पहले, इधर छ्क्का मान लिया गया।
एड्म- सही कहते हो, शोनाली का नाम भी उस लिस्ट में जोड़ो, श्रीसंत को देखा, उसे देख कैसे बलियों उछ्लता है।
रिक्की- दरअसल एक दो को छोड़ सब छ्ड़े छांट भर लिए है टीम में। खेलते तो है क्रिकेट पर जेन्टलमैन वाली कोई बात नहीं रह गयी। दे आर ऑल आउट टू इम्प्रेस गर्ल्स्। मंत्रणा चल ही रही थी कि खाना आ गया।

रिक्की- आइडिया

बाकी सब- क्या , क्या,

रिक्की- क्युं न अपनी सरकार से सिफ़ारिश करे कि इन्हे वो कंगारू गेहूं भेज दें, वो लाल वाले।
रिक्की ने आखँ मारी, सब हस पड़े, सही है गुरु, क्या सोचा है, ये मारा चौका। कगांरु गेंहू का के ये कंगारू और कगांरुओ से निपटना हमे आता है( मानो कहते हो हारी बाजी को जीतना हमें आता है …हम सिंकदर हैं …।) ही ही ही

(मेरे एक छात्र के अनुसार पहली पंक्ती परिक्षा में जो लिखी जानी चाहिए वो है"नीचे लिखे सारे उत्तर काल्पनिक है, किसी भी किताब से किसी भी प्रकार की कोई भी समानता महज इत्तेफ़ाक है, इरादतन नहीं)

तो हम भी यही कहना चाह्ते हैं कि ऊपर लिखी सब घटनाएं कोरी काल्पनिक हैं ,किसी को दुख/ठेस पँहुचाने का मेरा कोई इरादा नहीं, ये सिर्फ़ मजे के लिए लिखा गया है।




October 22, 2007

आलोक जी का रावण

आलोक जी का रावण

आलोक जी के रावण को देख एक दृश्य मेरे जहन में कौंध रहा है, आप भी देखिए।रावण ज्ञानद्त्त जी के सैलून जैसे ड्ब्बे में सफ़र कर रहा था, फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि ज्ञानदत्त जी अकेले सफ़र करने का मजा लूट सकते हैं साथ में सिर्फ़ अर्दली और रावण लालू की तरह लंबी चौड़ी ताम झाम साथ में लिए सफ़र कर रहा था, नौकर चाकर, प्रेस वाले , कुछ कंपनियों के सेल्समेन, कुछ सुरक्षा कर्मी और पता नहीं कौन कौन्।

सफ़र करते हुए वो अपने मोबाइल के बिल बाँच रहा है और मंदोदरी ड्रेसिंग टेबल पर बैठी गिन गिन कर अपने सफ़ेद बाल नोच रही है। बालों की लहलहाती ख्रेती तेजी से गायब हो रही है, मंदोदरी परेशान है। बाल तो रावण भी अपने नोच रहा है, आलोक जी ने सही कहा, रावण बिचारा लोन कन्या के गच्चे में आ गया। दरअसल हुआँ यूं कि लोन कन्या की आवाज सीता जी से इतनी मिलती थी कि रावण को लगा वहीं है, सोचा, अगर पाचँ द्स मोबाइल लेने से मामला फ़िट हो जाता है तो सौदा महंगा नहीं। अब बिल आया तो पता चला कि मामला तो कुछ और ही था।वो राम ने कोई लोचा कर दिया था फ़िर से।पहले भी एक बार ऐसी खुराफ़ात की थी उसने किसी बंदर को भेज दिया था। सब अच्छे पतियों की तरह रावण ने भी फ़ाइनेंस मिनिस्टर, होम मिनिस्टर का पद भार मंदोदरी को दे रखा था, अब परेशानी ये कि मंदोदरी के सवालों के क्या जवाब देगें, सवाल करने पर आ जाए तो बड़े बड़े वकीलों के भी कान काट दे। एक तो ये पेचीदा बिल, ऊपर से उनका भुगतान करने के लिए अशोक वाटिका गिरवी रख चुके थे, अब मंदोदरी को क्या बताते, इश्क में बाल कहां तक नुचे।

