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July 29, 2008

कुलबुलाहट

कुलबुलाहट

इधर हम कुछ दिनों से कुछ नहीं लिख पा रहे। मन और मस्तिष्क दोनों छुट्टी पर हैं। उनके लौटने का इंतजार है। हमने कई नोटिस भेजे हैं पर दोनों टस से मस नहीं हो रहे, बिमार हैं कह कर टाल दिया जब की हम जानते हैं कि दोनों बारिश की रिमझिम का मजा ले रहे हैं।


सभी ब्लोगरस की तरह हमें भी बहुत कुलबुलाहट हो रही है। जब नहीं रहा गया तो आज हमने मस्तिष्क को फ़ोन लगाया'अरे भई, नहीं आते तो मत आओ, वहीं से हमारे एक सवाल का जवाब दो, ये बहुत परेशान कर रहा है'।

मस्तिष्क बोला मतलब अब हमारा भी वर्चुअल ऑफ़िस हो लिया, खैर क्या सवाल है ?

मैं- हम बाह्य मुखी हैं या अंतर्मुखी मतलब एक्स्ट्रोवर्ड या इन्ट्रोवर्ड?

मस्तिष्क कुछ सोचते हुए बोला हम तब जवाब देगें जब मन भी हमारी बातचीत में शामिल हो, आखिरकार ये तो पॉलिसी डिसिजन है जी।हमने मन को भी फ़ोन लगाया, विडियो कोन्फ़्रेसिंग करवाई,( कित्ते पैसे खर्च हो गये, ब्लोगिंग की लत जो न करवाये कम है)

मैं- मस्तिष्क भाई, हमें इतनी कुलबुलाहट क्युं हो रही है? एक साल पहले भी कहां लिखते थे तब तो ऐसी बैचेनी नहीं होती थी, ब्लोगजगत के दोस्तों को इतना मिस न करते थे।क्या ये बाह्य मुखी होने की निशानी है?

मन- लो! अब ये नयी बिमारी हमारे पल्ले बांध रही हो। हम तो ताउम्र ये समझे थे कि तुम अपनी तन्हाइयों में खुश रहती हो, फ़िर ये कुलबुलाहट की बात कहां से आ गयी।

मैं- वही तो हम पूछ रहे हैं क्या ब्लोगजगत ने हमें बदल कर रख दिया है और हमें पता भी न चला कि कब हम अंतर्मुखी से बाह्य मुखी हो गये।

मस्तिष्क अपनी पिछवाड़े वाली कोठरी से निकलता हुआ बोला अंतर्मुखी अपने ही विचारों और भावनाओं से ऊर्जा पाते हैं, और एक वक्त में एक ही काम करते हैं पूरी एकाग्रता के साथ्।

मन- तब तो ये अंतर्मुखी हो ही नहीं सकती, देखा नहीं तुमसे और मुझसे कितना काम करवाती हैं, एक ही वक्त में तीन तीन चार चार काम करने को कहती हैं। लेक्चर बनाने को बैठती हैं तो मुझे दौड़ा देती हैं, जरा देख कर तो आओ ब्लोगजगत में क्या हो रहा है, ज्ञान जी का मक्खीमार का रिकॉर्ड तीस तक पहुंचा कि नहीं, अनूप जी ने किसकी मौज ली, अजीत जी के बकलम में कौन आया, और भी न जाने कहां कहां जाने के लिए लंबी लिस्ट पकड़ा देतीं हैं। दौड़ते दौड़ते शाम हो जाती है पर इनकी लिस्ट तो शैतान की आंत की तरह खत्म ही नहीं होती। हांफ़ते हांफ़ते वहां का हाल सुनाता हूँ तो तुम्हें झट से दौड़ा देती हैं मेरे तो पैरों में छाले पड़ गये। मैं कहे देता हूँ मैं गणपति की छुट्टियों से पहले नहीं आने वाला। अवकाश अवधि बड़वाने की अर्जी देने वाला हूँ। देखो देखो, छुट्टी पर हूँ फ़िर भी चैन नहीं यहां भी फ़ोन ख्ड़का दिया।

