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March 08, 2008
हैप्पी विमेन्स डे ?
आज सुबह से ही हर तरफ़ हैप्पी विमेन्स डे का शोर है, सुबह सुबह रेडियो लगाया तो वहां भी यही चर्चा थी, दोपहर को ब्लोगवाणी में घूमी तो वहां भी अनेक पोस्टें इसी विषय पर , ढेरों फ़ोन काल्स और सब महिला सहकर्मी एक दूसरे से हाथ मिलाती यूं लग रही थीं जैसे ऑस्ट्रेलियाई विकेट ले कर हमारे खिलाड़ी।
अभी तक तो विविध भारती पर, ऑल ईंडिया रेडियो पर दिन के एक दो घंटे सिर्फ़ औरतों से संबधित कार्यक्रम दिए जाते हैं जो अच्छे भी लगते हैं पर अब तो पूरा एक रेडियो चैनल एफ़ एम 104.8 म्याऊं सिर्फ़ महिलाओं का चैनल आ गया है, मर्दों को सिर्फ़ शनिवार के दिन इस चैनल का हिस्सा बनने की छूट है। आज सुबह से इस चैनल पर बड़ी धूम मची हुई थी। एंकर बार बार श्रोताओं को फ़ोन पर ये बताने के लिए कह रही थी कि उनकी जिन्दगी में किस महिला का सबसे ज्यादा प्रभाव है या था। जाहिर है फ़ोन करने वाली महिलाएं ज्यादातर अपनी माँ के गुणगान कर रही थीं और ये स्वाभाविक भी है।
किसी ने कहा मौसी से बहुत प्रभावित हूँ तो किसी ने किसी और का नाम लिया। सिर्फ़ एक लड़की ने कहा कि उसकी जिन्दगी को अनेक महिलाओं ने प्रभावित किया और किसी एक का नाम लेना दूसरों के साथ अन्याय होगा। यदि वह सिर्फ़ मां का नाम लेती है तो उन महिला टीचरों के साथ अन्याय करती है जिन्हों ने उसके जीवन को घड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रोग्राम सुनते सुनते मेरे मन में ख्याल आ रहा था कि इनकी बातें सुन कर ऐसा लगता है मानो इनका संसार लोकल ट्रेन के लेडिस डब्बे के जैसा है, जिसमें पर पुरुष तो क्या किसी पुरुष स्वजन की छाया भी नहीं। स्वभाविक था कि एंकर का पूछा सवाल मुझे भी सोचने पर मजबूर कर रहा था कि मेरे जीवन को घड़ने में ( चाहे जैसा भी ढंगा/बेढंगा घड़ा गया है) किस किस की अहम भूमिका रही।
माँ तो याद आयी हीं जिन्हों ने कभी प्रतक्ष्य रूप से तो कभी अप्रतक्ष्य रूप से मेरे विचारों को, मेरे मूल्यों को आकार दिया, पर मेरी यादों के झरोखों से निकल मेरे पिता का चेहरा भी आखों के सामने छा गया।
सहसा हमें लगा कि एंकर का प्रश्न ही गलत है, किस महिला ने तुम्हारे जीवन को प्रभावित किया, के बदले में पूछना चाहिए कि किस व्यक्ति ने तुम्हारे जीवन को प्रभावित किया।
जिस तरह का पुरुष प्रधान हमारा समाज है ऐसे में अगर मेरे पिता प्रोत्साहन न देते तो क्या मैं उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाती। आज भी याद है मुझे वो दिन जब ग्यारहवीं पास कर हमने घर में ऐलान कर दिया था कि हम आगे पढ़ने में अपना वक्त बर्बाद न करेगें। पिता के सर पर तो मानों गाज ही गिरा दी थी हमने। हमारा तर्क था कि अगर पढ़ाई कर के कैरिअर बनाना है और कैरिअर बनाने का मतलब है आर्थिक स्वालंबन प्राप्त करना है तो फ़िर चार साल क्युं बर्बाद किए जाएं , कैरिअर तो हम आज भी बना सकते हैं।
