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सुस्वागतम

आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।

May 14, 2012





ठप्पा लगवा लिए(भाग 2)

सिंगापुर एअरपोर्ट से बाहर निकले तो देखा हमारे नाम की तख्ती ले कर कोई नहीं खड़ा। ट्रेवल ऐजेंट ने जो लोकल नंबर दिया था वो ढूंढ ही रहे थे कि एक महिला भागती हुई आयी, लेट होने के लिए माफ़ी मांगते हुए उसने जल्दी जल्दी वैन की डिक्की खोली और हमने सामान रखना शुरु किया। पता था विदेश में सब काम खुद करने पड़ते हैं ड्राइवर आ कर सामान नहीं रखेगा। गाड़ी में बैठे तो वो महिला ड्राइवर की सीट पर विराजमान हो गयी। तब पता चला कि ये आठ व्यक्तियों को ढोने वाली टोयेटा गाड़ी यही महिला चलायेगीं। बाद में हमने देखा कि सिंगापुर में ज्यादातर गाड़ियां महिलायें ही चलाती हैं फ़िर वो चाहे वैन हो या ट्रॉम या बस या कुछ और्। बम्बई में हमें बताया गया था कि सिंगापुर का मौसम बम्बई जैसा ही है, दिन में 31 डिग्री तो रात में 24 डिग्री। इसी बात को ले कर हम टूर कैंसल कर देना चाह्ते थे पर दोस्तों का इसरार था। पर यहां आते ही देखा कि भरी दुपहरी में भी जरा भी गर्मी नहीं लगती।वहां की सरकार ने इतने पेड़ लगा रखे हैं सब जगह कि पहले बैंगलोर की तरह उसे गार्डन सिटी कहा जाता था और अब सिटी इन गार्डन कहा जाता है। इसी तरह से कहीं कोई धूल मट्टी उड़ती नहीं दिखती। मिट्टी को या तो
पेड़ों की जड़ों ने पकड़ रखा है या फ़िर घास ने। उसी दिन नाइट सफ़ारी देखने गये पर मजा नहीं आया, दूसरे दिन सिटी के सर्शन कराने के लिए एक चाइनीस गाइड उपस्थित था। उस से पता चला कि सिंगापुर में सभी मल्टिपल जॉब्स करते हैं जैसे वो टूरिसम पढ़ाता भी था और गाइड का काम भी करता था। शहर के दर्शन करते हुए हल्की बूंदाबांदी शुरु हो गयी। हमारा गाइड मिस्टर जैकी बहुत परेशान हो गया। उसे बारिश बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी, वो भगवान से कह रहा था कि बारिश बंद हो जाये और हम भगवान से कह रहे थे कि भगवन आप हमें इस तरह मत चिढ़ाओ, ये भी कोई बारिश है। उस दिन तो नहीं पर दूसरे दिन भगवान ने हमारी सुन ली और खूब जम कर बारिश हुई।

यहां बारिश ने हमें चिढ़ाया







चाइनीस मंदिर


इन्हें जलती हुई सिगरेट का भोग लगाइये तभी प्रसन्न होगें


चाइनीस मंदिर देखते हुए एहसास हुआ कि चाइना और हमारी संस्कृति में कितनी समानता है। जैकी बता रहा था कि चाइना में अनगिनत देवी देवता है और ऐसी मान्यता है कि आदमी मरने के बाद पाताल में जाता है और वहां उसके कर्मों के अनुसार निश्चित होता है कि वो आगे नरक में जायेगा या स्वर्ग में। पाताल के दरबान को भी देवता मानते हुए उन्हें पुराने जमाने में ओपियम का भोग लगाया जाता था आजकल लोग सिगरेट जला कर सिगरेट का भोग लगाते हैं। लेकिन अजीब बात ये थी कि चाइनीस मंदिर में बहुत सारे चमगादड़ छत से लटके दिखायी दिये। जैकी ने बताया कि चाइना में चमगादड़ों को शुभ माना जाता है और ये चमगादड़ खून नहीं पीते, शाकाहारी हैं। खैर हम तो उस कमरे से भाग लिये, पता नहीं कब उनका मन बदल जाये।

बर्ड पार्क
शो की पहली परफ़ोर्मेंस देने को आते ये लंबी टांगों वाले पक्षी

उसके अगले दिन ड्राइवर ने कहा कि आप को बर्ड पार्क ले जायेगें। हम सोच रहे थे कि हम क्या बच्चे हैं जो हमें चिडियाघर दिखाने ले जा रहे हैं। पर जब हम वहां पहुंचे तो हैरान रह गये ये देख कर कि कोई पिंजरे नहीं है। ओपन ऑडिटोरियम में शो होते है। बर्डस का शो देख कर हमारा बचपन लौट आया।