मै- तुम तो शिकायतों का पुलिंदा हो जी

मस्तिष्क हम दोनों की नोंक झोंक को नजर अंदाज करते हुए बोला सोचने वाली बात ये है कि अंतर्मुखी मितभाषी होते हैं और जो भी बोलते हैं बहुत सोच विचार कर बोलते हैं।

मन तपाक से चहचहाया- देखा! मैं न कहता था ये अंतर्मुखी हैं ही नहीं, इनके जैसा बातूनी देखा है कहीं और सोच विचार का तो नाम ही मत ओलो। जब तक तुम अपने पेंच कसते हो, इनकी जबां फ़िसल चुकी होती है।

मै- अरे हमेशा थोड़े ऐसा होता है वो तो जब हम एक्साइटेड होते हैं तब्…।

मस्तिष्क - तुम दोनों यूं ही भिड़ते रहे तो मैं चला।

मैं - अरे नहीं नहीं, फ़ोन मत रखना, तुम बोलो तुम बोलो, ऐ मन चुप बैठो।

मस्तिष्क- हम्म! अंतर्मुखी को अपनी निज जानकारी जग जाहिर करने में बड़ा संकोच होता है, तो तुम्…

हम टप्प से बोले नहीं नहीं ये बात हम नहीं मानते, हमारे कई ऐसे ब्लोगर दोस्त हैं जो अंतर्मुखी हैं पर हम सबको उनकी पल पल की खबर रहती है वो भी बिना जासूस।

मस्तिष्क परेशान होते हुए बोला तब हमें नहीं मालूम, किसी और को पूछो।हम छुट्टियों में ओवर टाइम नहीं करते।

अब बताइए जनाब किस से पूछें , क्या आप बता सकते हैं हम बाह्य मुखी हैं या अंतर्मुखी?

April 07, 2008

मेरे संग खेलोगे?

मेरे संग खेलोगे?
अनिता कुमार

बचपन में याद है न हम सब ने न जाने कितनी दुपहरियां टीचर-टीचर, डाक्टर-डाक्टर, मम्मी-पापा और न जाने क्या क्या खेलते हुए बिताई थी। मम्मी सो रही होती थी और हम चुपके से तार पर सूखती उनकी साड़ी खींच कर ले आते थे , उलटी सीधी जैसी लपेटी जाती लपेट ली जाती( मैं आज तक नहीं समझ पाई ये साड़ी इतनी लंबी क्युं बनाई जाती है, लपेटते ही जाओ, लपेटते ही जाओ…अजीत जी को पूछना पड़ेगा ये हिन्दी का मुहावरा "लपेट लिया" और साड़ी लपेटने का कोई संबध है क्या?…:)) और फ़िर अलमारी खोलते ही भड़ भड़ करते हमारे छोटे छोटे किचन के खिलौने बर्तन जमीन पर फ़ैल जाते थे। आवाज सुन कर मम्मी समझ तो जाती थीं कि उनकी धुली साड़ी फ़िर से धोनी पड़ेगी पर नींद में वहीं से डांट लगा कर गुस्से की इतिश्री कर देती थीं। हम भी अपने साजो सामान लपेटे बाहर बरामदे निकल लेते थे और फ़िर शुरु होता था घर-घर का खेल्। कल्पना के पंख लगते ही मन पता नहीं क्या क्या खुराफ़ातें करने को मचल जाता था।
आगे यहाँ पढ़ें.......... रेडियोनामा

December 05, 2007

राहुल गांधी की शादी

राहुल गांधी की शादी


शाम को घूमने निकले तो नये मॉल की तरफ़ निकल लिये। कित्ता बड़ा मॉल था जी, पांच मंजिला और कित्ती सारी दुकानें, अपने अपने साजो सामान से लैस, सजी धजी जगमग जगमग करती। अंदर घुसने को भी तीन तीन दरवाजे, दरवाजों पर संतरी। किसी तरह से सकुचाते सकुचाते हम सब से नजदीक के दरवाजे से अंदर घुस लिए। सतंरी ने पर्स तक खंकाल लिया, उसमें सिर्फ़ चिल्लर और कुछ मूंगफ़लियां थीं। इत्ती शर्म महसूस हुई, भला क्या सोचेगें संतरी भैया, कहां कहां से उठ के आ जाते हैं ऐसे ट्ट्पूंजीए लोग, चवन्नी , अठन्नी लिए हुए, यहां क्या मूंगफ़लियां बेचेगें। पता होता कि ये संतरी महाराज चेकिंग करने वाले हैं तो कुछ रुपये न डाल लेते पर्स में । खैर, उससे आखं चुराते हम आगे बढ़ लिए। सामने ही आलोक पुराणिक जी अपनी दुकान पर पूड़ियां छानते नजर आ गये। हमारी तो जैसे जान में जान आई, उधर ही बढ़ लिए, वैसे वो हमको नहीं जानते जी, हम उनकी पूड़ियों का ऑर्डर घर से देते हैं न जी।


