एह्सास
मेरे एक नेट मित्र हैं देहली से राजेश जी, उनका लड़का विरल त्रिवेदी लगभग मेरे लड़के की ही उम्र का होगा। नयी पीढ़ी का नवयुवक जिसका आत्म चिंतन भी अंग्रेजी में होता है। किताबों से दूर, आत्मविश्वास और अपने अंदर के टेलेंट के बूते पर आगे बढ़ने का सलीका लिये एक आम बम्बईया पैदावार लगता है, है नहीं । नीचे लिखी तस्वीर उसी ने नेट पर से ढूंढ निकाली थी और इसे देख कर उसके मन से जो फ़ूटा वो आप भी देख सकते हैं। हम तो हैरान हुए ही उस अक्ख्ड़ सी शख्सियत के पीछे छुपे इस संवेदनशील मन को देख कर, सोचा आप से भी बांट लें। भविष्य में सकारात्मक संभावनाएं अभी बाकी हैं।

एहसास
तेरी गरम बाहों को आज भी ओढ़ कर सोता हूँ मैं
तेरी सासों की महक से आज भी मदहोश होता हूँ मैं
तेरे केसुओं को आज भी अपनी उंगलियों से सहराता हूँ मैं
तेरी रूह के आइने में खुद को आज भी देख पाता हूँ मैं
तेरे जिस्म का एहसास आज भी वैसा ही बरकरार है
तेरे बदन की खुशबु से आज भी दिल की दुनिया गुलजार है
तेरे हाथ को अपनी दो हथैलियों में रख कर
निगाहों से हाले दिल सुनाने का सिलसिला भी जारी है
मेरी बेजुबान आखें तेरी सिलवटों का आइना बनकर
मुझे रोज सहर में झिंझोड के जगा देती है
मैं महसूस करता हूँ ये सब, इन एह्सास को जी नहीं पाता
फ़िर भी, वो एह्सास है जो जिन्दा है आज भी , सांस ले रहा है
काश हम थोड़ी देर और साथ जी पाते, तुम और मैं
खैर, इन एहसासों का मैं शुक्रिया कैसे करुं
कि तुम्हें अब तक मुझसे जोड़ के रखनेवाले वो ही तो हैं
ये एहसास ही तो है, जो हमको जोड़े रखेगें…हमेशा।