नये नये स्कूल से निकले थे। पिता का दफ़्तर और घर एक ही बिल्डिंग में होने की वजह से अक्सर टहलते टहलते ऊपर तीसरी मंजिल पर पिता के दफ़्तर चले जाया करते थे। पिता तो अपने काम में मशगूल होते थे, हम बाहर बैठी उनकी सेक्रेटरी की टाइपराइटर पर तेजी से नाचती उंगलियों को मंत्र मुग्ध से घंटों निहारते रह्ते। उसका सलीके से संवारा बड़ा सा जूड़ा,लिप्सटिक से रगें होंठ, ऊंची एड़ी की सेन्डिल और बड़े सलीके से लिपटी साड़ी देख हमारा मन वो सब पाने को यूं मचला कि हम ये सब पाने के लिए चार साल तक इंतजार नहीं करना चाहते थे। हमने पिता से कह दिया कि हमें भी सेक्रेटरी बनना है।
आज सोचते हैं तो पिता के लिए श्रद्धा से सिर झुक जाता है कि कितना संयम से काम लेना पड़ा होगा उन्हें। उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि सेक्रेटरी का काम तुम्हारे लिए नहीं। बड़ी मुश्किल से मुझे समझाया कि अगर पढ़ लोगी तो इससे भी बड़े दफ़्तर में जा सकोगी, ऐसा ही परिधान पहन कर इससे भी बड़ी कुर्सी पर बैठ सकोगी। हमें उनकी सेक्रेटरी की पहियों पर घूमने वाली कुर्सी भी बहुत अच्छी लगती थी। वो कुर्सी सफ़लता की निशानी थी, जो जितना सफ़ल उसकी उतनी ही ज्यादा आरामदेह बड़ी सी कुर्सी। तो समझिए कि उस कुर्सी के लालच में हमने सेक्रेटरी के पद का लोभ छोड़ दिया। आज जब किसी अधेड़ उम्र के व्यक्ती को जीविकापोर्जन की लड़ाई में ये कहते सुनते है कि काश हम समय पर पढ़ लिए होते तो लगता है उस समय अगर पिता ने हमारे जीवन को कॉलेज के जीवन की तरफ़ न मोड़ा होता तो? वो सेक्रेटरी वाला फ़ेस टेंपररी था ,एक बार कॉलेज की जिन्दगी में रम गये तो हम उस सेक्रेटरी को पूर्णतया भूल गये। कॉलेज के दिनों की तरफ़ भी मुड़ कर देखते हैं तो हमें प्रभावित करने वाले सभी टीचरस पुरुष ही थे- इतिहास वाले संघवी सर, मनोविज्ञान पढ़ाने वाले सांवत सर, लोजिक के लिए वनमाली सर जो बोर्ड पर ऐसे लिख सकते थे जैसे कॉपी में लिख रहे हों, हमारी बेतुकी कविताओं की भी तारीफ़ करते हिन्दी के ठाकुर सर।
उससे भी पहले हमारी यादें बचपन की तरफ़ लौटती हैं तो एक अमूर्त सा चेहरा याद आता है। बात अलिगढ़ के दिनों की है, हम शायद सातंवी क्लास में थे, बेहद उधमी, हर नये टीचर की खबर लेना मानों हमारा जन्मसिद्ध अधिकार था। शहर था छोटा, गिने चुने कॉलेज , हमारे पिता प्रख्यात प्राध्यापक, जो भी हमारे स्कूल में टीचर के पद पर आता वो उनका शिष्य रह चुका होता, ऐसे में हम इन टीचरों के दिलों में खास स्थान पाते।
हमारी एक टीचर की शादी होने जा रही थी अत: वो एक महीने की छुट्टी पर जाते जाते अपने भाई को एक महीने के लिए अपने स्थान पर लगा गयी। मुझे आज भी याद है, ये भाई साहब का नाम था संतोष, ये भी अपनी बहन की तरह हमारे पिता के छात्र रह चुके थे और अभी अभी स्नातक की परिक्षा पास कर हटे थे।
क्लास में हमारी मस्ती चरम सीमा पर थी, हमने जैसे मन में ठान लिया था कि हम इन महाशय को पढ़ाने न देगें और अपनी प्यारी टीचर के आने का इंतजार करेगें।
संतोष महाशय की नाक में दम हो गया। एक तो पहले कभी इतने सारे बागड़ बिल्लों को, नहीं नहीं बिल्लियों को( गर्ल्स स्कूल था न) संभालने का कोई अनुभव नहीं था, ऊपर से उनकी सरगना थी अपने प्रिय आदरणीय टीचर की बेटी, कुछ कहा तो घर जा कर पता नहीं क्या क्या कहे और फ़िर सर पता नहीं मेरे बारे में क्या क्या सोचें?