आलोक जी ये बड़ी बड़ी सुनहरी पूड़ियां छान रहे थे, बिल्कुल वैसी जैसी बचपन में हमने करोल बाग के स्टेंडर्ड की दुकान की खाई थीं । पूड़ी और आलू की सब्जी इतनी तेज कि मुंह से सी सी न निकले तो नाम बदल दो। देखते ही मुहँ में पानी आ गया। हम इंतजार करने लगे कि कोई आके हमसे ऑर्डर ले ले। बगल वाली टेबल पर ही राहुल गांधी बैठा था, बड़ा अनमना सा, मुंह लटकाए।


आलोक जी ने नौकर से हमारा ऑर्डर लेने को कह अपनी चिरपरिचित मुस्कान बखेरते हुए राहुल को पूछा क्युं गुरु आज ये मुर्दनी कैसी। सब खैरियत तो है। अपने भी कान उधर लग गये(आदत से मजबूर, क्या करें)। पहले तो राहुल ने ना नुकुर की फ़िर एक लंबी सांस लेकर बोले


पता है यार मेरी उमर कित्ती हो गयी है?


आलोक जी थोड़ा अचकचाए, फ़िर बोले, हां तुम निक्कर पहन कर आते थे मेरी दुकान पर पूड़ियां खाने राजीव जी के साथ, ह्म्म्म्म्म, तो अब 32/33 के तो होगे। क्युं?नहीं यार मुझे लगता है मेरी शादी कभी न होगी.


अरे! ऐसा क्युं लगता है, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, अटल जी को देखो, अभी तक नहीं फ़सें।


मजाक मत करो यार, मैं सीरियस हूं।


अरे तुम इतने सुन्दर गबरू जवान हो, एक क्या हजार मिलेगीं।


नहीं यार मुझे लगता है मुझे तो कोई इम्पोर्ट करनी पड़ेगी, सोचता हूं एक इटली का चक्कर लगा ही आऊं।


अब आलोक जी थोड़ा झुंझुलाए। छालना नौकर के हवाले करते हुए उठ पड़े और राहुल की टेबल पर आते हुए बोले ऐसी क्या बात है, यहां भी एक से बढ़ कर एक हैं कभी हमारी मीडिया की क्लास में आओ, ये लो हमारा लुच्चई चश्मा, इससे सब बराबर दिखता है। रखो, रखो मेरे पास और भी हैं।


राहुल अब भी ठंड़े से बैठे रहे, चश्मा जरूर उन्हों ने जेब के हवाले कर दिया, बोले कोई फ़ायदा नहीं।


आलोक जी जरा चिंतित होते हुए बोले भई बात क्या है, कुछ बताओगे भी , आखिर दोस्त हैं तुम्हारे।


यार क्या बताऊं लड़कियां तो यहां भी एक से बढ़ कर एक हैं पर कौन मां बाप मेरी मां से पंगा लेगा?


क्युं सोनिया जी नहीं चाह्तीं कि तुम्हारी शादी हो?


वो तो कुछ नहीं कहतीं पर हमारी पार्टी वाले ही मेरी जान के दुश्मन हैं। आश्चर्य से आलोक जी ने पूछा वो कैसे?


