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सुस्वागतम

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February 14, 2008


हैप्पी वेलेन्टाइनस डे टू एवरीबडी

क्लास में जाते ही पीछे से एक लड़की की आवाज आई, " हैप्पी वेलेन्टाइनस डे मैडम", हम थोड़ा चौकें। अब तक हमारे जेहन में वेलेन्टाइन्स डे का ख्याल नहीं आया था( याद आ गया होता तो सुबह ही पतिदेव को विश कर देते, सोचा क्लास खतम होते ही फ़ोन करना होगा…:))।
लेकिन अब बात निकली ही थी और क्लास समाजिक मनोविज्ञान की ही थी तो वेलेन्टाइनस डे को लेकर बहस शुरु हो गयी।
नवभारत टाइम्स के देहली एडिशन में स्वतंत्र कुमार जी का विस्तृत लेख छपा था इसी विषय पर। उनका लेख पढ़ते पढ़ते मुझे अपने स्टुडेंटस की दलीलें याद आ रही थीं और दिख रहा था कि कितना फ़र्क है आज की युवा पीढ़ी की सोच में और प्रौढ़ होती(स्वतंत्र कुमार जी क्षमा चाह्ती हूँ)पीढ़ी में।
मेरे आश्चर्यचकित चेहरे को देख मेरी छात्रा ने कहा कि "कौन कहता है कि वेलेन्टाइन सिर्फ़ स्त्री पुरुष में होने वाले प्रेम को इंगित करता है, ये सभी तरह के प्रेम को दर्शाने का पर्व है। मैं तो सुबह अपने माता पिता को भी विश कर के आई हूँ"।
दूसरे छात्र उससे सहमत थे। हमने कहा कि कहीं ये नयी सोच वेलेन्टाइन का बाजारीकरण करने वालों की देन तो नहीं। आर्चीस अपने ग्रीटिंग कार्ड ज्यादा से ज्यादा बेचने के चक्कर में प्रमोट कर रहा हो कि जिस किसी से प्रेम करते हो उसे आज के दिन एक कार्ड और एक गुलाब का फ़ूल दो। हो भी सकता है ये बाजारीकरण की देन हो पर फ़िर भी सकारत्मक है, आखिरकार किसको बुरा लगता है अगर कोई आके कहे कि मुझे आपसे लगाव है फ़िर कहने वाला चाहे कोई बच्चा ही क्युं न हो? बस सच्चे मन से कहा हुआ होना चाहिए।

"लगभग सभी पारंपरिक समाजों में शादी एक पारिवारिक मामला रहा है। शादी का मकसद था बच्चा पैदा करना और पारिवारिक संपत्ति का संरक्षण। इसमें प्यार की कोई भूमिका नहीं थी और तत्कालीन अर्थव्यवस्था को देखते हुए संभव भी नहीं था। परिवार के बड़े-बूढे़ अपने अधिकारों ओर निर्णायक शक्तियों का प्रयोग शादी के आयोजनों में करते थे। वैलंटाइंस डे जैसे त्योहार इन लोगों को सीधे-सीधे अपने प्रभाव और सत्ता में दखल लगते हैं। वैसे भी इन त्योहारों में उनके लिए तो कुछ रखा नहीं है इसलिए भी उनकी तरफ से विरोध होना स्वाभाविक है।" स्वतंत्र कुमार(नवभारत टाइम्स)

क्या आप स्वतंत्र कुमार जी की बातों से सहमत हैं? इतिहास गवाह है कि बच्चे तो बिन शादी भी पैदा हुए, हाँ! ये बात और है कि राजकुमार नहीं कहलाए। जहां तक मेरी समझ जाती है ये उस वक्त की बात कर रहे हैं जब पारिवारिक संपत्ति पति के नाम होती थी, तब क्या पति सिर्फ़ इस लिए शादी करता था कि पत्नी आ कर संपत्ति की रखवाली करेगी। बिन प्यार सफ़ल ग्रहस्त जीवन की कल्पना मैं नहीं कर पा रही हूँ। बड़ी सफ़ाई से ये मान लिया गया कि घर के बड़े बूढ़े वैलेन्टाइनस जैसे त्यौहार का विरोध करेगें क्युं कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, भूमिका कैसे नहीं भाई, वे भी मनायेगें इस त्यौहार को।

पिछ्ले साल तक वैलेन्टाइन का विरोध करने वाले कई प्रदर्शनकारी दिखाई दे रहे थे, इस साल वो किसी और मसले में उलझे हुए हैं। विरोध यह कह कर किया जाता था कि ये हमारी संस्कृती का अतिक्रमण है। मुझे तो शेखर सुमन और रेखा द्वारा अभिनीत फ़िल्म का ख्याल आता है जहां वसंत उत्सव मनाना हमारी संस्कृती का हिस्सा बताया गया था। प्रेम का विरोध तो हम भारतियों ने कभी नहीं किया। हां! स्वतंत्र जी की इस बात से हम सहमत है कि प्रेम की अभिव्यक्ति मनुष्यता को मजबूत करती है, जरुरत है तो सिर्फ़ इस बात का ध्यान रखने की कि कहीं ये किसी को दुख न पहुंचाए। आज के कलियुग में अगर हम संतोषी माता की कल्पना कर सकते हैं तो प्रेम की देवी की क्युं नहीं, वैसे भी ३६ करोड़ देवी देवता हैं एक और सही, तो चलो साथियों

प्रेम से बोलो हैप्पी वैलेंटाइनस डे
सारे बोलो हैप्पी वैलेंटाइनस डे

February 10, 2008

तुमने मूंगफ़ली खायी?

