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October 04, 2007

बाम्बे टू गोवा

नेट परिवार के मेरे दोस्तों को मेरा नमस्कार, आदाब ,हैलो…मुझे भूल तो नहीं गये थे…। मैं एक बार फ़िर हाजिर हूँ एक और सस्मंरण ले कर। इसके पहले कि आप कहें अरे ये तो ट्रेवल और टूरिस्म का ब्लोग लगता है, मैं आप को बताना चाहुंगी कि अब लंबे अंतराल तक कोई सस्मंरण नहीं आने वाला, अजी, इतनी घुमतंरू नहीं हूँ। वो तो बस जय हो गांधी बाबा की जिनकी बदौलत एक छुट्टी मिल गयी, एक हमने मार ली और चले बोम्बे टू गोवा…


गोवा मैं पहली बार आयी हूँ, ये संस्मरण गोवा से लिख रही हूँ पर पोस्ट तो बोम्बे लौटने पर ही कर पाउँगी। ये ब्लोगिंग का चस्का भी बड़ा लती है ये अब जान पा रही हूँ। कोकण रेलवे से सफ़र करने का ये मेरा पहला अनुभव था। बम्बई, नहीं पनवेल से लेकर थेविम तक कहीं भी एक सूखा पत्ता नहीं मिला, सब हरा ही हरा, इतनी हरियाली कि बस नजारा देखते ही बनता था, सारे रास्ते हम खिड़की के शीशे से मुँह चिपकाए बैठे रहे। और मजेदार बात ये कि ये हरियाली सोशल फ़ोरेस्टरी का कमाल नहीं था, सब प्राकृतिक छ्टा थी, पूरी की पूरी पर्वत श्रखंला बड़े बड़े पेड़ों से पटी पड़ी थीं, प्राण देयी छोटे बड़े नदी नाले, झरने अपने पूरे यौवन पर थे।


सुरंदिर, टैक्सी ड्राइवर, हमारा तीन दिन का साथी, थेविम से सीधा कालनगुट ले गया। बम्बई से चलने से पहले हम बार बार प्रार्थना कर रहे थे कि जब हम गोवा पहुँचे खूब बारिष हो , खैर बारिष तो नहीं हो रही थी पर बादल छाए से थे, हवा ठंडी, और धूप बिल्कुल नहीं लग रही थी, सब मिला कर मौसम था सुहावना। हॉटेल का कम्ररा एकदम समुद्र तट पर्। मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ गये।


कॉलेज के जमाने में मेरे घर और समुद्री किनारे के बीच सिर्फ़ कुछ नारियल के पेड़ थे, सुबह शाम आती लहरों का सगींत कानों में गूँजा करता था। लहरों की धुन से समुद्र के मिजाज पता चलते थे, कभी धीर गंभीर, छोटी छोटी लहरों से तटों को छेड़ता तो कभी उंमग भरा नाचता ठ्ठियाता तेजी से किनारों की तरफ़ बढ़ता और फ़िर पीछे ह्ट जाता, मानों हू तू तू खेलता हो।


कालनगुट की बालू हमारे जूहू बीच की बालू से ज्यादा मोटी है और रंग भी सुनहरा, बहुत सुन्दर्। साफ़ इतना जितना जूहू 30 साल पहले हुआ करता था, अब तो वहाँ दुकाने ही दुकाने और चलते फ़िरते खोमचे, भीड़ भाड़ और पानी इतना गंदा कि पावँ डालने को मन न करे। बरसों से जूहू जाना छोड़ दिया। कॉलेज के दिनों में तो मुझे याद है कि होली खेल कर लोग सीधा जाते थे समुंद्र में नहाने, कोई अपना घर गंदा नहीं करना चाहता था, आखिरकार घर में दाखिल होने के लिए ड्रांइगरूम से जो गुजरना पड़ता था। पर अब वहाँ गुंडागर्दी इतनी बढ़ गयी है कि होली के दिन लड़कियाँ तो क्या लड़के भी जाने से कतराते हैं। सो यहाँ गोवा में नंगे पांव गीली रेत में घूमने का मजा आ गया।