एक दिन हार कर उसने मुझसे मुखातिब हो कर कहा, " बड़ के पेड़ के नीचे कोई बड़ा पेड़ नहीं उगता"। उस कोमल आयु में भी हम न सिर्फ़ उसका आशय समझ गये, वो बात हमको इतनी चुभ गयी कि आज तक हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। जब भी किताबों के साथ बैठते, संतोष महाशय के शब्द अंदर तक कचौट जाते। हमने ठान लिया कि हम पिता से ज्यादा पढ़ कर दिखायेगें। बाद में हमने जब एम ए करने की बात की और पिता को संतोष वाली बात बताई तो पता नहीं मन ही मन उन्होंने संतोष को कितनी दुआएं दे डालीं।
अगर मम्मी कभी कहतीं कि घर के काम करने की आदत डालो तो पिता जी फ़ौरन हमारे बचाव को आ जाते और एक्दम स्ट्रिक्ट हिदायत देते कि हमें घर के कामों में न उलझाया जाए, हम सिर्फ़ पढ़ाई करें। एम ए के बाद मम्मी जोर देने लगी कि अब हमारी शादी हो जानी चाहिए, पर हम अब मेनेजमैंट का डिप्लोमा करना चाह्ते थे, वो पिता ही थे जिन्होंने अपना भार उतारने के बदले हमारा साथ देने का निश्चय किया। कालांतर में शादी के बाद हमने एम फ़िल करने का मन बनाया, एक बार फ़िर मेरे पिता खुशी से मेरा साथ देने के लिए तत्पर दिखाई दिये और माँ भी। दोनों ने कहा तुम बच्चे की चिंता मत करो हम संभाल लेगें तुम बस अपनी पढ़ाई करो। कोई मुस्कुरा कर कहे कि इसमें कौन सी बड़ी बात हुई, आज कल तो सभी पिता अपनी लड़कियों को पढ़ाते ही हैं। हां सच है, लेकिन मेरे पिता ने बहुओं को बेटी से बढ़ कर माना, बहु को भी शादी के बाद पढ़ने के लिए उतना ही प्रोत्साहन दिया जितना बेटी को। उनकी पक्की हिदायत थी कि पढ़ाई के दौरान बहु से भी कोई काम न कराया जाए और सिर्फ़ पढ़ने दिया जाए।
असल में जिन्दगी जीना तो तब शुरु हुआ जब तीसरा पुरुष हमारे जीवन में पहले सखा और फ़िर पति बन कर आया। इस प्राण देयी पुरुष के बारें में हम अलग से फ़िर कभी लिखेगें, यहां संक्षिप्त में लिखने में उस रिश्ते के साथ अन्याय होगा।
अब बताइए ऐसे में अगर हमें लगता है कि मेन्स डे ना मनाना पुरुषों के साथ बहुत अन्याय है तो क्या गलत सोचते हैं?
