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March 01, 2008

चक दे रेलवे

चक दे रेलवे


ज्ञानदत्त जी के चिठ्ठे से रेलवे के अंदरूनी कार्य कलापों के बारे में अक्सर जानकारी पायी है और हर बार इस बात का एहसास हुआ है कि कितनी आसानी से हम चाय की चुस्कियों के साथ सरकार को कोस लेते हैं जिस में रेलवे भी शामिल है। ज्ञान जी के ब्लोग पढ़ने से पहले मेरी सरकारी अधिकारियों के प्रति कोई खास अच्छी राय नहीं थी। बिल्कुल उसी तरह जैसे राजनितिज्ञों के लिए नहीं है। मुझे धीरे धीरे एह्सास होने लगा कि हम अपनी धारणाएं एक तरफ़ा जानकारी के आधार पर बनाते हैं, वो जानकारी जो हमारे अनुभव होते हैं, हमारे लिए वही ठोस सत्य होते हैं पर अब लगने लगा कि वो पूरी सच्चाई नहीं होते। कई बार हम समझ लेते हैं कि आकाश उतना ही बड़ा है जितना हमारी आखों में समाता है। इस दृष्टी से देखा जाए तो चिठ्ठाजगत में विचरण करने से मेरी सोच परिपक्व हुई है। आज मैं अचानक इसका जिक्र क्युं कर रही हूँ। वो इस लिए कि परसों के यानि कि 28 फ़रवरी के टाइम्स ओफ़ इंडिया में छपे एक समाचार ने हमें विस्मित कर दिया और बरबस हमारे ख्याल इस बात पर चले गये कि सरकारी अफ़्सर भी उतने सवेंदनहीन नहीं होते जैसे हम सोचते थे। हर संस्था में कर्तव्यपरायण व्यक्ति कम ही होते हैं और ज्यादातर साधारण सी निष्ठा वाले, तो क्या, उन कुछ कर्तव्यपरायण लोगों की वजह से वो संस्था सुचारु रूप से चलती है जैसे गाड़ी में इंजन छोटा सा होता है पर पूरी गाड़ी उसके चलने पर ही निर्भर करती है।

खबर यूं है कि भूरी काल्बी नाम की एक गर्भवति महिला ट्रेन से अपने गांव स्वरूपगंज( जो राजस्थान में सिरोही और अबु रोड के बीच आता है) से अहमदाबाद जा रही थी अपना चैक अप करवाने। रास्ते में शौचालय का इस्तेमाल करते हुए वो कमजोरी की वजह से शौचालय में ही बेहोश हो गयी। काफ़ी देर तक जब शौचालय का दरवाजा नहीं खुला तो लोगों ने दरवाजा ठकठकाना शुरु कर दिया। किसी तरह से अर्धमूर्छित अवस्था में उसने दरवाजा खोला। उसी समय उसे एहसास हुआ कि उसका पेट बहुत हलका हो गया है और पिचका हुआ है। उसका बच्चा गिर चुका था। तेजी से भागती ट्रेन में वो बच्चा मां के पेट से खिसक कर शौचालय के छेद से फ़िसलता हुआ रेल की पटरियों पर जा गिरा। उसकी हालत देख उसके साथ आये रिश्तेदारों ने कलोल के पास चैन खींच दी। ये जगह उस जगह से दो स्टेशन दूर थी जहां बच्चा गिरने का अनुमान था। गॉर्ड को फ़ौरन सूचित किया गया।