यार तुम्हें दीन दुनिया की कोई खबर है नहीं, कभी दुकान से बाहर जाकर देखा है? जगह जगह पोस्टर लगे हैं


<pसोनिया>" गांधी को बहुमत दो"


"सोनिया गांधी को बहुमत दो"

अब बताओ कौन देगा अपनी बेटी मुझे।


गंभीर मुद्रा धारण करते हुए आलोक जी ने हुंकार भरी, "हुम्म! ये तो सोचने वाली बात है"।


तब तक राहुल दो प्लेट पूड़ियां चट कर चुके थे, पता नहीं चल रहा था कि आसूं तरकारी के तीखेपन के कारण हैं या अपनी हालत पर रो रहे हैं।


इतने में बाहर से युनुस जी की दुकान से मधुर सगींत के स्वर पूरे मॉल में फ़ैलने लगे, "खोया खोया चांद, खुला आस्मान्…।" आलोक जी की आखें चमक उठीं। राहुल के कान में फ़ुस्फ़ुसाते हुए बोले एक आइडिया है, तुम ममता बहन को कोनटेकट करो, बंगालने भी एक से बढ़ कर एक होती हैं अब सोहा अली खान को ही ले लो, खोया खोया चांद देखी कि नहीं , भैया, चांद तो वो थी, खोये खोये से हम थे, क्या लगी है। और फ़िर बंगाल में तो अभी ऐसे पोस्टर भी नहीं लगे जैसे तुम बता रहे हो। वैसे भी बहां कब कौन लेफ़्ट है और कौन राइट, पता ही नहीं चलता, तुम्हारा मामला फ़िट …


राहुल ने हैरानी से पूछा पर तुम तो राखी सावंत और मल्लिका शेरावत…॥ उसकी बात काटते हुए आलोक जी बोले अजी वो सब बहुत पुरानी बाते हो गयीं आज कल तो सोहा, विध्या बालन और प्रियंका का जमाना है।


अब वेटर बिल ले कर आ गया तो हम को उठना पड़ा, पता नहीं राहुल ने खोया खोया चांद देखी की नहीं।

October 25, 2007

कंगारू

कंगारू
टी 20 इंटरनेशनल जीतने की खुशी में ताज इंटर्कॉटिनेट्ल में एक रात्री भोज का आयोजन हुआ। धोनी की तरफ़ से खास न्यौता आया, आखिर पुराने छात्र हैं हमारे, हाँ ये बात और है कि वो कभी क्लास में न नजर आये और उनका नाम हमारी ब्लैक लिस्ट में था। पर आज हमारे मन में कोई शिकायत नहीं थी, आखिरकार टी 20 जीत देश का नाम रौशन किया था, और फ़िर ताज जैसे महंगे हॉटेल में भोज, वो भी एकदम मुफ़्त्।

हॉटेल पहुंचे तो देखा कई राजनेता, फ़िल्लम इस्टार, मिडिया वाले और न जाने कौन कौन धोनी को बगल में पोस्टर सा चिपकाये फ़ोटू खिचवाये रहे हैं। सिर्फ़ आखों से अभिवादन का आदान प्रदान हुआ, धोनी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान, मानो कहते हो, देखा तुम तो कहती थी ऐसे ही चला तो वी टी स्टेशन पर चने बेचते नजर आओगे, वैसे भी अंग्रेजी आती नही, अगूंठा छाप कहीं के, उस फ़ट्फ़टिया की ड्राइवरी करते नजर आओगे, अब कौन से चने के झाड़ पर बैठे है हम्। फ़ीकी सी हंसी के साथ हमने हां में सिर हिलाया। समझ गये कि ये वक्त रिश्तों के सेतु संवारने का नहीं।

इधर उधर नजर दौड़ाई तो एक तरफ़ कौने में ऑस्ट्रेलियन खिलाड़ी गंभीर चेहरे लिए किसी गहरी मत्रंणा में डूबे नजर आये। कोई उनकी तरफ़ ध्यान न दे रहा था, न वो किसी की तरफ़ ध्यान दे रहे थे। उनके बगल वाली खाली टेबल हमें सबसे सुरक्षित लगी धोनी के फ़ारिग होने का इंतजार करने के लिए। फ़िर हमारी कान लगाने की पुरानी आदत जायेगी थोड़े न।