:)
March 01, 2008
चक दे रेलवे
ज्ञानदत्त जी के चिठ्ठे से रेलवे के अंदरूनी कार्य कलापों के बारे में अक्सर जानकारी पायी है और हर बार इस बात का एहसास हुआ है कि कितनी आसानी से हम चाय की चुस्कियों के साथ सरकार को कोस लेते हैं जिस में रेलवे भी शामिल है। ज्ञान जी के ब्लोग पढ़ने से पहले मेरी सरकारी अधिकारियों के प्रति कोई खास अच्छी राय नहीं थी। बिल्कुल उसी तरह जैसे राजनितिज्ञों के लिए नहीं है। मुझे धीरे धीरे एह्सास होने लगा कि हम अपनी धारणाएं एक तरफ़ा जानकारी के आधार पर बनाते हैं, वो जानकारी जो हमारे अनुभव होते हैं, हमारे लिए वही ठोस सत्य होते हैं पर अब लगने लगा कि वो पूरी सच्चाई नहीं होते। कई बार हम समझ लेते हैं कि आकाश उतना ही बड़ा है जितना हमारी आखों में समाता है। इस दृष्टी से देखा जाए तो चिठ्ठाजगत में विचरण करने से मेरी सोच परिपक्व हुई है। आज मैं अचानक इसका जिक्र क्युं कर रही हूँ। वो इस लिए कि परसों के यानि कि 28 फ़रवरी के टाइम्स ओफ़ इंडिया में छपे एक समाचार ने हमें विस्मित कर दिया और बरबस हमारे ख्याल इस बात पर चले गये कि सरकारी अफ़्सर भी उतने सवेंदनहीन नहीं होते जैसे हम सोचते थे। हर संस्था में कर्तव्यपरायण व्यक्ति कम ही होते हैं और ज्यादातर साधारण सी निष्ठा वाले, तो क्या, उन कुछ कर्तव्यपरायण लोगों की वजह से वो संस्था सुचारु रूप से चलती है जैसे गाड़ी में इंजन छोटा सा होता है पर पूरी गाड़ी उसके चलने पर ही निर्भर करती है।
खबर यूं है कि भूरी काल्बी नाम की एक गर्भवति महिला ट्रेन से अपने गांव स्वरूपगंज( जो राजस्थान में सिरोही और अबु रोड के बीच आता है) से अहमदाबाद जा रही थी अपना चैक अप करवाने। रास्ते में शौचालय का इस्तेमाल करते हुए वो कमजोरी की वजह से शौचालय में ही बेहोश हो गयी। काफ़ी देर तक जब शौचालय का दरवाजा नहीं खुला तो लोगों ने दरवाजा ठकठकाना शुरु कर दिया। किसी तरह से अर्धमूर्छित अवस्था में उसने दरवाजा खोला। उसी समय उसे एहसास हुआ कि उसका पेट बहुत हलका हो गया है और पिचका हुआ है। उसका बच्चा गिर चुका था। तेजी से भागती ट्रेन में वो बच्चा मां के पेट से खिसक कर शौचालय के छेद से फ़िसलता हुआ रेल की पटरियों पर जा गिरा। उसकी हालत देख उसके साथ आये रिश्तेदारों ने कलोल के पास चैन खींच दी। ये जगह उस जगह से दो स्टेशन दूर थी जहां बच्चा गिरने का अनुमान था। गॉर्ड को फ़ौरन सूचित किया गया।
