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सुस्वागतम

आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।

February 10, 2008

तुमने मूंगफ़ली खायी?

पांच की सुबह साढ़े सात बजे जैसे ही हवाई जहाज से बाहर निकले ऐसा लगा जैसे कई सुइयां एक साथ आ कर गालों में गढ़ गयी हों। ये था ठंडी हवा का झोंका जो 4 डिग्री तापमान का गुलदस्ता सजाए हमारे स्वागत को आगे बढ़ आया था बिल्कुल अरबी स्टाइल में। किसी के स्वागत को ठुकराना असभ्यता होती है इस लिए हमने भी मुस्कुरा कर इस झोंके का स्वागत किया। आखिरकार 25 साल बाद हमारा मिलन हो रहा था।

अब देखिए कहने को दिल्ली हमारे घर से कोई ज्यादा दूर नहीं बस दो घंटे का हवाई सफ़र और एक रात का ट्रेन का सफ़र, फ़िर भी हमें 25 साल लग गये इस सफ़र को तय करने। ऐसा नहीं था कि हमने इसे याद नहीं किया। हर जाड़ों में हम इस ठिठुरन को तरसे थे, बम्बई के चिपचिपाते एक सरीखे मौसम में उत्तर की गजब की ठंड और गजब की गर्मी को भी तरसे हैं। जाड़ों में ओवरकोट की जेबों में चिलगोजे, अखरोट और मूंगलियां भर ले जाना, पैदल स्कूल जाना और रास्ते भर ये सब चरते जाना। रातों को सर तक खिचें लिहाफ़ों में दुबकना, गोभी के, मूली के परांठे सुबह शाम याद आये हैं।

एअरपोर्ट पर जो हमको लेने आने वाले थे वो कुछ लेट हो गये, हम तो खुश हो गये। घूम घूम कर हम जाड़े की छुअन से पुलकित हो रहे थे, ठंडक अंग अंग में प्राण भर रही थी और हम उस एक एक क्षण में कई बीते साल जी रहे थे, हमारे पति और भतीजी जो हमारे साथ बम्बई से आये थे हैरान हमारा चेहरा ताक रहे थे।

हम देहली तीन दिन रहे पर इन तीन दिनों में पिछ्ले कई सालों की कसर निकालने की कौशिश की। लिहाफ़ों में दुबके, स्वेटर मौजे पहन कर सोये, आलू के, गोभी के पराठें खाए खूब करारे घी में सिके हुए( हम इन तीन दिनों के लिए सब एतियात भूल गये), मूली इतनी मीठी मानों स्वर्ग से आयी हों। बस एक चीज का ही मलाल रहा। पूरी दिल्ली घूम लिए उत्तर से दक्खिन, पुरब से पश्चिम, पर हमें कहीं मूगंफ़ली का ठेला न दिखायी दिया। पता नहीं इस बार मूगंफ़ली की फ़सल अच्छी न हुई या सब की सब गंगा जी के किनारे चली गयी( याद है न ज्ञान जी ने अपनी पोस्ट में कहा था कि जब पुराने वाले दफ़तर में थे तो रोज मूंगफ़ली की पुड़िया खाते टहलते थे।) हम तो इन जाड़ों में दो दानों को भी तरस गये। एक मलाल और रह गया- मेट्रो में सफ़र का आंनद न लूट सके। खैर अगली बार सही।

फ़िर भी हमारा दिल्ली जाना बहुत ही बड़िया अनुभव रहा,बड़िया बड़िया जाड़ों के साथ साथ, जाड़ों की मधुर धूप सी आलोक पुराणिक जी से जो भेंट हो गयी। ब्लोग की दुनिया में हमने पदार्पण उनके ब्लोग पढ़ कर ही किया था, इस लिए वो हमारे लिए खास हुए न।अच्छे मेजबान की भूमिका निभाते निभाते आलोक जी के पांव दर्द करने लगे होगें इतने चक्कर लगाने पढ़े उन्हें चाय का इन्तजाम करने में । लेकिन बातें करते करते दो ढाई घंटे कैसे गुजर गये पता ही न चला, आलोक जी का तो पता नहीं कि बोर हुए कि नहीं पर हमारी बातें तो अभी और बाकी थीं। आलोक जी को मिल कर लौट रहे थे कि जयपुर से नीलिमा जी ने फ़ोन कर हमें अचंभे में डाल दिया। लती को अपनी खुराक न मिले तो जो हालत उसकी होती है वही हालत हमारी थी दिल्ली में। सब सुखद अनुभवों के बावजूद हम आप सब को मिस कर रहे थे, ऐसे में नीलीमा जी का फ़ोन मानों दर्द निवारक गोली का काम कर रहा था। नीलीमा जी धन्यवाद्।

15 comments:

Sanjeet Tripathi said...

वाह वाह क्या बात है तो आप घूम आए दिल्ली, मिल आए आलोक जी से।
बढ़िया, बधाई, पर हमारे लिए क्या लाए ;)

तो दिल्ली में तीन दिन रहने से कितनी पोस्ट का मसाला मिला?

दिनेशराय द्विवेदी said...

तो आप दिल्ली घूम आए। सर्दी तो इन दिनों मुम्बई में भी गजब ढा रही है। कल पढ़ा था 9 डिग्री तक का ताप रह चुका है। आज भी हवा गजब ढा रही है। वैसे यह राहत की बात है कि दिल्ली से लौटने पर आप को गर्मी और चिपचिपाहट का सामना नहीं करना पड़ा.

Dr.Parveen Chopra said...

