Subscribe

RSS Feed (xml)

Powered By

Skin Design:
Free Blogger Skins

Powered by Blogger

सुस्वागतम

आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।

May 04, 2008

पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी...

मित्रों आप सब अब सत्यदेव त्रिपाठी जी को जानते हैं जिनके बारे में हम अक्सर जिक्र करते हैं । हैं तो विद्वान लेकिन अभी तक ब्लोग की दुनिया से रुबरु नहीं हुए। हमारी सोहबत में इस ब्लोग नशे का थोड़ा सा रस्वादन किया है बस्। वो हर हफ़्ते "आज समाज" नामक समाचार पत्र के लिए फ़िल्म रिव्यु लिखते हैं। कभी कभी हमें भी पढ़ने का मौका मिल जाता है। उनके अनुरोध पर उनका लिखा एक फ़िल्म रिव्यु यहां पेश कर रही हूँ, आशा करती हूँ आप को भी ये उतने ही पसंद आयेगें जितने हमें आये।

बिन पानी सब सून...
पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी...
बिन पानी सब सून’ पर लिखने के लिए बात करते हुए आदरणीय विश्वनाथजी ने कहा - ‘पानी’ को आप किस रूप में देखते हैं, लिखिए। और मेरे अध्यापक ने शायद फ़ौरन ‘हाँ’ कर दी - तीस साल के अध्यापन के दौरान छिटफुट दोहों के अलावा कभी रहीम को ठीक से पढाने का मौका जो नहीं मिला... तो सोचा होगा कि इसी बहाने कुछ कह पायेंग़ॆ...
और सोचते हुए सबसे पहले रहीमदास की वह लोकवृत्ति ख्याल में आयी, जिसने उनसे न ही लोकजीवन व लोकसंस्कृति के ‘टिपिकल’ (खास व अछूते) प्रसंगों को दोहों का माध्यम बनवाया (काश, कुछेक उदाहरण दे पाता !) , वरन लोक के शब्दों का भी सहज-सटीक प्रयोग कराया। ‘पानी’ ऐसा ही लोक का- लोगों का, बहुजन का शब्द है । विशिष्ट जन का तो ‘जल’ है, जहां जलपान होता है। आमआदमी तो ‘पानीकानौ’ व ‘मीठा-पानी’ करता था। देवताओं को आज भी ‘जल’ देते हैं, पित्रों को पानी देते हैं, मित्रों को पानी पिलाते हैं और शत्रुओं को पानी पिला-पिलाकर मारते भी हैं...। हम पानी पीते-पिलाते हैं, तो समाज में होते हैं, वरना तो कहते हैं - उसके यहां कोई पानी तक नहीं पीता...। सो, लोक-जीवन का मानदण्ड है - पानी। लोक के लिए प्रयुक्त पानी के शब्द-युग्मों में दाना-पानी, रोटी-पानी...और ‘हुक्का-पानी’...। फिर तो उसका हुक्का-पानी बन्द होने लगा, जिसने कोई समाज विरोधी काम किया हो। इस तरह वह इज्जत-पानी हो गया- भाई, इज्जत-पानी बनाये रखना...।
और तब यह इज्जत राष्ट्र तक पहुंच गयी, जब हमारे भोजपुरी कवि के मरणासन्न बूढे पात्र ने अपने बेटे से कहा - ‘पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी’। देखिए, ‘इज्जत’ शब्द निकल गया। अकेले पानी ही वह काम करने लगा। मेरी समझ से पानी के इज्जतविषयक अर्थ का यह चरम है, जो हमारे लिए सबसे मह्त्त्वपूर्ण है। इज्जत के वजन पर ही पद-पानी, पत-पानी भी चलते हैं। पद-पानी तो समझा जा सकता है, पर ‘पत-पानी’ में ‘पद’ से ‘पत’ का भेद मात्र भाषा-शास्त्र का नहीं है। इसके पीछे छिपा समाज-शास्त्र काफी बारीक है, पर यहां बताने का अवकाश (स्कोप) नहीं...।
इज्जतदार के लिए तो पानीदार कुछ कम भी कहते हैं (गोकि उसमें थोडा अलग व ज्यादा अर्थ भी भर उठा हैं - ‘आदमी ‘पानीदार’ है’ में कुछ-कुछ ‘कौल का पक्का’, ‘बात पर मर-मिटने वाला’ का भाव भी आ जाता है। ‘वो तो एक पानी पर रहता ही नहीं’, में यह अर्थ साफ़ देखा जा सकता है) , पर ‘बेइज्जत’ के लिए ‘बेपानी’ तो धडल्ले से चलता है। काफी व्यंग्यात्मक भी हो गया है। हम अपने मित्र ‘नीरन’ को ‘नीर-न’ के विच्छेद के साथ विनोद में बेपानी कह्ते हैं । पानी का चढना तो पानी ही रह गया, पर ‘पानी उतरने में’ तो इज्जत ही उतरती है। और पानी उतरने से ज्यादा पानी उतारा जाता है। इसीलिए ‘भरे बाज़ार उनका पानी उतर गया’ से ज्यादा सटीक व प्रचलित है- ‘उसने भरे बाज़ार उनका पानी उतार दिया’। और जिसका ‘पानी उतर गया’, वो समाज में ‘पानी-पानी’(शर्मसार) हो जाता है। वो फ़िर कैसे सर उठाकर चलेगा ?