रिक्की पोटिंग - जो हुआ बहुत बुरा हुआ, इनका तुक्का दूसरी बार कैसे चल गया। समझ नहीं आ रहा, ये लोग तो हार स्पेशलिस्ट हैं, जीती हुई बाजी एन वक्त पर छोड़ देना इनकी फ़ितरत है, कहां गयी इनकी संस्कृती अतिथी दैवो भव:, पहले आप्। सच्ची बहुत बतमीज हो गये हैं।दुनिया में हमारी क्या साख रह जायेगी।

मैथ्यु- मेरी बीबी का तो ऑलरेडी स म स आ चुका है- तलाक, तलाक , भला उसकी भी कोई इज्ज्त है कि नहीं, क्या मुहं दिखाय अपनी सहेलियो को, उसका पति एक टुच्ची सी बच्चों वाली टीम से हार गया।

साइमंड- मौका मिलने दो, हनुमान बन इनकी लंका में आग न लगाई तो मेरा नाम भी बंदर, सॉरी, साइमंड नहीं।

रिक्की- चुप यार, हमेशा कन्फ़्युजड रहता है, अबे अपुन इन्डियीन टीम से हारे हैं, श्री लकंन टीम से नहीं ( हालाकिं अब ये रोज होगा ऐसा ख्तरा बड़ता जा रहा है)और ये हनुमान कौन है?

मन्ने तो लागे है जी कि ये सारा किया धरा शाहरुख खान का है। जिधर जाता है जीत उसके पीछु पीछु लग लेती है। अब बताओ, इन्ने कोई काम न हे जो किरकिट देखन साउथ अफ़्रिका आ गये।
हाँ सही कह रहे हो बंधु, क्यों न शाहरुख को अपनी टीम का चियर लीडर का अनुबंध दिया जाए। ये चियर लिडरनियां तो जी जरा लकी न निकलीं। लेकिन रिक्की भाई एक बात एकदम क्लीयर कर दियो, ये शाहरुख चक दे इंडिया न बोले।

क्लार्क- हाँ, मन्ने तो लागे है ये चक दे इंडिया गाना ही अपनी वाट लगाये है। मैं जब भी इनको घेरु हूँ, वो डी जे चक दे चक दे लगा दे और पूरा स्टेडियम खड़ा हो जावे। अब ये तो भई ज्यासती है ने हम बिचारे 11 और ये लोग 11000, कोई न्याय है भला, दिल तो करता था इस चक दे को चक्कु से चॉक ही कर दूं।
ब्रिट ली गंभीर मुद्रा में अब तक गिटार के तार ठीक कर रहे थे, बोले - मुझे लगता है ये दीपिका पदुकौन को स्टेडियम में आने से रोकना होगा।
रिक्की अचकचाए कौन दीपिका, और सुन्दर कन्या को आने से क्युं रोकना होगा, सुन्दर नजारे न हुए तो पूरी रात मैदान में कैसे कटेगी।
ब्रिट- तुम देखे न भैया, उसकी एक शर्मिली सी मुस्कुराहट पर धोनी कैसे घूम जाता था, बॉल सीधा स्टेडियम की छ्त को छूती दीपिका के पैरों पर गिरती। भई, इनका तो इश्क का तोहफ़ा हो गया खेल खत्म होने से पहले, इधर छ्क्का मान लिया गया।
एड्म- सही कहते हो, शोनाली का नाम भी उस लिस्ट में जोड़ो, श्रीसंत को देखा, उसे देख कैसे बलियों उछ्लता है।
रिक्की- दरअसल एक दो को छोड़ सब छ्ड़े छांट भर लिए है टीम में। खेलते तो है क्रिकेट पर जेन्टलमैन वाली कोई बात नहीं रह गयी। दे आर ऑल आउट टू इम्प्रेस गर्ल्स्। मंत्रणा चल ही रही थी कि खाना आ गया।

रिक्की- आइडिया

बाकी सब- क्या , क्या,

रिक्की- क्युं न अपनी सरकार से सिफ़ारिश करे कि इन्हे वो कंगारू गेहूं भेज दें, वो लाल वाले।
रिक्की ने आखँ मारी, सब हस पड़े, सही है गुरु, क्या सोचा है, ये मारा चौका। कगांरु गेंहू का के ये कंगारू और कगांरुओ से निपटना हमे आता है( मानो कहते हो हारी बाजी को जीतना हमें आता है …हम सिंकदर हैं …।) ही ही ही