हमें डर था कि शाकाहारी होने के कारण हमें काफ़ी दिक्कत सामने आयेगी, लेकिन ऐसा कुछ भी न हुआ। वंहा तो पूरा भारत बसता है। महज छ: डालर में एक वक्त का खाना आराम से खाया जा सकता है। दुकाने रात को ग्यारह बजे तक भी खुली रहती हैं और मुस्तफ़ा सेंटर तो चौबिसों घंटे खुला रहता है। सेल्समैन बता रहा था कि अकसर भारतीय सैलानी सुबह साढ़े तीन बजे शॉपिंग करने आते हैं। लेकिन हमें तो वंहा सब कुछ बहुत मंहगा लगा। सो हमने कुछ नहीं खरीदा सिर्फ़ बेटे की फ़रमाइश पर उसके लिए 'गेलेक्सी नोट' ले कर आये…:)



चार दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला। जब वापस ऐअरपोर्ट की तरफ़ रवाना होने का समय आया तो हम सब के मन में एक ही बात थी कि काश हम कुछ दिन और यहां रुक पाते। जाने से पहले मैं ने सुना था कि सिंगापुर में पेड़ बिना सूरज की रोशनी पाये भी खूब फ़लते फ़ूलते हैं। यही देखने के लिए बॉटेनिकल गार्डन गये थे, वहां तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला पर एअरपोर्ट में चैक इन करने के बाद जो नजारा देखा वो आप भी देखिये।


एअर्पोर्ट
एअरपोर्ट के अंदर जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती

 

May 10, 2012


ठप्पा लगवा लिए(भाग 1)

उषा आगामी अकेडेमिक वर्ष के शुरुवात में इस नौकरी के अट्ठाइस साल पूरे कर रिटायर हो जायेगी। हमारे ग्रुप का एक और सदस्य चला जायेगा सोच कर ही मन उदास हो जाता है। दो महीने पहले अचानक उषा ने सुझाया कि क्युं न हम तीनों एक साथ छुट्टी मनाने चलें। झटपट प्रोग्राम बनने लगा। हमने पतिदेव को दफ़्तर में ही फ़ोन धनघना कर कह दिया कि छुटटी के लिये अर्जी दे दो। एक मई से छुट्टियां शुरु होती हैं और दो तारिख को निकलने का प्रोग्राम बना लिया गया। तारीखें तय कर के सोचा गया कि कहां जाया जाये। 

बायें से वैंकट, उषा, माला(अमिता की छोटी बहन), अमिता, मैं और विनोद

केसरी ट्रेवल्स के दफ़्तर पर धावा बोला गया, कई तरह के प्रोग्राम देखे गये और तय हुआ कि मैं और अमिता अपने अपने नये नवेले पासपोर्ट का उदघाटन करेगें, पासपोर्ट के कोरे पन्नों पर एक ठ्प्पा तो लगना ही चाहिए। तो प्रोग्राम बना सिंगापुर जाने का।





 
हड़ताल
एक महीना पहले महाराष्ट्र में कॉलेज टीचर्स हड़ताल पर चले गये  और पेपर्स जाचंने से साफ़ इंकार कर दिया( बिना रोये तो सरकार के कान पर जूं भी नहीं रेंगती न, छठा वेतन आयोग अब तक संपूर्ण नहीं, और मिलने की आशा भी नहीं) उलटा चोर कोतवाल को डांटे, एक तो सरकार हमारे हिस्से के पैसे केन्द्र सरकार से ले कर हजम कर गयी और साथ में हड़तालियों को निलंबित करने की धमकी भी दे रही है। हड़ताल और सरकार के रवैये पर फ़िर कभी खैर,  हमने जैसे तैसे कुछ टीचरों को एकत्र कर पेपर्स जांचने का काम जो मेरे नेतृत्त्व में पूरा होना था उसे एक तारीख तक पूरा किया और दो तारीख की रात को चल पड़े एक नये अनुभव की ओर। 