पांच की सुबह साढ़े सात बजे जैसे ही हवाई जहाज से बाहर निकले ऐसा लगा जैसे कई सुइयां एक साथ आ कर गालों में गढ़ गयी हों। ये था ठंडी हवा का झोंका जो 4 डिग्री तापमान का गुलदस्ता सजाए हमारे स्वागत को आगे बढ़ आया था बिल्कुल अरबी स्टाइल में। किसी के स्वागत को ठुकराना असभ्यता होती है इस लिए हमने भी मुस्कुरा कर इस झोंके का स्वागत किया। आखिरकार 25 साल बाद हमारा मिलन हो रहा था।

अब देखिए कहने को दिल्ली हमारे घर से कोई ज्यादा दूर नहीं बस दो घंटे का हवाई सफ़र और एक रात का ट्रेन का सफ़र, फ़िर भी हमें 25 साल लग गये इस सफ़र को तय करने। ऐसा नहीं था कि हमने इसे याद नहीं किया। हर जाड़ों में हम इस ठिठुरन को तरसे थे, बम्बई के चिपचिपाते एक सरीखे मौसम में उत्तर की गजब की ठंड और गजब की गर्मी को भी तरसे हैं। जाड़ों में ओवरकोट की जेबों में चिलगोजे, अखरोट और मूंगलियां भर ले जाना, पैदल स्कूल जाना और रास्ते भर ये सब चरते जाना। रातों को सर तक खिचें लिहाफ़ों में दुबकना, गोभी के, मूली के परांठे सुबह शाम याद आये हैं।

एअरपोर्ट पर जो हमको लेने आने वाले थे वो कुछ लेट हो गये, हम तो खुश हो गये। घूम घूम कर हम जाड़े की छुअन से पुलकित हो रहे थे, ठंडक अंग अंग में प्राण भर रही थी और हम उस एक एक क्षण में कई बीते साल जी रहे थे, हमारे पति और भतीजी जो हमारे साथ बम्बई से आये थे हैरान हमारा चेहरा ताक रहे थे।

हम देहली तीन दिन रहे पर इन तीन दिनों में पिछ्ले कई सालों की कसर निकालने की कौशिश की। लिहाफ़ों में दुबके, स्वेटर मौजे पहन कर सोये, आलू के, गोभी के पराठें खाए खूब करारे घी में सिके हुए( हम इन तीन दिनों के लिए सब एतियात भूल गये), मूली इतनी मीठी मानों स्वर्ग से आयी हों। बस एक चीज का ही मलाल रहा। पूरी दिल्ली घूम लिए उत्तर से दक्खिन, पुरब से पश्चिम, पर हमें कहीं मूगंफ़ली का ठेला न दिखायी दिया। पता नहीं इस बार मूगंफ़ली की फ़सल अच्छी न हुई या सब की सब गंगा जी के किनारे चली गयी( याद है न ज्ञान जी ने अपनी पोस्ट में कहा था कि जब पुराने वाले दफ़तर में थे तो रोज मूंगफ़ली की पुड़िया खाते टहलते थे।) हम तो इन जाड़ों में दो दानों को भी तरस गये। एक मलाल और रह गया- मेट्रो में सफ़र का आंनद न लूट सके। खैर अगली बार सही।

फ़िर भी हमारा दिल्ली जाना बहुत ही बड़िया अनुभव रहा,बड़िया बड़िया जाड़ों के साथ साथ, जाड़ों की मधुर धूप सी आलोक पुराणिक जी से जो भेंट हो गयी। ब्लोग की दुनिया में हमने पदार्पण उनके ब्लोग पढ़ कर ही किया था, इस लिए वो हमारे लिए खास हुए न।अच्छे मेजबान की भूमिका निभाते निभाते आलोक जी के पांव दर्द करने लगे होगें इतने चक्कर लगाने पढ़े उन्हें चाय का इन्तजाम करने में । लेकिन बातें करते करते दो ढाई घंटे कैसे गुजर गये पता ही न चला, आलोक जी का तो पता नहीं कि बोर हुए कि नहीं पर हमारी बातें तो अभी और बाकी थीं। आलोक जी को मिल कर लौट रहे थे कि जयपुर से नीलिमा जी ने फ़ोन कर हमें अचंभे में डाल दिया। लती को अपनी खुराक न मिले तो जो हालत उसकी होती है वही हालत हमारी थी दिल्ली में। सब सुखद अनुभवों के बावजूद हम आप सब को मिस कर रहे थे, ऐसे में नीलीमा जी का फ़ोन मानों दर्द निवारक गोली का काम कर रहा था। नीलीमा जी धन्यवाद्।

February 01, 2008

प्यार हुआ इकरार हुआ

प्यार हुआ इकरार हुआ


दोस्तों आखिर वो दिन आ ही गया जब दो ब्लोगर जोड़े गाने वाले हैं

आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर,

सब को मालूम है और सबको खबर हो गयी…।:)



नहीं नहीं अभी नहीं अभी करो थोड़ा इंतजार


कुछ दिन पहले मैंने अपनी पोस्ट पर बताया था कि एक ब्लोगर जोड़े (युनुस जी और ममता जी) ने दो ब्लोगर जोड़ों को (अनिता और विनोद जी, बोधिसत्व और आभा जी ) को घेर घार कर उन्हें बीते दिनों को याद करने पर मजबूर किया( वैसे भूले ही कब थे?) और पूछा क्या तेरा भी था ऐसा हाल जैसा आज है अपना हाल( तीनों जोड़ों की खासियत ये है कि तीनों प्रेम विवाह के बंधन में बधें हैं)।

पूरा यहाँ पढ़ें... रेडियोनामा