तो हो गया न उसके लिए ‘बिन पानी सब सून’। इसीलिए ‘पानी रखने’ याने बचाये व बनाये रखने की बात रहीमदासजी ने कही है - ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून’। और उदाहरण देते हुए बताया- ‘पानी गये न ऊबरहिं, मोती मानस चून’। यह ‘मानस’- मानुष- मनुष्य ही है, जिसका पानी (इज्जत) चले जाने के बाद फिर वह उबर नहीं पाता । उसका जीवन सूना (शून्य) हो जाता है। कुछ विद्वान ‘मानस’ को ‘मानसरोवर’ से भी जोडते हैं। पर मानसरोवर में तो पानी का अर्थ पानी ही रह जायेगा (यूँ मानसरोवर में पानी नहीं होता, सलिल होता है - ‘मानस सलिल सुधा प्रतिपाली’) , जो पानी के बिना सूख कर सूना हो जाने वाले उस चूने में भी है। पर मोती का पानी !! सुनार तो नकली गहने पर भी पानी चढाकर असली बना देते हैं। पर सोहनलाल द्विवेदी ने अपनी कविता ‘नन्हीं बूँद’ में बताया कि वह पानी (शायद स्वाती नक्षत्र के पानी) की बूंद ही होती है, जो समुद्र में पडे सीपी में जाकर मोती बन जाती है। बूँद सीपी में टपकी तो मोती, और आँख में अटकी, तो मोती - ‘अटका तो मोती है ; टपका, तो पानी है’।
ये विशिष्ट हैं, वरना तो पानी के बिना कुछ भी बना नहीं रह जाता। सब कुछ सूख जाता है - ‘धान-पान अरु केरा, तीनो पानी के चेरा’ की तरह। इसलिए मनुष्य की बात न होगी, तब तो दोहा बहुत सामान्य हो जायेगा। यह विशिष्ट है मानुष के लिए और उसके पानी (इज्जत) के लिए । कविता मनुष्य की होती है। मनुष्य के लिए होती है। प्रकृति तो उसमें उदाहरण बनकर आती है- चूने-मोती के पानी की तरह।
लेकिन रहीम पुराने जमाने के थे। आज सबकुछ बदल गया है। मनुष्य के पानी (इज्जत) की आज कोई कद्र नहीं रही। कद्र तो मनुष्य मात्र की ही नहीं रही...।
तो किसकी रही॥? बशीर बद्र के शब्दों में सुनिए -
‘घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे; बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला’।
तो ओहदे के (वैभव) की कद्र रह गयी है। इसके सामने आदमी ही कुछ नहीं रहा, तो उसके पानी का क्या ? तमाम बेपानी लोग ही बडे-बडे ओहदों पर आसीन हैं। या यूं कहें कि बडे होने के लिए बेपानी होने के रास्ते से ही गुज़रना होता है। प्रमाण देने की कोई ज़रूरत नहीं - जिस नेता, जिस पूंजीपति, जिस अफ़सर, जिस धर्मगुरु...आदि-आदि पर उंगली रख दो, सब बेपानी ही मिलेंगे - ‘जिसकी पूँछ उठायी, उसको मादा पाया’ । हाँ, अपवादस्वरूप कोई पानीदार मिल जाये, तो मैं मूसलों ढोल बजाऊं ! वरना आज की आम हक़ीकत तो यही है कि जयप्रकाशजी के बाद दुष्यंतकुमार के शब्दों में अब ‘इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान ’ भी नहीं रहा...।
और जग जाहिर है कि इस मनुष्य के पानी की कद्र दृश्य मीडिया और पाठ्य मीडिया के दैनिकों में नहीं रही॥। सप्ताहिकों-मासिकों में है, पर कितनी व कैसी तथा क्यों, की बात न ही करें, तो अच्छा...। और मैं क्या, आप सभी जानते हैं कि ‘नवनीत’ का यह आयोजन भी रहीम के उस पानी के लिए नहीं है, जीवन में काम आने वाले पानी के संकट की करंट समस्या से बावस्ता है। अब आप पूछेंगे कि फिर अब तक मैं क्यों भटका रहा था आपको ? तो जिस तरह साहित्य की पंक्ति को माध्यम बनाया गया इस भौतिक समस्या को रखने के लिए, उसी तरह इस उक्ति के माध्यम से साहित्यिक बात कह देने का यह भी माध्यम है...। हिसाब बराबर हो गया । अब आगे चलें ...
इन दिनों भीषण गर्मी है। इसमें पानी का टोटा है। सो, इस वक्त यह विषय मीडिया के लिए मौसमी (सीज़नल) है। मीडिया का टेक्स्ट है। आज (दो मई को) ही खबर छपी है कि पानी की बेह्द कमी होने से एक गाँव में लडकों की शादियां नहीं हो रही हैं। लोग वहां की स्त्रियों को पानी ढोते हुए देखते हैं और अपनी बेटियां व्याहने की हिम्मत नहीं करते...।
वरना पानी की मूल समस्या तो बारहो महीने है। सूखे-दुर्भिक्ष-अकाल पहले भी पडते थे, लेकिन आज भी सारी प्रगति व साधन-सम्पन्नता के बावजूद खेतों में पानी नहीं है। पम्पिंग्सेट-इंजन-ट्रैक्टर के लिए किसान कर्ज़ ले रहा है। वापस नहीं कर पा रहा है। आत्महत्याएं कर रहा है...। सनातन आश्चर्य का विषय है कि दो 70% पानी के बावजूद सृष्टि की 30% धरती प्यासी रहती है...। मैदानों में पानी लाने के प्रावधान में सारे संसाधन व सारी तकनीक क्यों फ़ेल हो जाती है? नहरें निकली तो हैं...पर जब जरूरत होती है, तभी वे सूखी क्यों रहती हैं? और ख़ुदा-न-ख़ास्ते जब पानी आता हैं, तो इस क़दर कि या तो खडी फ़सलें डूब जाती हैं या फिर खाली खेतों में बुवाई महीनों लेट हो जाती है...। पानी से बिजली बनती है और बिजली की बेतरह कटौती गाँवों में ही होती है। छोटे शहरों के लघु उद्योग बिजली के बिना बन्द हो रहे हैं। कानपुर के उद्योग जब उजड रहे थे, तो लखनऊ में बिजली मंत्री के घर में आपूर्त्ति की आधी दर्जन स्कीमें जोर-शोर से काम कर रही थीं। उन लघु उद्योगों को मुम्बई जैसे महानगरों में शरण लेनी पडती है....
