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February 29, 2008

पहिया चले चले है यारा, तुझको चलना होगा (भाग-2)

पहिया चले चले है यारा, तुझको चलना होगा (भाग-2)

इस हादसे के करीब एक साल बाद घर में सुतार लगे हुए थे, शनिवार का दिन, सुतार पतिदेव के साथ जा कर कुछ सामान ले कर आया , उसके एक घंटे बाद सुतार को कुछ और सामान चाहिए था सो पतिदेव लाने के लिए गये, नीचे जा कर देखा तो कार नदारत थी। बड़े हैरान, अरे अभी तो मैं यहां गैरेज में पार्क कर के गया था कार कहां चली गयी। पूछ्ताछ करने पर समझ आया कि कार आधे घंटे पहले ही चोरी हो गयी थी दिन दहाड़े दौपहर के तीन बजे और वो भी हमारी अपनी सोसायटी से। वॉचमेन और पड़ौसियों की नजरों के सामने चोर कार उड़ा कर ले गये और किसी को जरा भी शक नहीं हुआ कि कार चोरी हो रही है । फ़िर थाने पंहुचे, रपट लिखाई। पुलिस वालों ने झूठी दिलासा भी न दी, कहा ये लो एफ़ आइ आर की कॉपी, जाके इंश्योरेंस से हरजाना ले लो। लेकिन हमें तो पैसे नहीं अपनी कार वापस चाहिए थी। मैं और मेरे पति स्कूटर पर निकल पड़े अपनी कार को ढूंढने, ऐसा लग रहा था मानो घर का कोई सद्स्य चला गया हो। चोर बाजार, कालीना और जहां जहां कार के पुर्जे बिकते थे सब जगह जा कर चक्कर मार आए, कोई कहता दूसरे राज्य में चली गयी होगी और वहां बेच दी गयी होगी तो कोई कहता कि उसके टुकड़े टुकड़े कर के बेच दिए गये होगें, सुन सुन कर दिल छलनी हुआ जाता। तीन दिन तक हम इन सब कबाड़खानों के चक्कर लगाते रहे। हर दुकान के बाहर टंगा कार का द्रवाजा अपनी कार का लगता था। हमें यूं घूरते देख दुकानदार भी प्रश्नीली आखों से हम दोनों को घूरते, शुक्र की बात घूरने से आगे नहीं बड़ी। पर कितने दिन यूं ही सड़कें नापते, हार कर पतिदेव ने फ़िर से दफ़्तर जाना शुरु कर दिया और हमने कॉलेज्।
पतिदेव के पास तो इतना टाइम नहीं था लेकिन हमारी रोज की दिनचर्या बन गयी कि अपनी एक पड़ोसन को लेकर रोज दोपहर को पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाते, "कुछ पता चला?" अपनी जिंदगी में पहली बार पुलिस वालों के साथ पाला पड़ रहा था। पुलिस वाले कहते " अरे मैडम, यहां तो आदमी गुम जाए तो नहीं मिलता, ये तो फ़िर गाड़ी है। ये हमारे सीनियर इंस्पेकटर साहब को देखो, इनकी सरकारी जीप घर के नीचे से चोरी हो गयी आज तक नहीं मिली तो आप की गाड़ी क्या मिलेगी"। हम सुन लेते, दिल पर चोट खा कर भी इक मुस्कान के साथ लगे रहिए की इल्तिजा कर के वापस आ जाते।
पुलिस वाले से अपनी बात करने के लिए हमें रोज कुछ इंतजार करना पड़ता था, सो पहली बार थाने में क्या चलता है देख रहे थे। देख कर हंसी भी आती थी और गुस्सा भी। हम अक्सर ये सोचा करते थे कि पुलिसवाले इतने संगदिल कैसे हो जाते हैं, किसी के दुख से इनका दिल पसीजता क्युं नहीं। अब हमारा एक्सीडेंट वाले मामले में ही देखिए, कैसे बेपरवाह से बैठे रहे। यहां रोज आधा घंटा बैठने के बाद ही हमारा नंबर आता था बात करने के लिए। कोई आता शिकायत लेकर की मैं दोपहर को सो रही हूँ और मेरा पड़ोसी ऊपर अपने घर में ठक ठक किए जा रहा है, ये मेरे मानव अधिकारों का हनन है इस लिए मेरी शिकायत दर्ज करो और उसे दोपहर में थाने में बंद रखो, कोई आता कि मेरी चुन्नी हवा से उड़ कर उसके घर चली गयी और वो वापस नहीं करती, मानती ही नहीं कि चुन्नी उसके घर गयी है, इस लिए चोरी की शिकायत लिखो, कोई युवा प्रेमी घर से भाग गये तो लड़की के माता पिता शिकायत करते कि इनका लड़का हमारी लड़की को भगा ले गया, जब की मामला बिल्कुल साफ़ प्यार का था। कुछ सीरियस मामले भी आते, जैसे कोई औरत शिकायत करती कि उसकी जान को उसके पति से खतरा है। फ़िर हम जैसे लोग भी पहुँच जाते, जिन्हें पुलिस एक बार कह चुकी थी कि कुछ नहीं होने का पर फ़िर भी रोज पहुंच जाते “कुछ खबर मिली”। वो तो हम पढ़े लिखे संभ्रात परिवार से थे, इस लिए पुलिस वाले जरा नम्रता से जवाब देते थे नहीं तो कब का पुलिस थाने आना ही बैन कर देते। एक महीना हम पुलिस स्टेशन और मदिरों के चक्कर काटते रहे और फ़िर उम्मीद छोड़ चुपचाप अपने काम में लग लिए।