बम्बई रात की बाहों में
सुबह तीन बजे जब सड़कें काफ़ी हद्द तक खाली होती हैं(सुनसान तो कभी नहीं होतीं) और समुद्र से आती ठंडी हवायें चेहरे से टकराती हैं तो बम्बई और हसीन लगती है।आदतन टैक्सी वाले से बतियाये, मेरू टैक्सी( प्राइवेट कंपनी की टैक्सी) कंपनी की कार्यप्रणाली के बारे में जाना, टैक्सी ड्राइवर की दिक्कतें, आमदनी, और न जाने क्या क्या पूछ डाला। उसकी भाषा से साफ़ जाहिर था टैक्सी वाला यू पी का है(आम भाषा में तनिक शब्द का इस्तेमाल कोई बम्बइया तो करेगा नहीं।), पूछने पर हिचकते हुए उसने बताया कि वो बनारस का है। उसकी हिचक को देखते हुए हमने पूछा क्या किसी राजनीतिक कारणों से उसे कोई परेशानी का सामना करना पड़ता है? उसने बताया कि राजनीतिज्ञ तो नहीं पर काली पीली टैक्सी वाले बहुत परेशान करते हैं, मारपीट पर भी उतर आते हैं, पैसेंजर भी कभी कभी किराये को ले कर झगड़ा कर बैठते हैं तो उनसे कैसे निपटा जाता है।अचानक वो सिर्फ़ टैक्सी ड्राइवर न हो कर इंसान दिखने लगा। और भी बहुत कुछ पूछना था उस से पर तब तक ऐअरपोर्ट आ गया।

बोर न हुए हों तो बतलाऊं आगे का जो अफ़साना हैJ

December 11, 2011


जुड़ी एक और कड़ी

मनीष कुमार का जब मेल मिला कि वो अपने कॉलेज में ब्लोगिंग पर सेमिनार करने जा रहा था तो सिद्धार्थ जी के वर्धा में करवाये सेमिनार की सुखद यादें ताजा हो गयीं। फ़िर ये सेमिनार तो हमारे घर से महज 50 कि मी की दूरी पर हो रहा था। जाना तो तय था।
सिद्धार्थ जी का फ़ोन आया कि हम आप के शहर आ रहे हैं आप शहर में ही होगीं या कहीं बाहर । बत्तीसी पूरी बाहर आ गयी, हमने कहा हम न सिर्फ़ शहर में होगें बल्कि सेमिनार में भी आयेगें और आप घर पर भी आइएगा। दर असल वर्धा जाने से पहले सिद्धार्थ जी मेरे लिए एक सिर्फ़ नाम भर थे, एक अजनबी, लेकिन उनकी और उनकी पत्नी की आत्मियता और मेजबानी ने ऐसा जादू डाला कि जब तक हम वर्धा से वापसी की ट्रेन पर बैठे हमें लगा हम अपने छोटे भाई के घर से वापस जा रहे हैं। खुशी तो होनी ही थी।

पता चला शैलेष भारतवासी भी आ रहा है। हमने सोचा लगे हाथों हम भी अपने कॉलेज के बच्चों के लिए एक छोटी सी वर्कशॉप रख लें ब्लॉग कैसे बनाया जाता है सिखाने के लिए। प्रिसिंपल से बात की, बात आगे बड़ते बड़ते यहां तक पहुंची कि हम भी अपने कॉलेज में सेमिनार कम वर्कशॉप रख लें। हमने मनीष से बात की कि उसके रिसोर्स परसन हम इस्तेमाल कर लें तो कोई एतराज, उसने सहर्ष सहमति दे दी। तो निश्चित ये हुआ कि कल्याण का सेमिनार 9-10 दिसंबर को है और हम अपना सेमिनार 8 दिसंबर को रख लें। 

हमने अपना सेमिनार सुबह साढ़े आठ बजे से शाम के छ: बजे तक रखने का निश्चय किया। आठ की सुबह आठ बजे जब हम इंतजाम करने की आपा धापी में थे सिद्धार्थ जी का फ़ोन  आया। हमने पूछा कल्याण पहुंच गये क्या तो बोले नहीं हमारी तो ट्रेन छूट गयी अब हम प्लेन से आ रहे हैं शाम तक पहुंचेगें। उस समय डिटेल्स लेने का समय न था हमने कहा हम शाम को फ़ोन करेगें। शैलेष जिस दोस्त के घर ठहरा था वो दोस्त का घर मेरे घर से पांच मिनिट की दूरी पर था। खैर शैलेष दोपहर को अपने आप कॉलेज पहुंचा और शाम को हम साथ में वापस आये। अब हमने सिद्धार्थ जी को फ़ोन लगाया, करीब सात  बजे होगें। हमने कहा शैलेष भी यहीं है आप भी रवींद्र और अविनाश जी के साथ आ जाइए साथ में खाना खायेगें। उन्हों ने मन तो बना लिया लेकिन शायद गाड़ी का इंतजाम न हो पाया। उन्हों ने कहा ये निमंत्रण कल तक के लिए स्थगित कर दिया जाए। प्रस्ताव मान लिया गया और शैलेष अपने दोस्त के घर चला गया। अगले दिन वैसे भी शनिवार था, हमारे पति देव को ऑफ़िशली छुट्टी होती है मतलब उस दिन थोड़ा जल्दी ऑफ़िस से आ जाते हैं। हमने बता दिया कि हमारे वर्धा वाले मित्र आ रहे हैं, कहीं ऐसा न हो कि आप की वजह से हमें खाने की टेबल पर इंतजार करते रहना पड़े। जवाब में एक हल्की सी मुस्कुराहट मिली। 

