दिवाली की रात
कहने को चार दिवारें अपनी थीं
काले चूने से पुती हुई,
पहली दिवाली की शाम,
न दिया न बाती,
न जान न पहचान,
ठंडा चुल्हा, घर में बिखरा सामान,
अंजान बाजारों में ढूढ़ती पूजा का सामान,
दुकानों की जगमग,
पटाखों का शोर,
सलीके से सजी दियों की पक्तियां,
मेरे घर से ज्यादा मेरे मन में अधेंरा भर रहीं थीं,
अकेलेपन की ठिठुरन, बोझिल कदम,
लौटते हुए माँ लक्ष्मी से बार बार माफी मांग रही थी,
प्रार्थना कर रही थी,
इस अधेंरे ठडें घर पर नजर डाले बिना ना निकल जाना,
लौटी तो देखा दरवाजे पर दो सुंदर से दियेअपनी पीली पीली आभा फैला रहे थे,
दो सुदंर सी कन्यांए सजी सवंरी,
हाथों में दियों की थाली लिये खड़ी मुस्करा कर बोलीं,
आंटी दिवाली मुबारक,
आश्चॅयचकित मैं,
हँस कर बोलीं हमारे यंहा रिवाज है,
अपना घर दियों से रौशन करने से पहले पड़ोसियों के घर जगमगाओ,
शत शत प्रणाम उन पूर्वजों को जिन्होंने ये रस्मों रिवाज बनाये,
शत शत प्रणाम उन बहुओं को जिन्होंने ये रस्मों रिवाज खुले मन से अपनाये
सुस्वागतम
आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।
August 15, 2007
August 08, 2007
तन्हाई
तन्हाई
आने वाली खामोश तन्हाई
लड़कपन में ही
अगाह करने कई बार चली आई थी
मैनें नींद की खुमारी में दस्तक सुनी अनसुनी
आस पास फैली खिलखिलाहटों से
अपना दामन भर लेने को मैनें खिड़की खोलनी चाही
पर साकलँ अटक गयी
मैंने भरपूर कौशिश की
कई साल कौशिश की
मेरे हाथ लहुलुहान हो गए
कितनी बार लगा कि साकलँ अब खुली कि तब खुली
पर साकलँ न खुलनी थी, न खुली
दूसरों की मुस्कुराहटें कब अपने लबों पर सजीं हैं
अपने अन्दर की घुटन से घबरा कर
आखिर मैंने दरवाजा खोल दिया
मेरी खामोश तन्हाई मदं मदं मुस्कुराती
दबे पावँ अन्दर चली आई
अब मैं सोच रही हूँ कि
दरवाजा खुला रखुँ या बन्द कर दूँ
आने वाली खामोश तन्हाई
लड़कपन में ही
अगाह करने कई बार चली आई थी
मैनें नींद की खुमारी में दस्तक सुनी अनसुनी
आस पास फैली खिलखिलाहटों से
अपना दामन भर लेने को मैनें खिड़की खोलनी चाही
पर साकलँ अटक गयी
मैंने भरपूर कौशिश की
कई साल कौशिश की
मेरे हाथ लहुलुहान हो गए
कितनी बार लगा कि साकलँ अब खुली कि तब खुली
पर साकलँ न खुलनी थी, न खुली
दूसरों की मुस्कुराहटें कब अपने लबों पर सजीं हैं
अपने अन्दर की घुटन से घबरा कर
आखिर मैंने दरवाजा खोल दिया
मेरी खामोश तन्हाई मदं मदं मुस्कुराती
दबे पावँ अन्दर चली आई
अब मैं सोच रही हूँ कि
दरवाजा खुला रखुँ या बन्द कर दूँ
August 07, 2007
दु:खता है
दु:खता है
गले में कसी इस चुन्नी को सिर्फ एक बार खोल दो
इतना तो कहने दो कि दु:खता है
मेरी छोटी सी सिसकी तुम्हें क्या डरायेगी
कहाँ तुम्हारी लकाँ ढह जाएगी
तुम्हारी तो बरसों की तैयारी है
सड़ी गली संस्कर्ती में लिपटा तुम्हारा ये मन
आखों पर खिचें मोटे काले पर्दे
बड़े जतन से छीली मेरी जबां
मेरी मौन चीख
ये सब कहाँ भेद पायेगी
अच्छा! सलीब नहीं हटाते तो न सही
कम से कम कधां तो बदलने दो
कि दु:खता है
गले में कसी इस चुन्नी को सिर्फ एक बार खोल दो
इतना तो कहने दो कि दु:खता है
मेरी छोटी सी सिसकी तुम्हें क्या डरायेगी
कहाँ तुम्हारी लकाँ ढह जाएगी
तुम्हारी तो बरसों की तैयारी है
सड़ी गली संस्कर्ती में लिपटा तुम्हारा ये मन
आखों पर खिचें मोटे काले पर्दे
बड़े जतन से छीली मेरी जबां
मेरी मौन चीख
ये सब कहाँ भेद पायेगी
अच्छा! सलीब नहीं हटाते तो न सही
कम से कम कधां तो बदलने दो
कि दु:खता है
Subscribe to:
Posts (Atom)