मामले को सभांलने के इरादे से मंदोदरी का मनुहार करते हुए अपने ज्ञान का बखान करते हुए बोले तुम क्युं अपने बाल यूं नौचती रहती हो, बालों को रंग क्युं नही लेती, तपाक से लॉरइल वाला सेल्समेन शुरु हो गया- महारानी साहिबा महाराज ने क्या पते की बात कही है, ऐसे ही थोड़े चहु दिशाओं में महाराज के ज्ञानी होने के डंके बजते। अब देखिए बाल रंगने के कितने फ़ायदे हैं, इत्ते सालों से वही काले बाल देख देख कर आप बोर नहीं हो गयीं , अब ये सफ़ेद बाल तो आप का पेंटिग का कैनवास है, रोज जिस कलर की साड़ी पहनो उसी रंग के बाल रंगो, न्यु लुक एवेरी डे, मैचिंग सैंडल( कहाँ मिलते हैं समीर जी बता देंगे), मैचिंग पर्स, मैचिंग लिपस्टिक, मैडम एश्वर्या भी नहीं नहीं सीता भी पानी भ्ररेगी आप के सामने।
बात तो महारानी को अच्छी लगी पर अभी भी एक परेशानी की शिकन माथे पर थी, बोली लेकिन मैने तो सुना है कि बाल रंगने से बाल गिरने लगते है, ऐसे तो मै बहुत जल्द गंजी हो जाऊंगी। रावण ने सोचा मामला हाथ से निकला जा रहा है, फ़टाक से बीच में कूद पड़े, अरे प्रिय तुम तो मुझे हर हाल में अच्छी लगती हो( बस मोबाइल के बिल के बारे में न पूछना) गजीं भी हो गयीं तो क्या हम फ़िर भी नुक्कड़ के फ़ूलचंद से तुम्हारे लिए सर पर सजाने को गुलाब लाएगे, बालों मे खोस न सके तो क्या सेल्वटेप है न चिपकाने को, जहां चाह वहां राह्। इनफ़ेक्ट, जुलियस सीजर के ताज सा गुलाबों का मुकुट कैसा रहेगा।
बीच में दूसरा सेल्स मेन टपक पड़ा, महारानी जी महाराज बिल्कुल सही कहते हैं, जिसकी बीबी गंजी उसका भी बड़ा नाम है, मेरी कंपनी की क्रीम लगा दो लाइट का क्या काम है। इनफ़ेक्ट महाराज मैं तो निवेदन करुंगा की आप ऐसा कानून ही बना दें कि लंका में समस्त प्रजा आज से अपने सर मुंड्वा दे, जो भी दानव दानवनियां लंबे बालों वाले पाये गये वो देश द्रोही माने जाएगे और उन्हें देश निकाला दे दिया जाएगा, आखिर लबें बाल तो वानरों की निशानी है, देखा नहीं था वो बदंर, कित्ता तुफ़ान मचा कर गया था पुरी लंका बर्बाद कर गया था। हनुमान के उत्पात की याद आते ही महाराज का खून खौलने लगा। उस सेल्समेन ने सोचा लौहा गरम है एक हथौड़ा और मार ही दें सेफ़्टी के लिए, महारानी की तरफ़ मुड़ कर बोला और फ़िर महारानी साहिबा महाराज को ही देखिए बाल आगे से यूं जा रहे है जैसे लो टाइड में समुद्र का पानी पीछे खिसक लेता है अब ये आधे अधुरे बाल महाराज की पर्सनलिटी के साथ शोभा नहीं न देते, या तो है या नही है, ये क्या अयौध्या के मंत्रियों की तरह कभी कहते है हम सहमत भी है और नही भी। पर्सनलिटी तो हमारे महाराज की है, एक बार जो स्टेंड ले लिया बस ले लिया अब जीतेगे या मरेगें और महारानी जी आप इस टुच्चे रंगरेज की बातों में न आइएगा, ये तो कल सीता को भी कह रहा था कि बाल हरे रंग लो फ़ैशन का फ़ैशन और आस पास के पेड़ों के साथ मैच करेगा सो अलग्। असली फ़ैशन तो गंजेपन में है, आप को अपनी क्रिएटिविटी दिखाने का पूरा मौका मिलता है, जब ट्व्टी ट्व्टी चले तो लंका का झंडा अपने सर पर पेंट कराइए चियर लीडरनियां भी आपको सरगना बना लेंगी, और जब मैच न हो तो हमारी क्रीम से सर की मालिश कराइए, ये बाल नौच नौच कर जो सर में दर्द रहता है एकदम दूर हो जाएगा और आपके चांद की चमक देख महाराज बोल उठेंगेये चांद सा रौशन ट्कला, फ़ूलों का रंग सुनहरा, ये झील से गहरी आखें, कोई राज है इनमें गहरा…इतने में रावण का मोबाइल बज उठा…हैल्लो, हैल्लो, रावण, लोन रिक्वरी वाले थे, रावण बोला सॉरी रोंग नम्बर्॥दिस इस टकलु हिअर्…ढूंढो बेटा अब रावण को, और आजा बेटा राम अपनी सब चालाकियों के साथ, यूं नहीं पिजंरे में उतरने वाले हम, सुसाइड कर तू।