तीन महीने बीत गये। पतिदेव टूर पर गये हुए थे, रात के कोई नौ बजे थे कि हमारे दरवाजे की घंटी बजी, दरवाजा खोला तो दो छ: फ़ुट से भी लंबे भारी भरकम डील डौल वाले व्यक्ति खड़े थे। बोले
आप की गाड़ी चोरी हुई है?
हमने कहा, "हां"
बोले हम सी आई डी के आदमी हैं, एफ़ आई आर करवाया था
हमने कहा , " हां"
एफ़ आई आर की कॉपी दिखाई तो कुछ आश्वस्त हो कर बोले कि आप की गाड़ी मिल गयी है, जिन लोगों ने चुराई थी वो नीचे बैठे हैं।
हमारा मन बल्लियों उछलने लगा, हमने चोरों को देखने की इच्छा जताई, इस के पहले कभी चोर भी तो नहीं देखा था, पहले तो ना नुकुर करते रहे, पर हमारे जिद्द पकड़ने पर हमें ले चले, हमारी सोसायटी से थोड़ी ही दूरी पर जीप खड़ी थी जिसमें दो आदमी बैठे थे, देखने में एक्दम मध्यम वर्गीय, हमारे आश्चर्य को देखते हुए सी आई डी वाले हंसे और बताया कि दरअसल वो दोनों चोर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और अच्छे परिवारों से है, उनमें से एक की बीबी बैंक में मैनेजर थी तो दूसरे की बीबी स्कूल टीचर, ये दोनों बेकार्। इन दोनों ने नौकरी ढूंढने से ज्यादा फ़ायदेमंद कारें और स्कूटर चुराना समझा। दोनों उल्लासनगर से थे जो सिंधी इलाका माना जाता है, ये दोनों भी सिंधी थे।

