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October 09, 2007

खुली वसीयत

खुली वसीयत



इसके पहले कि तालू से चिपके,

ये पटर पटर चलती जबां,

सुन मेरी वसीयत बेटा बैठ यहां,
कुछ बातें तुझसे कहनी हैं,
जो मेरे मरने से पहले और मरने के बाद तुझे निभानी हैं,

जब जीवन धारा सूखने लगे, जबां न चले,
करवट मौह्ताजी हो, आखँ न खुले,
तुझसे मेरी विनती है,
इन रिसती सासों को सुइयों नलियों कि सजा न हो,



किसी की रोजी रोटी की तिक्कड़म का सामान न हो,
खिसका देना खटिया मेरी उस खिड़की के पास,
नजरों से आलिंगन कर लूं अपनी अमराई का अंतिम बार,
मेरे गालों को चूमे मन्द मन्द ब्यार, ओड़ूं सावन की फ़ुहार,
दवाइयों की बदबू,ठ्डे लोहे के बिस्तर,ए सी की बासी हवा,
इन अटकी सासों को मत देना ये सजा,

छूटे सासें ,कटे सजा तो मेरी खुशियों में शामिल होना,
किसी अच्छे से होटल में सपरिवार स्वनिमत्रंण देना,
निर्जीव मिट्टी की खातिर जीवित पेड़ों की ह्त्या,
ये पाप न मेरे सर देना,
ये हरियाली भविष्य की धरोहर,मेरे लिए हुआ पराया,
न जलाना, न गाड़ना, न चील कऊऔं को खिलाना,
मुझसे न हो मैली हवा, माटी , ये नदिया,
किसी मेडिकल कोलेज में दे देना दान,
शिक्षक थी, शिक्षक हूँ,निभाऊँ मर कर भी शिक्षक धर्म
मेरे अंगों को चीर फ़ाड़ के जाने बच्चे मर्ज का मर्म,



जिस सखा से जीवन भर बतियाई हूँ,
उल्हाने दिए और मुस्काई हूँ,
उससे मिलने को पंडित के श्लोकों कि दरकार कहाँ,
न सहेजना दिवारों पर मेरे निशां,
तू मेरी जीवंत निशानी है, फ़ोटो में वो बात कहाँ,
न याद कभी करना मुझको, आगे बढ़ना सिखलाया तुझको,
ले चली हूँ बस मैं इन एहसासों को, इस मन्थन को,
जिसने जीवन भर सताया मुझको,
अब मेरी बारी आयी, सजाए-मौत देने की इनको

17 comments:

Sanjeet Tripathi said...

गज़ब!! नमन है ऐसे विचारों को !!
बहुत सही!!

पर यह वसीयत वाली भावना क्यों!!

अनुत्रित प्रश्नों के पास आये थे उत्तर said...

nice and touching poetry and last wishes !! but mam its too early , i am sure god has more in store for you and how can your blessing that we get ewhen ekders put their hand over iour head be replaced with any thing ??

rkrai99 said...

WAKAI BAHUT KHOOB LIKHA HAI AAPNE, BAHUT HI SAMAYIK HAI KAVITA YEH. ACCHE DHANG SE PRASTUTI HAI

vikky said...

anita ji har baar ke taraha is baar bhi per bhot khob lekha hai hami kafi achha laga "खुली वसीयत" mi ek naya he roop deya hai aap ne aapni kavitaao ko ..
vikky

ALOK PURANIK said...

ये उम्र है वसीयत लिखने की जी। आप तो कमाल सा कर रही हैं। अभी उम्र क्या है आपकी।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा विचार हैं. इन्हें सुभाषित का नाम दें, वसीयत का नहीं. वसीयत तो यूँ भी परिवार या कुछ लोगों तक सीमित हो जाती है, सुभाषित तो जग को, आने वाली पीढ़ियों के लिये होते हैं.