October 19, 2007

दादी रॉक्स

दादी रॉक्स


अभी टी वी पर चैनल घुमाते घुमाते सोनी पर चल रहे कार्यक्रम बूगी बूगी पर जा पहुँची। मम्मी एपीसोड चल रहा था। शुरु के एक दो नृत्य तो अच्छे लगे(बाकी भी अच्छे लगे), 25 वर्ष से ले कर 29 वर्ष की महिलाएँ अपने नृत्य के जौहर दिखा रही थीं। फ़िर अपने जौहर दिखाने आयी एक 45 वर्षिय महिला, डील डौल भी काफ़ी हरा भरा और अदाएँ बिखेरी मॉइकल जैकसन की नकल की। अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं कि कैसा लग रहा होगा वो भी टी वी पर जिसे लाखों लोग देख रहे होगें। अच्छा, उस प्रोग्राम की एक और खासियत ये है कि जो भी कलाकार मंच पर होता है उसके साथ आये उनके स्वजनों पर कैमरा केन्द्रित किया जाता है, इस बार भी ऐसा ही हुआ। जो महिला नाच रही थी उनके साथ आयी एक वृद्धा बड़ी मजे ले कर उनका नृत्य देख रही थीं। जावेद जी के पूछ्ने पर पता चला वो वृद्धा उस महिला की माता जी हैं और वो भी बूगी बूगी में नाचने की तमन्ना रखती हैं। जावेद जी ने बड़ी शालीनता से उनकी ये मनोकामना पूर्ण करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया मंच पर आने के लिए, बिना किसी हिचक के वो न सिर्फ़ मंच पर आ गयीं बल्की मॉइकल जैकसन की भी छुट्टी कर दी। जावेद ने जब उन्हें कैमरे में देख अपने पति को फ़्लांइग किस्स देने को कहा तो बेझिझक दादी जी ने वो इच्छा भी पूरी कर दी।

आप कहेंगे , हाँ तो आप क्युं इतना बखान कर रही हैं। वो इस लिए कि मैं पूरी तरह से कनफ़्युजड हूँ जी, पता नहीं मैं कौन सी सदी में जी रही हूँ , क्या मैं पिछ्ड़ गयी हूँ और मुझे पता भी नहीं चला कि जमाना कितना आगे निकल गया है। मेरे मानस पट्ल पर दादी नानी की जो आम तस्वीर है और जो मैं अब देख रही हूँ उसमें जमीन आस्मान का अंतर है। मेरी नानी ने पाँच बेटियों में से तीसरी की शादी की तो हल्के रंग की साड़ियाँ पहनना शुरु कर दिया था और अतिंम बेटी की शादी तक पहुंचते पहुंचते तो सफ़ेद साड़ियाँ पहनना शुरु कर दिया था। (यहाँ मै बता दूँ कि मेरे नाना की मृत्यु नानी के जाने के कई साल बाद हुई थी) उन्हें दामाद के सामने रंगीन कपड़े पहनने में शर्म आती थी। खैर वो तो बहुत पुराने जमाने की बात है जी। मेरी माँ ने मेरी शादी के बाद लिपस्टिक लगाना छोड़ दिया था, सिर्फ़ इस लिए कि मैं लिपस्टिक नहीं लगाती थी। अब नवविवाहिता बेटी अगर इतनी सादी रहे तो मैं कैसे होंठ रंग लूं। मैने लाख समझाया कि ये अपनी अपनी पंसद की बात है और इसमें कोई बुराई नहीं पर उन्होंने एक न सुनी। फ़िर जब कुछ साल बाद मेरे बालों में चांदी झिलमिलाने लगी, सबने कहा (पति को छोड़ कर) बाल रंग लो, पर हम इसके लिए तैयार न हुए, तो मेरी माता जी ने भी बाल रंगने छोड़ दिए, तर्क वही की बेटी के बाल सफ़ेद और मेरे काले, कैसा दिखेगा भला। ये
बात सिर्फ़ मेरी माँ और दादी की नहीं थी, मैने तो अपने परिवेश में सभी दादी नानियों को यूं ही देखा है, अपने रखरखाव से बेखबर, ममता से ओतप्रोत, हमेशा दूसरों की फ़िक्र करतीं, जीवन के मुल्य देती, धीर, गंभीर, जिन्हें देखते ही नतमस्तक हो आशिर्वाद लेने को मन करे। इन्हें घर में आयोजित कीर्तनों में भाग लेते हुए नाचते गाते देखा पर कभी भी पब्लिक में नहीं। किसी शादी ब्याह में बहुत जोर देने पर दादी तो नहीं पर माँ एक ठुमका भर लगा देतीं और बैठ जातीं, वो भी इस बात का ध्यान रखते हुए कि उम्र या रिश्ते के लिहाज से कोई बड़ा मर्द तो वहाँ नहीं। माँ का दर्जा पाते ही कब हमने अपने पराये (ऑटो ड्राइवर से लेकर सब्जी वाले, वॉचमेन, अर्द्ली, छात्र) सबको बेटा बुलाना शुरु कर दिया पता ही नहीं चला ।

मैं ये नहीं कह रही कि बूगी बूगी में नाच रही महिलाएं सभ्रांत नहीं थीं, वो संभ्रात थी,(छोटे शहरों से थीं)। वहाँ आयी सभी महिलाओं के परिवार(मायका और ससुराल दोनों) इतना गौरव महसूस कर रहे थे। कौन कहता है कि औरतों को मन की करने की छूट नहीं। मैं यहाँ कोई सवाल नहीं खड़े कर रही , सिर्फ़ अपना आश्चर्य प्रकट कर रही हूँ, सिर्फ़ बदलते समाजिक मुल्यों की बात कर रही हूँ। क्या कोई मुझे बताएगा कि मैं कित्ते साल पीछे छूट गयी हूँ?