इतने सालों बाद दिल्ली आये....बहुत हैरानगी हुई। संजीत जी की मसाले वाले बात का जवाब किसी पोस्ट के माध्यम से ही दीजिए। आज कल महिला बलोगर्स की मीडिया में काफी चर्चा है....अभी अभी एक पोस्ट पढी है जिस में गल्ती से आप को जयपुर के किसी कालेज में लैक्चरार बताया गया था।

Lavanyam - Antarman said...

यही होता है जिस अवस्था, जगह या चीज़ हमारे पास हो टीबी दूसरे की ललक भी रहती है -

देहली का सफर बढिया रहा और नीलिमा जी और राजीव जी ने "चोखेर बाली" के बारे में लिखा ये तो बहुत अच्छा किया -

सागर नाहर said...

आप तो ठंडी के मामले में लकी रहीं, कम से कम तीन दिन ठंडी का आनंड तो उठाया, हम तो यहाँ हैदराबाद में उसके लिये भी तरस गये।
... और हाँ मूंगफली ( गुजराती सींगदाने) के लिये भी।

Pramod Singh said...

ठीक है-ठीक है, हुई दिल्‍ली की ठंडी. अब मुंबई की ठंड की डंडे से खबर लेंगी कि नहीं? मूंगफ़ली मलाड से विमल उठा लेगा..

Rajesh said...

Namaskaar Anitaji,

In jaadon ki sisakti thand mein aap delhi mein aayi aur aakar chali gayi, hamen mehmaan navaji ka mauka nahi diya, hum kafi naaraaz hai aap se. Aap ke blog friend na sahi, aap ke kisi tarah se to dosti se jude hue hai. Khair, aapke profile page se pata to tha ki aap delhi mein hai - 6th to 8th per bagair aapke telephone number ke kaise contact kar paate aapka! Aree wah mungfali jo aap dekhne ko taras gayi, hum aap ke liye laa dete. Hamari job bhale delhi mein haiper rahte hai hum noida ma jahan per kafi mung fali milti hai, aaj bhi.
Khair apna watan to aakhir apna hi hota hai. 25 saalon ke baad aap delhi aayi, samaj sakta hoon kafi vyast rahi hongi. Fir bhi agar bata diya hota, hum aap se milne jaroor aa hi jate, chaje jahan aap rahti. Vaise mere orkut profile per maine apna mobile number laga kar hi rakha hai. Koi baat nahi, jo beet gaya so beet gaya. lekin agali baar aap agar delhi aati hai to jaroor hamen aap ke darshanon ka mauka dena. Aapki khatirdari mein hum kahin kisi se kum nahi utrenge, yah pakka vaada hai aap se.
Dhanyavaad......

डॉ. अजीत कुमार said...

आंटी जी,
नमस्कार!
दिल्ली आपको रास आई, अच्छा लगा. लेकिन पूरे पच्चीस बरस....
वैसे पूरे उत्तर भारत का माहौल एक जैसा ही है. सर्दियों में कड़ाके की सर्दियां.
आपने अपने पुराने जीवन का पूरा लुत्फ़ उठाया, दिल्ली घूम भी लीं, गोभी- मूली के पराठे भी खा लिए.... आनंद आ गया.
वैसे मामाजी ने एक थैला भरकर मूंगफलियाँ भेजी हैं, यदि कभी गया तो लेता जाऊँगा.
धन्यवाद.

Manish said...

कुछ दिन पहले पढ़ा था कि दिल्ली सरकार खोमचे वालों और ठेले वालों को सड़क से हटाने की तैयारी में है। क्या आपको किसी मूँगफली वाले का ना दिखना इसी वज़ह से था ? खैर चलिए आपने ठंड का आनंद लिया अच्छा लगा पढ़ कर।

अनूप शुक्ल said...

हमें पता ही नहीं था कि आप दिल्ली में मूंगफ़ली के लिये तरस गयीं। पता होता तो कानपुर से भेज देते। लेख आपने बहुत अच्छा लिखा है। :)

सूरज said...

अनिता जी नमस्ते,
आपने बहुत अच्छा किया जो आपने अपने देश की राजधानी दिल्ली गयी और देखा,
पर आपने एक गलती की आपने समय थोडा सा गलत चुना शायद आपने सुना होगा एक
हिंदी फिल्म का गान भी है जो दिल्ली की सर्दी पर बना है खैर दिल्ली की सर्दी और मुम्बई की बारिश बहुत परेशान करती है वैसे मुझे तो इस बात का बड़ा अफ़सोस है की मेरे देश की राजधानी में आपको मूंगफली नहीं मिली आप के इस लेख अब एक फायदा होगा मैं कुछ मूंगफली के व्यापारियों से बोलूँगा की आप लोग दिल्ली में भी अपना बिसिनेस शुरू कीजिए ! क्योंकि जब आप अगली बार दिल्ली आये तो मूंगफली जरूर मिले !

आपका शुभचिन्तक
सूरज शर्मा

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

दिल्ली यात्रा के चित्रो का इंतजार है।

Keerti Vaidya said...

sunder ...didi really apko padney ka apna anand hai

Keerti Vaidya said...

did..nexttime aye to humey yaad rakhey hum apko delhi ke metro aur moogfali kheelayengey....aur haan gool gappey bhi .....

मीनाक्षी said...

14 फरवरी को मौका मिला तो वैलेंटाइन की पोस्ट पढ़ी , आज आपकी इस पोस्ट को पढ़कर हमें भी अपने जन्मस्थान दिल्ली की याद आ गई..उस वक्त हम साउदी अरब में थे.
आपकी पोस्ट पढ़कर आनन्द आ जाता है बस मीठी आवाज़ नहीं सुन पाते. :)