वैसे भी वसीयत के लिये तो बहुत जल्दी है अभी, आप भी कैसी बात कर रही हैं. :)

ek insan said...

har din tumahree kavita aage badh rahee hai asha karata hoon ek din amar ho jayegee
Anil

Gyandutt Pandey said...

अत्यंत सशक्त लेखन। आपके प्रति प्रशंसा भाव था - उसमें आदर भाव भी पर्याप्त मिल गया है।
और हल्के में : अनीता जी, हम ब्लॉगर ऐसा लिख लेंगे तो स्थापित साहित्यकारों का युग गया मानिये! :)

HARI SHARMA said...

Maine Anita Madam ke aur bhee blog padhe hai. aur vo jitna bebaakee se sach ko samne rakhtee hai vo bhale kavya jagat ke dhurandharo ko raas na aaye lekin jo safgoi ko sir aankho per rakhte hai unko to amrit varsha sa lagta hai. unke sarokar, unka drishtikon aur unkee anubhootiya yatharth se judkar pushpvarsha kartee hai.
Vaseeyat ko padhne ke baas sach mai aisa laga ham us kal khand mein pravesh kar gaye hein jab anita jee ko antim vida denee hai. mritu baad kee ghatnao per apne itne sateek nirdesh bachhan ke baad sir yahee padhne ko milte hai.
meri kamna hai ki anita ji ko haamree bhee umar lage aur vo ham sabka marg darshan kartee rahe.

Aapka ye dost aapko pranaam karta hai

Mrs. Asha Joglekar said...

अनिता जी बहुत बढियाँ लिखा है । आपने मानो मेरे ही विजारों को आवाज़ दे दी । वसीयत बनाने की कोई उम्र नही होती । और ये सब बातें तो सबको बहुत पहले ही मालूम होना चाहिये । और कविता में इन्हे बहुत खूबसूरती से बांधा है। बधाई ।

Anonymous said...

out of all the creations that I read by you.. this is my favourite one !! I like for a number of reasons and I ;ike some lines more so.. like... "Nirjeev mitti kikhatir jeevit pedon ki hatya".

Hats off to the geture.

-- niharika

shrdh said...

जिस सखा से जीवन भर बतियाई हूँ,
उल्हाने दिए और मुस्काई हूँ,
उससे मिलने को पंडित के श्लोकों कि दरकार कहाँ,
न सहेजना दिवारों पर मेरे निशां,
तू मेरी जीवंत निशानी है, फ़ोटो में वो बात कहाँ,
न याद कभी करना मुझको, आगे बढ़ना सिखलाया तुझको,
ले चली हूँ बस मैं इन एहसासों को, इस मन्थन को,
जिसने जीवन भर सताया मुझको,
अब मेरी बारी आयी, सजाए-मौत देने की इनको


didi aapki in panktiyon ne stabadh kar diya hai

आलोक कुमार said...

ओह बहुत अच्छी कविता…ये कविता हमलोगों को कब सुनने को मिलेगी…!!

Mired Mirage said...

एक बहुत ही सुन्दर , हृदयस्पर्शी , प्रगतिशील व भावनाओं के साथ विचार प्रधान रचना । बहुत पसन्द आई । बधाई ।
घुघूती बासूती

सजीव सारथी said...

क्या कहूँ अनिता जी, ऐसी सशक्त रचना और ऐसी प्रस्तुति, कोटी कोटी बधाई आपको, अगर आप बुरा न माने तो मैं इस कविता को अपनी all-time-collection में रखना चाहूँगा, यह एक यादगार रचना है, भाव, शब्द चयन, प्रस्तुति सब कुछ श्रेष्ट अति श्रेष्ट

ashish said...

मेरे पास शब्द नहीं है अपनी भावनाए व्यक्त करने को ...
बस इतना कह सकता हूँ की अन्तिम बार कोई कविता पढ़कर मैं इतना भावविभोर कब हुआ था मुझे याद नहीं..

Chandrashekhar said...

Aap ki ye kavita logonko marneke bad dehdan karnekeliye inspire kar sakti hai. isliye use prasidhi milne ki jaroorat hai...