गिरने वाला भ्रूण सात महिने की बच्ची थी। सौभाग्यवश कुछ ग्राम रक्षक दल के सदस्यों का ध्यान उस पर गया और उन्होनें पास ही के अमबलिस्यान स्टेशन के स्टेशन मास्टर के के राय जी को सूचित कर दिया कि एक नवजात शिशु रेल की पटरी पर पड़ा है। राय साहब फ़ौरन खुद उस दिशा में दौड़ लिए , उन्हें दूर से बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी और वो सरपट दौड़े चले जा रहे थे। पास पहुंच कर जो उन्हों ने देखा उस पर उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था। बच्ची बायीं पटरी के एकदम पास पड़ी थी और उसकी नाल एक तरफ़ लटक रही थी। इतनी तेज रफ़्तार से दौड़ती ट्रेन से गिरने के बावजूद उस बच्ची का बाल भी बाकां नहीं हुआ था। पटरी के नुकीले पत्थर भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके। दो घंटे के अंदर मां और बच्ची राजस्थान हॉस्पिटल में एक साथ थे। बच्ची न सिर्फ़ सात महीने की ही थी, उसका वजन भी सिर्फ़ एक किलो चार सौ ग्राम था। वो कहते हैं न जाको राखे साइयां मार सके न कोई। सही कहा उसकी माँ ने कि वो बच्ची भगवान ने उसे उपहार स्वरूप ही दी है, वर्ना ऐसा कभी सुना कि बच्ची की नाल भी अपने आप टूट गयी और चलती ट्रेन से गिर कर भी उसका बाल भी बांका न हुआ।
ये घटना जितनी अपने आप में रोमांचक है उतनी ही एक और बात उजागर करती है, राय साहब का सरपट भागना और गॉर्ड का पिछले स्टेशन पर तुरंत सूचना देना। राय साहब ने ये नहीं सोचा कि हो सकता है ये पास के गांव में से किसी का अवैध बच्चा भी हो सकता है। उनका एक ही ध्येय था उस समय उस मानव जीव की रक्षा। राय जी जैसे कर्मचारियों को हमारा सलाम । अगर रेलवे में ऐसे कर्मचारी हैं तो फ़िर चक दे रेलवे।

रेलवे से ही जुड़ी एक और खबर जो मुझे बहुत दुखी कर गयी वो है कि एक 50 वर्षीय मच्छी बेचने वाली महिला की जो रोज दहानू से शटल ट्रेन लेकर रात को 11।30 बजे आती थी और फ़िर वहां से चर्चगेट के लिए ट्रेन पकड़ती थी, ससून डॉक जाने के लिए, जहां से वो मच्छी खरीद कर वापस उसी रास्ते से घर जाती थी।
शुक्रवार के दिन भी हमेशा की तरह वो 15000 रुपये अपनी अंटी में बांध मच्छी खरीदने निकली। दुर्भाग्य से जब वो विरार पर उतर रही थी ट्रेन चल पड़ी। घबरा कर उसने प्लेटफ़ार्म पर छलांग लगा दी। लेकिन उसका पांव चलती ट्रेन और प्लेट्फ़ार्म के बीच आ गया। वो असहाय सी खून में लथपथ पड़ी थी। दो सरकारी रेलवे पुलिस वाले हवलदार वहां से निकल रहे थे। उन्हों ने उस औरत को कम उसकी अंटी में खौंसे बटुए को ज्यादा देखा। बटुए में से 12700 रुपए निकाल कर पास ही खड़े एक कुली की मदद से उसे दूसरी ट्रेन में डाला ये कह कर कि हॉस्पिटल में ले जाएगें लेकिन दो स्टेशन के बाद कुली को ये कह कर उतर गये कि उस औरत के गले का मंगलसूत्र और चूढ़ियाँ वो अपने हिस्से के रूप में ले ले और उतर जाए उसे वहीं ट्रेन में मरने के लिए छोड़ के। अब अगर ऐसे रक्षक बैठे हों तो भक्षक की क्या जरूरत ? कुली ने ऐसा नहीं किया और उसे अस्तपताल ले गया ये अलग बात है।(मुंबई मिरर
के सौजन्य से ) कुली भी उसी रेलवे का हिस्सा है इस लिए चक दे रेलवे अगर वो ऐसा न करता तो पूछना पड़ता क्या सच में चक दे?

तो ये है भारत के रेलवे के दो रूप्। प्राथना करती हूँ राय जैसे लोगों की संख्या बढ़े।

10 comments:

yunus said...