और मुम्बई में पानी की कटौती आ-ए-दिन होती रहती है। कविता बनायी गयी है-
‘भाई वही है सच्चा प्रेमी, इतना आँसू रोज़ बहाये।
पत्नी जिसमें कपडा धो ले, बच्चा जिसमें खूब नहाये’॥
पर वही बात कि यह सब किसके लिए...और कहाँ॥ ? तो चालों-झोपडों व निम्नमध्यवर्गीय इलाकों में...। वरना जहाँ मंत्री-संत्री व बडे धनी-धरिकार लोग रह्ते हैं, वहाँ इतने पानी से कुत्ते नहलाये जाते हैं, जितने से एक चाल का गुज़ारा हो जाये...
इनकी करतूतें ऐसी भी हैं कि नदी की नदी बेच दे रहे हैं। वहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियां कोकाकोला बना रही हैं और आस-पास की सारी ज़मीनें बंजर होती जा रही हैं। ऐसे विद्रूप आजादी मिलने के बाद की योजनाओं के तहत गाँवों में भी हुए, जब गाँव के सार्वजनिक तालाब पट्टे पर किसी को दे दिये गये और पानी की अपासी से वंचित हो रहा है पूरा गाँव। इन हालात को लेकर कहावतें बनी हैं - नदी हमारी पानी उनका...और पानी उसको मिलेगा, जिसकी जेब में पैसा होगा...।
ये तो व्यवस्था की सीधी विडम्बनाएं हुईं...। इनके चलते ही हो रही है- प्रकृति के साथ छेडखानी, जो आधुनिक मनुष्य निरंतर कर रहा है। इससे यह समस्या दिन-ब-दिन विकराल होती जा रही है। ऋतुएं अपनी प्रकृति तक बदल रही हैं। बेमौसम बरसात हो रही है, तो बरसात में सूखे पड रहे हैं। अब लडकियां सावन में गाती हैं- ‘अरे रामा रिमझिम बरसे पानी, बलम घर नाहीं रे हरी,,,’ और उधर तपती धूप इस रोमैंटिक गीत का मज़ाक उडा रही होती है...। लेकिन अपने हित में प्रकृति को काटने-पाटने के इस रास्ते पर मनुष्य इतना आगे बढ चुका है कि लौटना नामुमकिन है - ‘हिम्मत है न बढूँ आगे को, साहस है न फिरूँ पीछे...’ की स्थिति है।
उदाहरण के लिए इतने सारे पम्पिंग सेट्स लग गये हैं, जिनसे एक तनिक पानी की ज़रूरत पर दस तनिक पानी निकल रहा है और धरती के भीतर पानी की सतहें नीचे से नीचे होती जा रही हैं। जब एकाध नलकूप (ट्यूप्वेल) लगे थे, तो ही आस-पास के कूएं सूखने लगे थे और उनसे पानी निकालना भारी हो गया था। तभी नहीं सोचा गया - खेती व देश की प्रगति का जज़्बा जो सवार था...। कैसे कहें कि यह ठीक न हुआ ? आज तो कूएं रहे ही नहीं। चौतरफ़ा हैंडपम्प हो गये हैं। उनमें भी मोटर लग गये हैं। पानी की आबादी के साथ बर्बादी वहाँ भी हो रही है। जलस्तर इससे भी नीचे जा रहा है...।
सो, ‘बिन पानी सब सून’ तो हो ही रहा है, किंतु इसका एक दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है, जिसे ‘बहुपानी सब सून’ भी कहा जा सकता है... भूमंडल का तापमान बढ रहा है... क्या प्रकृति के साथ छेडखानियों के चलते ...? और इससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं। यह बढ तो रहा ही है... जितना ज्यादा बढेगा पिघलना, समुद्र का जलस्तर भी उतना ही बढेगा॥। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि दो फिट भी बढा, तो दुनिया के मुम्बई जैसे तमाम शहर नष्ट हो जायेंगे...
कुल मिलाकर मुझे लगता है कि बिन पानी सब सून व बहुपानी सब सून के लिए बहुत दूर तक जिम्मेदार हैं - ऊपर बताये गये वे बेपानी लोग, जिनके पास सत्ता की शक्ति या फिर शक्ति की सत्ता है। उन्हें अपने देश व लोगों के पानी की पडी नहीं है। उनका बेपानी होना, देश के पानी पर भारी पड रहा है । और अब तो रहीमजी जैसे लोग रहे नहीं कि ‘रहिमन पानी राखिए...’की सीख दें...। अभी पिछले दिनों ही भोजपुरी के वे कवि चन्द्रशेखर मिसिर भी दिवंगत हो गये, जो अपने श्राद्ध का पानी न लेने की धमकी देकर भी पानी बचाकर रखने-रहने की बात कहते थे- पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी...। वैसे मैं जानता हूँ कि उनकी आज कोई सुनने वाला भी नहीं रहा, पर कहने वालों का न रहना भी बहुत साल रहा है...। इससे तो सचमुच ही और भी सब ‘सून’ होता जा रहा है - अफ़ाट शून्य...।
ऐसे में ‘नवनीत’ के इस तरह के आयोजन भी काफ़ी राहत दिलाते है - ‘कुछ नहीं’ के बीच ‘कुछ’ की याद का यह अहसास भी क्या कम है...!!
* * * *
बहुत जल्द आप त्रिपाठी जी को अपने ब्लोग पर लिखता पायेगें।