(मेरे एक छात्र के अनुसार पहली पंक्ती परिक्षा में जो लिखी जानी चाहिए वो है"नीचे लिखे सारे उत्तर काल्पनिक है, किसी भी किताब से किसी भी प्रकार की कोई भी समानता महज इत्तेफ़ाक है, इरादतन नहीं)

तो हम भी यही कहना चाह्ते हैं कि ऊपर लिखी सब घटनाएं कोरी काल्पनिक हैं ,किसी को दुख/ठेस पँहुचाने का मेरा कोई इरादा नहीं, ये सिर्फ़ मजे के लिए लिखा गया है।




October 22, 2007

आलोक जी का रावण

आलोक जी का रावण

आलोक जी के रावण को देख एक दृश्य मेरे जहन में कौंध रहा है, आप भी देखिए।रावण ज्ञानद्त्त जी के सैलून जैसे ड्ब्बे में सफ़र कर रहा था, फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि ज्ञानदत्त जी अकेले सफ़र करने का मजा लूट सकते हैं साथ में सिर्फ़ अर्दली और रावण लालू की तरह लंबी चौड़ी ताम झाम साथ में लिए सफ़र कर रहा था, नौकर चाकर, प्रेस वाले , कुछ कंपनियों के सेल्समेन, कुछ सुरक्षा कर्मी और पता नहीं कौन कौन्।

सफ़र करते हुए वो अपने मोबाइल के बिल बाँच रहा है और मंदोदरी ड्रेसिंग टेबल पर बैठी गिन गिन कर अपने सफ़ेद बाल नोच रही है। बालों की लहलहाती ख्रेती तेजी से गायब हो रही है, मंदोदरी परेशान है। बाल तो रावण भी अपने नोच रहा है, आलोक जी ने सही कहा, रावण बिचारा लोन कन्या के गच्चे में आ गया। दरअसल हुआँ यूं कि लोन कन्या की आवाज सीता जी से इतनी मिलती थी कि रावण को लगा वहीं है, सोचा, अगर पाचँ द्स मोबाइल लेने से मामला फ़िट हो जाता है तो सौदा महंगा नहीं। अब बिल आया तो पता चला कि मामला तो कुछ और ही था।वो राम ने कोई लोचा कर दिया था फ़िर से।पहले भी एक बार ऐसी खुराफ़ात की थी उसने किसी बंदर को भेज दिया था। सब अच्छे पतियों की तरह रावण ने भी फ़ाइनेंस मिनिस्टर, होम मिनिस्टर का पद भार मंदोदरी को दे रखा था, अब परेशानी ये कि मंदोदरी के सवालों के क्या जवाब देगें, सवाल करने पर आ जाए तो बड़े बड़े वकीलों के भी कान काट दे। एक तो ये पेचीदा बिल, ऊपर से उनका भुगतान करने के लिए अशोक वाटिका गिरवी रख चुके थे, अब मंदोदरी को क्या बताते, इश्क में बाल कहां तक नुचे।