हमें कभी कल्याण जाने का अवसर नहीं मिला था,क्या रूट लेना है इस बात को ले कर थोड़ी चिंता थी। पतिदेव ने पूरा रुट लिख कर दिया, साथ ही काफ़ी डरा दिया था - अगर वापसी में देर हो जाए तो शॉर्ट कट से मत आना, संकरी रोड है दो पहाड़ियों के बीच में, स्ट्रीट लाइट भी नहीं है, ट्रकों का ट्रेफ़िक मिलेगा। खैर हम चल दिए। 

वहां जा कर सिद्धार्थ जी, अविनाश जी, अशोक मिश्र जी, रवींद्र जी से मिल कर वर्धा मुलाकात को चाय की चुस्कियों के साथ ताजा किया जा रहा था कि रवि रतलामी जी दिख गये, वो दो साल पहले मेरे कॉलेज में सेमिनार में आ चुके थे, दो साल बाद उनसे मिल कर भी हम खुश हो रहे थे। शैलेष तो आते ही लाइव वेबकास्टिंग के चक्कर में व्यस्त हो गया और हम सब सबसे आगे वाले सोफ़ों पर पसर गये। हरीश अरोड़ा जी और केवलराम जी से मैं पहले नहीं मिली हुई थी, उनसे मिल कर भी ऐसा नहीं लगा जैसे पहली बार मिल रही हूँ। केवलराम तो बातचीत में इतने विनम्र रहे कि मुझे लगा अपने किसी छात्र से बात कर रही हूँ। 

मनीष ने नमस्कार करते ही कह दिया कि आप सिर्फ़ गप्पें नहीं मारेगीं आप को काम भी करना है। अब एक शहर के हैं, ब्लोगर बंधु हैं एक ही प्रोफ़ेशन के हैं तो इतना तो हक बनता है उसका। उसने हमें कहा कि आप को दोनों दिन की सभी सत्रों की रिपोर्टिंग करनी होगी। लो जी यहां भी कलम घसीटी। न नुकुर करने का तो सवाल ही नहीं उठता था

सिद्धार्थ जी ने लाइव सेमिनार की कमैंट्री देने के लिए अपना लैपटॉप संभाला और हमने कागज कलम्। हम दोनों के बीच में बैठे रवींद्र जी कभी लैपटॉप में झांकते तो कभी हमारी चलती कलम। जैसे ही मनीष ने मंच संभाला और बोलना शुरु किया हम समझ गये कि जिस तेजी से ये बोल रहा है हम उतनी तेजी से लिख नहीं पायेगें और रिपोर्टिंग में कुछ न कुछ जरूर छूट जायेगा। तो हमने जो कुछ बोला जा रहा था उसको उसी समय अंग्रेजी में अनुवादित कर लिखना शुरु कर दिया। रवींद्र जी अचरज में थे कि जिस धाराप्रवाह में बोला जा रहा है हम उसी धाराप्रवाह में उसे अनुवाद कर कैसे लिख रहे हैं। हमने कहा बाद में हम इसका फ़िर हिंदी अनुवाद कर रिपोर्ट लिखेगें। 

शाम को निकलते निकलते साढ़े पांच बज गये। वादे के मुताबिक सिद्धार्थ जी, रवींद्र जी और अविनाश जी को मेरे साथ घर चलना था, मेरी ही गाड़ी में। शैलेष तो था ही साथ में। अविनाश जी दांत के दर्द से पीड़ित थे, उन्हों ने आने से मना कर दिया। अब रवींद्र, सिद्धार्थ, शैलेष और मैं वहां से निकले, शाम के छ: बज गये थे। अंधेरा गहराने लगा था और हम में से किसी को रास्ता नहीं पता था, पूछ पूछ कर जाना था।

