मुझ पर ये पहाड़ तब टूटा जब मेरा लड़का-आदित्य(मेरी इकलौती संतान) बारहवीं में था। उसके नाजुक कधों पर मां-बाप, नाना-नानी, दादी और न जाने कितनों के सपनों का भार था, जो उससे उठाए नहीं उठ रहा था। समाजिक मुल्यों के चलते उसके दिमाग में ये बात घर कर गयी थी कि सब अच्छे लड़के सांइस लेते हैं, चाहे चले या न चले। सांइस ले तो ली पर अब वो रसहीन लग रही थी और बेकार का बोझ लग रही थी। बहुत समझाया कि देखो बेटा तुम्हारे मां-बाप भी तो आर्ट्स ले कर अच्छा खासा जीवनयापन कर रहे हैं, सांइस छोड़ दो पर नहीं जी, उसकी इच्छा को आदर देते हुए जैसे तैसे साइंस कॉलेज में दाखिला करा दिया। और तब शुरु हुआ फ़ेल होने का चक्कर, एक के बाद एक तीन साल निकल गये। ये वहीं के वहीं।एक महत्त्वकांशी महिला जिसने कभी हार का मुंह न देखा हो अपने जीवनकाल में वो आज असहाय सी अपने जीवन के सबसे अहम भाग में हार पर हार झेल रही थी। खुद अपनी ही नजरों में गिरती हुई,सेल्फ़-एस्टीम चकनाचूर, हर पल हजार मौतें मरती हुई, मैं सबसे कन्नी काटने लगी। स्टाफ़-रूम से उठ कर लायब्रेरी में किताबों के बीच ज्यादा वक्त गुजारती हुई, डरती थी कोई मेरे लड़के के बारे में न पूछ ले। यार दोस्तों, रिश्ते नाते दारों से भी दूर रहने लगी, मानों खुद को काल कोठरी की सजा दे दी हो। मेरी कॉलेज के जमाने की सहेलियां छूट गयीं, जिन्हें मैं बता न सकी कि मै क्युं न मिलने के बहाने ढूढती हूँ। दूसरों के बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर की डिग्रीयों की तरफ़ अग्रसर होते देख मेरे मन पर अमावस की रात का ढेरा होता था। तबियत खराब रहने लगी। तीन साल गुजर गये इसी तरह्। लगता था जमीन फ़ट जाए और मै उसमें समा जाऊँ।