गिरने वाला भ्रूण सात महिने की बच्ची थी। सौभाग्यवश कुछ ग्राम रक्षक दल के सदस्यों का ध्यान उस पर गया और उन्होनें पास ही के अमबलिस्यान स्टेशन के स्टेशन मास्टर के के राय जी को सूचित कर दिया कि एक नवजात शिशु रेल की पटरी पर पड़ा है। राय साहब फ़ौरन खुद उस दिशा में दौड़ लिए , उन्हें दूर से बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी और वो सरपट दौड़े चले जा रहे थे। पास पहुंच कर जो उन्हों ने देखा उस पर उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था। बच्ची बायीं पटरी के एकदम पास पड़ी थी और उसकी नाल एक तरफ़ लटक रही थी। इतनी तेज रफ़्तार से दौड़ती ट्रेन से गिरने के बावजूद उस बच्ची का बाल भी बाकां नहीं हुआ था। पटरी के नुकीले पत्थर भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके। दो घंटे के अंदर मां और बच्ची राजस्थान हॉस्पिटल में एक साथ थे। बच्ची न सिर्फ़ सात महीने की ही थी, उसका वजन भी सिर्फ़ एक किलो चार सौ ग्राम था। वो कहते हैं न जाको राखे साइयां मार सके न कोई। सही कहा उसकी माँ ने कि वो बच्ची भगवान ने उसे उपहार स्वरूप ही दी है, वर्ना ऐसा कभी सुना कि बच्ची की नाल भी अपने आप टूट गयी और चलती ट्रेन से गिर कर भी उसका बाल भी बांका न हुआ।
ये घटना जितनी अपने आप में रोमांचक है उतनी ही एक और बात उजागर करती है, राय साहब का सरपट भागना और गॉर्ड का पिछले स्टेशन पर तुरंत सूचना देना। राय साहब ने ये नहीं सोचा कि हो सकता है ये पास के गांव में से किसी का अवैध बच्चा भी हो सकता है। उनका एक ही ध्येय था उस समय उस मानव जीव की रक्षा। राय जी जैसे कर्मचारियों को हमारा सलाम । अगर रेलवे में ऐसे कर्मचारी हैं तो फ़िर चक दे रेलवे।
रेलवे से ही जुड़ी एक और खबर जो मुझे बहुत दुखी कर गयी वो है कि एक 50 वर्षीय मच्छी बेचने वाली महिला की जो रोज दहानू से शटल ट्रेन लेकर रात को 11।30 बजे आती थी और फ़िर वहां से चर्चगेट के लिए ट्रेन पकड़ती थी, ससून डॉक जाने के लिए, जहां से वो मच्छी खरीद कर वापस उसी रास्ते से घर जाती थी।
शुक्रवार के दिन भी हमेशा की तरह वो 15000 रुपये अपनी अंटी में बांध मच्छी खरीदने निकली। दुर्भाग्य से जब वो विरार पर उतर रही थी ट्रेन चल पड़ी। घबरा कर उसने प्लेटफ़ार्म पर छलांग लगा दी। लेकिन उसका पांव चलती ट्रेन और प्लेट्फ़ार्म के बीच आ गया। वो असहाय सी खून में लथपथ पड़ी थी। दो सरकारी रेलवे पुलिस वाले हवलदार वहां से निकल रहे थे। उन्हों ने उस औरत को कम उसकी अंटी में खौंसे बटुए को ज्यादा देखा। बटुए में से 12700 रुपए निकाल कर पास ही खड़े एक कुली की मदद से उसे दूसरी ट्रेन में डाला ये कह कर कि हॉस्पिटल में ले जाएगें लेकिन दो स्टेशन के बाद कुली को ये कह कर उतर गये कि उस औरत के गले का मंगलसूत्र और चूढ़ियाँ वो अपने हिस्से के रूप में ले ले और उतर जाए उसे वहीं ट्रेन में मरने के लिए छोड़ के। अब अगर ऐसे रक्षक बैठे हों तो भक्षक की क्या जरूरत ? कुली ने ऐसा नहीं किया और उसे अस्तपताल ले गया ये अलग बात है।(मुंबई मिरर
के सौजन्य से ) कुली भी उसी रेलवे का हिस्सा है इस लिए चक दे रेलवे अगर वो ऐसा न करता तो पूछना पड़ता क्या सच में चक दे?