 साढ़े छ: बजे पतिदेव का फ़ोन आया मैं आ गया हूँ। हमें घर पहुंचने में कम से कम दो घंटे और लगने वाले थे, सब को जोरों की भूख लगी हुई थी। हमने पतिदेव से कहा कि वो हॉटेल से खाना ले आयें। जो जो सब्जी हमने लाने को कहा था वो उन्हें कुछ भी याद न रहा। खैर राम राम करते थकान से चूर हम सब करीब साढ़े आठ बजे घर पहुंचे। पता चला कि पति देव खाना तो ले आये लेकिन खास मेहमान नवाजी करने के लिए उन्हों ने चावल अपने हाथों से बनाने का निश्चय किया और जब हम पहुंचे तो वो चावल अभी बनाने जा रहे थे। जब तक चावल बनते भूख से अपना ध्यान हटाने के लिए सिद्धार्थ जी ने अपना कैमरा निकाल लिया और लगे लेने दनादन फ़ोटो पे फ़ोटो, कभी इधर की तो कभी उधर की, उस सागर की खाड़ी की भी जो कोहरे की वजह से नजर नहीं आ रही थी। फ़िश टैंक में जो मछलियां हैं उनके नाम क्या है इस बात पर रवींद्र जी और सिद्धार्थ जी में एक छोटी सी बहस चल पड़ी। इतने लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं ये देख कर मछलियां में उल्लासित हो कर नाचने लगीं। हमें तो किसी मछली की प्रजाति का नाम वाम पता नहीं, हमने कहा अगर मेरे पतिदेव से पूछने की गलती की तो फ़िर एक घंटे का लेक्चर निश्चित है बेहतर यही होगा कि खाना खाने के बाद पूछें। उन्हें हमारा आइडिया जंच गया और हम सब खाने की टेबल पर पहुंच गये। करीब दस बजे शैलेष ने कहा वो अपने दोस्त के घर वापस जाना चाहता है। हमने बहुत कहा कि भाई गप्पें लग रहीं हैं यही रह जाओ पर वो नहीं माना। 


खैर उसके जाने के बाद सिद्धार्थ जी हमारे कंप्युटर पर अपनी रेलवे की टिकट का प्रिंट आउट निकालने की जद्दो जहद करते रहे पर वैबसाइट प्रिंट आउट लेने ही न देती थी। कहती थी कागज बरबाद नहीं करना चाहिए, पेड़ बचाओ। मैं किचन संभालने चली गयी, इतने में रवींद्र जी नहा कर आये तो रेलवे की वैब साइट डर गयी और फ़ौरन अपनी मस्ती छोड़ प्रिंट आउट लेने की इजाजत दे दी। हम सब खूब हंसे। रवींद्र और सिद्धार्थ जी ने मेरे पतिदेव को भी ब्लोगर बनने के लिए उकसाया,हम तो कब से कह रहे हैं कि इस बिरादरी में शामिल हो जाओ। खैर वो इस शर्त पर मान गये कि कोई उन्हें ब्लोग बनाना सिखा दे और उस पर फ़ोटो अपलोड करना सिखा दे। देखें अब किस दिन उनका ब्लोग बनता है। हमने उन्हें ऑफ़र किया कि हमारा अंग्रेजी वाला ब्लोग वो ले लें। सिद्धार्थ जी और रवींद्र जी के अपने कमरे में जाने के बाद हम कंप्युटर पर बैठे, दूसरे दिन हमें प्रपत्र पढ़ना था और हमने आज के दिन में जो कुछ दूसरों को कहते सुना था उस से जुड़ी कुछ बातें उसमें जोड़ना चाह्ते थे। पी पी टी ठीक करते करते रात का एक बज गया। 


दूसरे दिन जब हम सेमिनार हॉल में पहुंचे तो यूनुस जी बैठे मिल गये और गप्पों का एक और दौर चल पड़ा। लोग तो मंच पर खड़े हो कर ब्लोगिंग के फ़ायदे गिनवा रहे थे पर हम तो मंच के सामने बैठे उन फ़ायदों को जी रहे थे। कभी सोचा न था कि ब्लोग मित्रों से मिलना इतना सुखद होगा कि वक्त कैसे गुजर गया पता ही न चला।  सुखद यादों के सिलसिले में एक कड़ी और जुड़ गयी। 

सेमिनार की रिपोर्ट परिकल्पना के लिए रवींद्र जी ने बुक कर ली है। इस लिए वो रिपोर्ट वहां देखने को मिलेगी एक दो दिन बाद्…।:)