सी आई डी वाले अक्सर सादे कपड़ों में बीअर बार वैगरह जैसी संदेहस्पद जगह पर नजर रखते हैं। उल्लासनगर की एक ऐसी ही बिअर बार में इन दोनों को बार बालाओं पर खूब पैसा लुटाते देखा गया, पुलिस ने जब खोजबीन की तो पता चला कि ये दोनों तो बेकार हैं और काम की तलाश में हैं। तो बस फ़िर क्या था सी आई डी वालों ने इन दोनों को धर दबोचा, पूछताछ शुरु की तो पता चला अब तक बम्बई के विभिन्न इलाकों से करीब साठ सत्तर गाड़ियाँ चुरा चुके हैं और बेच चुके हैं। हमारी कार चुराने से पहले ये एक हफ़्ते तक आकर हमारी कॉलोनी में यूं ही बैठते रहे और जायजा लेते रहे कि कौन सी कार उठानी ज्यादा फ़ायदेमंद रहेगी। अब क्युं कि हमारी सोसायटी में भी बहुतायत से सिंधी रहते थे और ये लोग संभ्रात दिखते थे किसी को इन पर शक नहीं हुआ। हमारी गाड़ी सबसे ज्यादा नयी होने के कारण उसी पर हाथ साफ़ किया गया, आनन फ़ानन में चेसी नंबर बदला गया और सीधा ले जाकर उल्लास नगर में एक सरदार को बेच दिया गया। जब पुलिस उस सरदार के घर पहुंची तो उसके लड़के की बारात निकलने वाली थी और उसने अनजाने में ही ली हुई इस चोरी की गाड़ी को सजाने के लिए खूब पैसा खर्च किया हुआ था। पंद्रह दिन के और कोर्ट कचहरी के चक्कर और दस हजार की चपत के बाद हमारी मैडम(कार) और सजधज के वो सरदार के घर से लौट आईं।

लोग कहने लगे आप बहुत भाग्यशाली हैं जो आप को कार वापस मिल गयी। उन्हीं दिनों दो और जन की कारें बम्बई के अलग अलग इलाकों से गायब हुई थीं पर वो किस्मत के इतने धनी नहीं रहे। 1990 से लेकर 2000 तक ये गाड़ी हमारे साथ रही( कल हम गलत लिख गये थे, गाड़ी 90 के दशक के अंत में नहीं शुरुवात में आयी थी)। शुरुवाती धुंआदार रिश्ते के बाद हमने 1999 तक स्टीरिंग व्हील को हाथ भी नहीं लगाया। कॉलेज हमारे घर से 15 मिनट की दूरी पर ही था ,सुबह पतिदेव छोड़ आते थे (जैसे अनूप जी अपनी पत्नी को छोड़ने जाते हैं,)और दोपहर में हम ऑटो से घर आ जाते। 99 में मकान बदलने से काफ़ी परेशानी हो गयी। अब हमारा घर कॉलेज से 15 किलोमीटर दूर हो गया। घर से भी जल्दी निकलना पड़ता था, बसों में जाने की आदत छूट चुकी थी। पतिदेव ने सलाह दी कि हम फ़िर से कार चलाना शुरु करें, डरने से काम नहीं चलेगा। लालच ये दिया गया कि वेन पर हाथ साफ़ कर लो और फ़िर नयी कार ले लेना, पतिदेव तब तक दूसरी ले चुके थे। तो हम एक बार फ़िर ड्राइविंग स्कूल गये। ड्राइविंग मास्टर को अपनी पुरानी आप बीती सुनाई और हिदायत दी कि वो क्लच ब्रेक का इस्तेमाल न करे।मास्टर अच्छा था, बड़िया सिखाया और फ़िर हमने वेन से दोस्ती की। वेन को नाम दिया "हर्बी", वो हर्बी की ही तरह अपनी मर्जी से चलती थी,जब मन किया रुक जाती थी और थोड़ा मनाओ, बातें करों तो चल पड़ती थी, रोज सुबह पूछ्ना पड़ता था , मैडम आज क्या मूड है चलेगीं क्या? बस कॉलेज तक जाना है। ऐसे ही मेरी सहेली ने अपनी कार को नाम दिया था
" मानकुट्टी" ये तमिल भाषा का शब्द है जिसका मतलब है हिरन का छोटा बच्चा। उसकी कार मारुती 800 थी। मेरी कार से थोड़ी कम नटखट्। कॉलेज से निकलते समय अगर हमारी कार चलने से आनाकानी करती तो हम धमकाते "देख चल पड़, नहीं तो तुझे यहीं छोड़ मानकुट्टी के साथ चली जाऊंगी", और आप यकीन नहीं मानेगें कि कार चल पड़ती अलबत्ता थोड़ी ज्यादा अवाज करते हुए जैसे प्रोटेस्ट कर रही हो।