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत आभार त्रिपाठी जी को यहाँ प्रस्तुत करने के लिये. पसंद आया. अब इन्तजार है.

Gyandutt Pandey said...

एक और स्तरीय ब्लॉगर की प्रतीक्षा मेँ!

Mrs. Asha Joglekar said...

बडा अच्छा लगा पानी पर आपका लेख । सालों पहले मेरे बडे भाई साहब ने एक काव्य प्रतियेगिता में हिस्सा लिया था विषय था पानी । और उन्हे प्रथम पुरस्कार मिला था । कविता मराठी में थी ।
उसमें उन्होने कल्पना की थी कि कवि डूब रहा है और उसे तिनके का भी सहारा नही है तो वह पानी की ही स्तुति कर के अपने को बचाने की आखरी कोशिश मे है । उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं

दुग्धांत नित्य गवळ्याने मग काय मिसळले असते
सोनार दागिन्यां वरती सोन्याचे काय चढवते
चांगल्या गोल मोत्याला मग काय पारखी म्हणते
जीवन अफाट हो सारे बुडबुडा कशाचा ठरते
कोलंबस नसता थोर
तेनसिंग एक मजूर
गाजता न जगि या फार
अन् कसे सकाळी असते ढोसले चहाचे पाणी

मराठी कविता है अपनी सहेली से पढवा लीजीये ।
अंत में तारीफ सुन कर पानी भी पसीज जाता है और
एक लक्कड कवि के मदद के लिये भेज कर कवि की प्राण रक्षा करता है ।