तो ये है भारत के रेलवे के दो रूप्। प्राथना करती हूँ राय जैसे लोगों की संख्या बढ़े।
February 29, 2008
पहिया चले चले है यारा, तुझको चलना होगा (भाग-2)
पहिया चले चले है यारा, तुझको चलना होगा (भाग-2)
इस हादसे के करीब एक साल बाद घर में सुतार लगे हुए थे, शनिवार का दिन, सुतार पतिदेव के साथ जा कर कुछ सामान ले कर आया , उसके एक घंटे बाद सुतार को कुछ और सामान चाहिए था सो पतिदेव लाने के लिए गये, नीचे जा कर देखा तो कार नदारत थी। बड़े हैरान, अरे अभी तो मैं यहां गैरेज में पार्क कर के गया था कार कहां चली गयी। पूछ्ताछ करने पर समझ आया कि कार आधे घंटे पहले ही चोरी हो गयी थी दिन दहाड़े दौपहर के तीन बजे और वो भी हमारी अपनी सोसायटी से। वॉचमेन और पड़ौसियों की नजरों के सामने चोर कार उड़ा कर ले गये और किसी को जरा भी शक नहीं हुआ कि कार चोरी हो रही है । फ़िर थाने पंहुचे, रपट लिखाई। पुलिस वालों ने झूठी दिलासा भी न दी, कहा ये लो एफ़ आइ आर की कॉपी, जाके इंश्योरेंस से हरजाना ले लो। लेकिन हमें तो पैसे नहीं अपनी कार वापस चाहिए थी। मैं और मेरे पति स्कूटर पर निकल पड़े अपनी कार को ढूंढने, ऐसा लग रहा था मानो घर का कोई सद्स्य चला गया हो। चोर बाजार, कालीना और जहां जहां कार के पुर्जे बिकते थे सब जगह जा कर चक्कर मार आए, कोई कहता दूसरे राज्य में चली गयी होगी और वहां बेच दी गयी होगी तो कोई कहता कि उसके टुकड़े टुकड़े कर के बेच दिए गये होगें, सुन सुन कर दिल छलनी हुआ जाता। तीन दिन तक हम इन सब कबाड़खानों के चक्कर लगाते रहे। हर दुकान के बाहर टंगा कार का द्रवाजा अपनी कार का लगता था। हमें यूं घूरते देख दुकानदार भी प्रश्नीली आखों से हम दोनों को घूरते, शुक्र की बात घूरने से आगे नहीं बड़ी। पर कितने दिन यूं ही सड़कें नापते, हार कर पतिदेव ने फ़िर से दफ़्तर जाना शुरु कर दिया और हमने कॉलेज्।
पतिदेव के पास तो इतना टाइम नहीं था लेकिन हमारी रोज की दिनचर्या बन गयी कि अपनी एक पड़ोसन को लेकर रोज दोपहर को पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाते, "कुछ पता चला?" अपनी जिंदगी में पहली बार पुलिस वालों के साथ पाला पड़ रहा था। पुलिस वाले कहते " अरे मैडम, यहां तो आदमी गुम जाए तो नहीं मिलता, ये तो फ़िर गाड़ी है। ये हमारे सीनियर इंस्पेकटर साहब को देखो, इनकी सरकारी जीप घर के नीचे से चोरी हो गयी आज तक नहीं मिली तो आप की गाड़ी क्या मिलेगी"। हम सुन लेते, दिल पर चोट खा कर भी इक मुस्कान के साथ लगे रहिए की इल्तिजा कर के वापस आ जाते।
पुलिस वाले से अपनी बात करने के लिए हमें रोज कुछ इंतजार करना पड़ता था, सो पहली बार थाने में क्या चलता है देख रहे थे। देख कर हंसी भी आती थी और गुस्सा भी। हम अक्सर ये सोचा करते थे कि पुलिसवाले इतने संगदिल कैसे हो जाते हैं, किसी के दुख से इनका दिल पसीजता क्युं नहीं। अब हमारा एक्सीडेंट वाले मामले में ही देखिए, कैसे बेपरवाह से बैठे रहे। यहां रोज आधा घंटा बैठने के बाद ही हमारा नंबर आता था बात करने के लिए। कोई आता शिकायत लेकर की मैं दोपहर को सो रही हूँ और मेरा पड़ोसी ऊपर अपने घर में ठक ठक किए जा रहा है, ये मेरे मानव अधिकारों का हनन है इस लिए मेरी शिकायत दर्ज करो और उसे दोपहर में थाने में बंद रखो, कोई आता कि मेरी चुन्नी हवा से उड़ कर उसके घर चली गयी और वो वापस नहीं करती, मानती ही नहीं कि चुन्नी उसके घर गयी है, इस लिए चोरी की शिकायत लिखो, कोई युवा प्रेमी घर से भाग गये तो लड़की के माता पिता शिकायत करते कि इनका लड़का हमारी लड़की को भगा ले गया, जब की मामला बिल्कुल साफ़ प्यार का था। कुछ सीरियस मामले भी आते, जैसे कोई औरत शिकायत करती कि उसकी जान को उसके पति से खतरा है। फ़िर हम जैसे लोग भी पहुँच जाते, जिन्हें पुलिस एक बार कह चुकी थी कि कुछ नहीं होने का पर फ़िर भी रोज पहुंच जाते “कुछ खबर मिली”। वो तो हम पढ़े लिखे संभ्रात परिवार से थे, इस लिए पुलिस वाले जरा नम्रता से जवाब देते थे नहीं तो कब का पुलिस थाने आना ही बैन कर देते। एक महीना हम पुलिस स्टेशन और मदिरों के चक्कर काटते रहे और फ़िर उम्मीद छोड़ चुपचाप अपने काम में लग लिए।
तीन महीने बीत गये। पतिदेव टूर पर गये हुए थे, रात के कोई नौ बजे थे कि हमारे दरवाजे की घंटी बजी, दरवाजा खोला तो दो छ: फ़ुट से भी लंबे भारी भरकम डील डौल वाले व्यक्ति खड़े थे। बोले
आप की गाड़ी चोरी हुई है?