मामले को सभांलने के इरादे से मंदोदरी का मनुहार करते हुए अपने ज्ञान का बखान करते हुए बोले तुम क्युं अपने बाल यूं नौचती रहती हो, बालों को रंग क्युं नही लेती, तपाक से लॉरइल वाला सेल्समेन शुरु हो गया- महारानी साहिबा महाराज ने क्या पते की बात कही है, ऐसे ही थोड़े चहु दिशाओं में महाराज के ज्ञानी होने के डंके बजते। अब देखिए बाल रंगने के कितने फ़ायदे हैं, इत्ते सालों से वही काले बाल देख देख कर आप बोर नहीं हो गयीं , अब ये सफ़ेद बाल तो आप का पेंटिग का कैनवास है, रोज जिस कलर की साड़ी पहनो उसी रंग के बाल रंगो, न्यु लुक एवेरी डे, मैचिंग सैंडल( कहाँ मिलते हैं समीर जी बता देंगे), मैचिंग पर्स, मैचिंग लिपस्टिक, मैडम एश्वर्या भी नहीं नहीं सीता भी पानी भ्ररेगी आप के सामने।
बात तो महारानी को अच्छी लगी पर अभी भी एक परेशानी की शिकन माथे पर थी, बोली लेकिन मैने तो सुना है कि बाल रंगने से बाल गिरने लगते है, ऐसे तो मै बहुत जल्द गंजी हो जाऊंगी। रावण ने सोचा मामला हाथ से निकला जा रहा है, फ़टाक से बीच में कूद पड़े, अरे प्रिय तुम तो मुझे हर हाल में अच्छी लगती हो( बस मोबाइल के बिल के बारे में न पूछना) गजीं भी हो गयीं तो क्या हम फ़िर भी नुक्कड़ के फ़ूलचंद से तुम्हारे लिए सर पर सजाने को गुलाब लाएगे, बालों मे खोस न सके तो क्या सेल्वटेप है न चिपकाने को, जहां चाह वहां राह्। इनफ़ेक्ट, जुलियस सीजर के ताज सा गुलाबों का मुकुट कैसा रहेगा।
बीच में दूसरा सेल्स मेन टपक पड़ा, महारानी जी महाराज बिल्कुल सही कहते हैं, जिसकी बीबी गंजी उसका भी बड़ा नाम है, मेरी कंपनी की क्रीम लगा दो लाइट का क्या काम है। इनफ़ेक्ट महाराज मैं तो निवेदन करुंगा की आप ऐसा कानून ही बना दें कि लंका में समस्त प्रजा आज से अपने सर मुंड्वा दे, जो भी दानव दानवनियां लंबे बालों वाले पाये गये वो देश द्रोही माने जाएगे और उन्हें देश निकाला दे दिया जाएगा, आखिर लबें बाल तो वानरों की निशानी है, देखा नहीं था वो बदंर, कित्ता तुफ़ान मचा कर गया था पुरी लंका बर्बाद कर गया था। हनुमान के उत्पात की याद आते ही महाराज का खून खौलने लगा। उस सेल्समेन ने सोचा लौहा गरम है एक हथौड़ा और मार ही दें सेफ़्टी के लिए, महारानी की तरफ़ मुड़ कर बोला और फ़िर महारानी साहिबा महाराज को ही देखिए बाल आगे से यूं जा रहे है जैसे लो टाइड में समुद्र का पानी पीछे खिसक लेता है अब ये आधे अधुरे बाल महाराज की पर्सनलिटी के साथ शोभा नहीं न देते, या तो है या नही है, ये क्या अयौध्या के मंत्रियों की तरह कभी कहते है हम सहमत भी है और नही भी। पर्सनलिटी तो हमारे महाराज की है, एक बार जो स्टेंड ले लिया बस ले लिया अब जीतेगे या मरेगें और महारानी जी आप इस टुच्चे रंगरेज की बातों में न आइएगा, ये तो कल सीता को भी कह रहा था कि बाल हरे रंग लो फ़ैशन का फ़ैशन और आस पास के पेड़ों के साथ मैच करेगा सो अलग्। असली फ़ैशन तो गंजेपन में है, आप को अपनी क्रिएटिविटी दिखाने का पूरा मौका मिलता है, जब ट्व्टी ट्व्टी चले तो लंका का झंडा अपने सर पर पेंट कराइए चियर लीडरनियां भी आपको सरगना बना लेंगी, और जब मैच न हो तो हमारी क्रीम से सर की मालिश कराइए, ये बाल नौच नौच कर जो सर में दर्द रहता है एकदम दूर हो जाएगा और आपके चांद की चमक देख महाराज बोल उठेंगेये चांद सा रौशन ट्कला, फ़ूलों का रंग सुनहरा, ये झील से गहरी आखें, कोई राज है इनमें गहरा…इतने में रावण का मोबाइल बज उठा…हैल्लो, हैल्लो, रावण, लोन रिक्वरी वाले थे, रावण बोला सॉरी रोंग नम्बर्॥दिस इस टकलु हिअर्…ढूंढो बेटा अब रावण को, और आजा बेटा राम अपनी सब चालाकियों के साथ, यूं नहीं पिजंरे में उतरने वाले हम, सुसाइड कर तू।