सन 2000 के मध्य में हमने ऑल्टो ले ली और वेन बेच दी, जिस दिन वेन हमारे घर से गयी हमारे घर किसी ने खाना नहीं खाया। हम सोच रहे थे कि आखिरकार मशीन ही तो है इससे इतना मोह क्युं? पूरब और पश्चिम का गीत दिमाग में कौंध जाता था, "इतना आदर इंसान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं"।
वेन के साथ हमारे रिश्ते ने हमें अपने ही धर्म के मतलब समझा दिए । ये हिन्दू धर्म ही है जो निर्जीव चीजों में भी आत्मा देखता है शायद इसी लिए दशहरे के दिन कार जैसी निर्जीव चीजों की भी पूजा होती है।हम सोचते क्या वो सचमुच उतनी निर्जीव है, भावनाओं से मुक्त जितनी दिखती है। कभी अपनी कार से बतिया कर देखिए, उसकी भाषा समझ सके तो आप देखेगें कि वो बराबर जवाब देती है।

8 comments:

डॉ. अजीत कुमार said...

आंटी जी, आपने अपनी कार के यादों की क्या खूब तस्वीर पेश की है. कभी पढ़ कर हँसते रहे और कभी कुछ सोचने लगे. दो भागों में बँटी ये कार कथा सचमुच निराली है. चाहे वो आपके एक्सीडेंट का किस्सा हो या पुलिस थाने की आपकी दौड़, सबकुछ आपने कितनी बखूबी गूंथा है. कितना बड़ा संयोग है कि वो खम्भा आप दोनों के बीच से निकल गया और ये भी कि आपकी कार फ़िर मिल गयी.
धन्यवाद.

Sanjeet Tripathi said...

ह्म्म, बढ़िया संस्मरण!!

बॉस डॉ अजीत साहब आप तो गए काम से, अनीताजी को ऑंटी कह रहे हो, निपट गए आप तो अब ;)

सागर नाहर said...

दोनों भाग एक साथ पढ़ने का मजा ही कुछ और है। बहुत हंसाया और लेख के अंत में मायूस कर दिया। मैने जिस दिन अपनी पहली पहली खरीदी हुई गाड़ी Sunny बेची थी उस दिन हम भी कोई घर में खाना नहीं खा पाये और आप मानेंगे नहीं शाम को मैं सचमुच रो पड़ा मानो घर का एक सदस्य चला गया हो।
बहुत बढ़िया रही ये लेखमाला।

Manish said...

बहुत बढ़िया रहा ये विवरण..

पुनीत ओमर said...

पढ़ कर वाकई में लगा कि जैसे परिवार के किसी सदस्य के बारे में ही बात हो रही हो। मैं तो इसी मोह के चलते कभी आज तक अपनी हीरो पुक नहीं बेच पाया जबकि आज बाइक और कार तक भी आ पंहुचा हूँ।
पर कभी कभी लगता है कि अगर पुराने लोग(या सामान) हमारी जिन्दगी से जायेंगे नहीं तो नये आयेंगे कैसे… अगर हम उन्हीं पुराने लोगों की याद में बैठे रहेंगे जो चले गये हैं, तो नये आने वालों का दिल खोल कर स्वागत कैसे करेंगे?

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया । कभी हम भी भी दोपहियों तिपहियों व चौपहियों की कहानी सुनाएँगे ।
घुघूती बासूती

PD said...

बहुत बढिया था जी..
सही में मजा आ गया.. :)

Rajesh said...

Vaise cars to kitni hi chori ho jati hue hum sunte hai, per hamen koi fark nahi padta, jab tak wah apni khud ki na ho...
Nice article in memories of your car.