हमने कहा, "हां"
बोले हम सी आई डी के आदमी हैं, एफ़ आई आर करवाया था
हमने कहा , " हां"
एफ़ आई आर की कॉपी दिखाई तो कुछ आश्वस्त हो कर बोले कि आप की गाड़ी मिल गयी है, जिन लोगों ने चुराई थी वो नीचे बैठे हैं।
हमारा मन बल्लियों उछलने लगा, हमने चोरों को देखने की इच्छा जताई, इस के पहले कभी चोर भी तो नहीं देखा था, पहले तो ना नुकुर करते रहे, पर हमारे जिद्द पकड़ने पर हमें ले चले, हमारी सोसायटी से थोड़ी ही दूरी पर जीप खड़ी थी जिसमें दो आदमी बैठे थे, देखने में एक्दम मध्यम वर्गीय, हमारे आश्चर्य को देखते हुए सी आई डी वाले हंसे और बताया कि दरअसल वो दोनों चोर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और अच्छे परिवारों से है, उनमें से एक की बीबी बैंक में मैनेजर थी तो दूसरे की बीबी स्कूल टीचर, ये दोनों बेकार्। इन दोनों ने नौकरी ढूंढने से ज्यादा फ़ायदेमंद कारें और स्कूटर चुराना समझा। दोनों उल्लासनगर से थे जो सिंधी इलाका माना जाता है, ये दोनों भी सिंधी थे।
सी आई डी वाले अक्सर सादे कपड़ों में बीअर बार वैगरह जैसी संदेहस्पद जगह पर नजर रखते हैं। उल्लासनगर की एक ऐसी ही बिअर बार में इन दोनों को बार बालाओं पर खूब पैसा लुटाते देखा गया, पुलिस ने जब खोजबीन की तो पता चला कि ये दोनों तो बेकार हैं और काम की तलाश में हैं। तो बस फ़िर क्या था सी आई डी वालों ने इन दोनों को धर दबोचा, पूछताछ शुरु की तो पता चला अब तक बम्बई के विभिन्न इलाकों से करीब साठ सत्तर गाड़ियाँ चुरा चुके हैं और बेच चुके हैं। हमारी कार चुराने से पहले ये एक हफ़्ते तक आकर हमारी कॉलोनी में यूं ही बैठते रहे और जायजा लेते रहे कि कौन सी कार उठानी ज्यादा फ़ायदेमंद रहेगी। अब क्युं कि हमारी सोसायटी में भी बहुतायत से सिंधी रहते थे और ये लोग संभ्रात दिखते थे किसी को इन पर शक नहीं हुआ। हमारी गाड़ी सबसे ज्यादा नयी होने के कारण उसी पर हाथ साफ़ किया गया, आनन फ़ानन में चेसी नंबर बदला गया और सीधा ले जाकर उल्लास नगर में एक सरदार को बेच दिया गया। जब पुलिस उस सरदार के घर पहुंची तो उसके लड़के की बारात निकलने वाली थी और उसने अनजाने में ही ली हुई इस चोरी की गाड़ी को सजाने के लिए खूब पैसा खर्च किया हुआ था। पंद्रह दिन के और कोर्ट कचहरी के चक्कर और दस हजार की चपत के बाद हमारी मैडम(कार) और सजधज के वो सरदार के घर से लौट आईं।