अनीता जी, मुझे लगता है फ़र्क़ सरकारी नौकरी में होने, अधिकारी होने या ना होने से नहीं पड़ता, इन घटनाओं ने बताया कि कुछ व्‍यक्ति संवेदनशील थे और जिम्‍मेदारियों को निभा रहे थे और कुछ बेहद निर्मम थे और केवल पैसों के पीछे भाग रहे थे । दुनिया दोनों तरह के लोगों को मिलाकर बनी है । वैसे आपकी पैनी दृष्टि की तारीफ़ किये बिना नहीं रहा जा रहा है । इसलिए 'आप कहती रहिए' हम सुन रहे हैं ।

आनंद said...

मेरा मानना है कि बेईमान लोगों की तादाद बहुत कम है। परंतु समाचारपत्रों को बेईमानी, धोखाधड़ी की ख़बरें बताने की आदत है। इसलिए बहुत से ईमानदार लोगों की ईमानदारी, सहयोग, सेवाभावना की बातें सुनाई नहीं देतीं। हमें अभी आस्‍था रखनी चाहिए। - आनंद

Shiv Kumar Mishra said...

दूसरों के प्रति संवेदनशीलता ही काफ़ी है. कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति कहाँ काम करता है. और ये तो सचमुच ही चमत्कार है कि इतनी छोटी बच्ची बच गई. भगवान जो चाहें, वही होता है.

Sanjeet Tripathi said...

आमीन, आमीन!!!!

यह पहली वाली खबर पढ़ने में आई थी पर सिर्फ़ एक कॉलम की जबकि बकवास खबरों के लिए दो से चार कालम की जगह होती है हमारे अखबारों के पास!!

खबर पढ़ने के बाद यही एहसास हुआ कि दुनिया में चमत्कार नाम की कोई चीज/बात वाकई होती है।

anuradha srivastav said...

अनिता जी बात इन्सानियत की है- मानसिकता की है। दो व्यक्ति जो दुर्धटनाग्रस्त औरत को भी लूटने से बाज नहीं आये। दूसरी तरफ राय साहब जैसे शख्स भी थे जो जी-जान लगा कर दौड लगा रहे थे कि किसी भी तरह से बच्ची को बचाया जाये। बहरहाल बच्ची का बचना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

डॉ. अजीत कुमार said...

आंटी,
आपने बिल्कुल सही लिखा..." कई बार हम समझ लेते हैं कि आकाश उतना ही बड़ा है जितना हमारी आखों में समाता है। "
इस दुनिया में सच-झूठ,अच्छा-बुरा,सही-ग़लत,ईमानदारी-बेईमानी हमेशा से रही है और रहेगी. पर यदि जीवन का उजला पक्ष हमें थोड़ी सी भी अच्छाई करने पर मजबूर करता है तो कहीं न कहीं हम किसी न किसी की भलाई कर पाते है.
संवेदनशीलता और संवेदनहीनता का अच्छा उदाहरण आपने अपने पोस्ट में प्रकाशित किया है.
धन्यवाद.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आज ही कोटा पहुँचा। सुन्दर पोस्ट है। हम भारतियों का सब से बड़ा अवगुण है बुरे को देख कर मुंह फेर लेने का। यह नहीं हो तो बुराई कोसों नजर न आए।

रचना said...

अपने ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी का बहुत धन्यवाद. :)
राय साहब जैसे लोग हैं सब जगह बस शायद सँख्या जरा सी कम हैं :)
और हाँ आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ब्लॉग के जरिये हमे जो " फर्स्ट हैंड" किस्म की जान्कारी मिलती है उससे सोच को नया आयाम मिलता है..

अजित वडनेरकर said...

एकदम सहमत हूं। बढ़िया पोस्ट है। आपका नज़रिया मानवीय भी है और पत्रकारीय भी।

Rajesh said...

Hats off to such Railway employees. Aaj aapke article se pata chala ki jahan burai hai vahin achhaaiyan bhi hoti hi hai...