लोग कहने लगे आप बहुत भाग्यशाली हैं जो आप को कार वापस मिल गयी। उन्हीं दिनों दो और जन की कारें बम्बई के अलग अलग इलाकों से गायब हुई थीं पर वो किस्मत के इतने धनी नहीं रहे। 1990 से लेकर 2000 तक ये गाड़ी हमारे साथ रही( कल हम गलत लिख गये थे, गाड़ी 90 के दशक के अंत में नहीं शुरुवात में आयी थी)। शुरुवाती धुंआदार रिश्ते के बाद हमने 1999 तक स्टीरिंग व्हील को हाथ भी नहीं लगाया। कॉलेज हमारे घर से 15 मिनट की दूरी पर ही था ,सुबह पतिदेव छोड़ आते थे (जैसे अनूप जी अपनी पत्नी को छोड़ने जाते हैं,)और दोपहर में हम ऑटो से घर आ जाते। 99 में मकान बदलने से काफ़ी परेशानी हो गयी। अब हमारा घर कॉलेज से 15 किलोमीटर दूर हो गया। घर से भी जल्दी निकलना पड़ता था, बसों में जाने की आदत छूट चुकी थी। पतिदेव ने सलाह दी कि हम फ़िर से कार चलाना शुरु करें, डरने से काम नहीं चलेगा। लालच ये दिया गया कि वेन पर हाथ साफ़ कर लो और फ़िर नयी कार ले लेना, पतिदेव तब तक दूसरी ले चुके थे। तो हम एक बार फ़िर ड्राइविंग स्कूल गये। ड्राइविंग मास्टर को अपनी पुरानी आप बीती सुनाई और हिदायत दी कि वो क्लच ब्रेक का इस्तेमाल न करे।मास्टर अच्छा था, बड़िया सिखाया और फ़िर हमने वेन से दोस्ती की। वेन को नाम दिया "हर्बी", वो हर्बी की ही तरह अपनी मर्जी से चलती थी,जब मन किया रुक जाती थी और थोड़ा मनाओ, बातें करों तो चल पड़ती थी, रोज सुबह पूछ्ना पड़ता था , मैडम आज क्या मूड है चलेगीं क्या? बस कॉलेज तक जाना है। ऐसे ही मेरी सहेली ने अपनी कार को नाम दिया था
" मानकुट्टी" ये तमिल भाषा का शब्द है जिसका मतलब है हिरन का छोटा बच्चा। उसकी कार मारुती 800 थी। मेरी कार से थोड़ी कम नटखट्। कॉलेज से निकलते समय अगर हमारी कार चलने से आनाकानी करती तो हम धमकाते "देख चल पड़, नहीं तो तुझे यहीं छोड़ मानकुट्टी के साथ चली जाऊंगी", और आप यकीन नहीं मानेगें कि कार चल पड़ती अलबत्ता थोड़ी ज्यादा अवाज करते हुए जैसे प्रोटेस्ट कर रही हो।
सन 2000 के मध्य में हमने ऑल्टो ले ली और वेन बेच दी, जिस दिन वेन हमारे घर से गयी हमारे घर किसी ने खाना नहीं खाया। हम सोच रहे थे कि आखिरकार मशीन ही तो है इससे इतना मोह क्युं? पूरब और पश्चिम का गीत दिमाग में कौंध जाता था, "इतना आदर इंसान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं"।
वेन के साथ हमारे रिश्ते ने हमें अपने ही धर्म के मतलब समझा दिए । ये हिन्दू धर्म ही है जो निर्जीव चीजों में भी आत्मा देखता है शायद इसी लिए दशहरे के दिन कार जैसी निर्जीव चीजों की भी पूजा होती है।हम सोचते क्या वो सचमुच उतनी निर्जीव है, भावनाओं से मुक्त जितनी दिखती है। कभी अपनी कार से बतिया कर देखिए, उसकी भाषा समझ सके तो आप देखेगें कि वो बराबर जवाब देती है।