दुसरे दिन हम निकल पड़े देखने सेंट फ़्रासिस चर्च, मगेंश मन्दिर(शिव जी का मन्दिर, लता मगेंशकर मूलत: वहीं से हैं), शांता दुर्गा मन्दिर, इत्यादि।खैर इन सबकी अपनी छ्टा थी ही, पर सबसे सुन्दर थी माण्डवी नदी। शहर के बीचोंबीच बहती, पानी से लबालब भरी। पिछ्ले साल हरिद्वार गये थे,गंगा के दर्शन करने, गंगा सिर्फ़ फ़िल्मों देखी थी, अब देखने का बड़ा मन था। वहाँ जा कर बड़ी निराशा हुई, गंगा के नाम पर बस थोड़ा सा पानी तल में, आधी गंगा तो हमने पैद्ल चल कर पार कर ली थी और उसके आगे जाने का कोई मतलब न था, बस लक्ष्मण झूले के नीचे थोड़ा सा पानी, जिसमें आटे की गोलियां डालो तो पता नहीं कहाँ से मछ्लियाँ आ जाती थी। सिर्फ़ एक ही घट्ना रोमांचकारी रही, जब हम आटे की गोलियां डाल मछ्लियों का आना देख रहे थे तो सामने से एक गाय आ गयी उसे रास्ता देने को हम एक तरफ़ सिमट लिए पर पता नहीं उसके मन में क्या कि आगे जाने के बदले उसने अपना चेहरा हमारे कंधे पर रख दिया, मानों गले मिल रही हो ,हमारी तो चीख निकलते निकलते रह गयी, कुछ क्षण ही गुजरे थे फ़िर गाय हमारी तरफ़ ऐसे देखते हुए आगे बड़ ली मानों हमारे डर जाने पर हंसती हो, आस पास के लोग हंस ही तो रहे थे हमारी हालत देख कर्। खैर हम बात कर रहे थे माण्ड्वी की और पहुँच गये गंगा पर्।


माण्ड्वी नदी देख कर लगा इसे कहते हैं नदी, लबालब भरी हुई। जब हम पंजिम से पानोलिन की तरफ़ चले तो माण्डवी हमारे साथ साथ यूँ चली जैसे कोई जिद्दी बच्चा माँ का पल्लु थामे रिक्शा के साथ साथ भागे दूर तलक साथ चलने की जिद्द करता हुआ। अगर हम कार का दरवाजा खोल बाहर निकलते तो सीधा पांव नदी में डालते। काफ़ी दूर तलक हमारे साथ आयी वो नदी। हमने सुना था कि गोवा अपने समुद्र के कारण मशहूर है पर मेरे हिसाब से तो समुद्री तटों के साथ साथ गोवा के भीतर बड़े बड़े पेड़ों से ढकी पहाड़ियाँ इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देती हैं। शुक्र है कि भ्रष्ट नेता की या हीरानन्दानी जैसे लालची बिल्डर की नजर इन पहाड़ियों पर नहीं पड़ी, नहीं तो बम्बई की तरह यहाँ के लोग भी अपने बच्चों को पहाड़ियों की सिर्फ़ तस्वीर दिखाते।


हम जैसे शाकाहारियों के लिए थोड़ी दिक्कत आती है पर अगर प्रकृति से हो प्यार तो गोवा से हो कैसे इन्कार्। कहते हैं केरल भगवान का अपना देश है इस लिए भगवान ने वहाँ प्राकृतिक छ्टा भरपूर फ़ैलायी है , गोवा भी कर्नाटका की सीमा से लग कर है, तो यहाँ भी।…पर मुझे तो लगता है खुदा ने दोनों हाथों से जी भर कर नेमतें लुटाई है पूरे कोकण प्रदेश पर्। अब सुना है छ्त्तीसगढ़ भी इतना ही सुन्दर है तो अगली बार वहाँ, और ज्ञानदत्त जी ने कहा गंगा उनके घर के पिछ्वाड़े ही बहती है तो पहले पूछ लेगें कित्ता पानी है अब गंगा में, मुझे याद आ रहा है बचपन का एक खेल्…बोल मेरी मछ्ली कित्ता पानी।…॥

बहुत ज्यादा कंप्यूटर पारंगत नहीं हूँ पर फ़ोटू लगाने की भरपूर कौशिश करुंगी।

18 comments:

Anonymous said...

Bahut hi barihya aur wakai lagta hai ki aapke sansmaran ke baad mujhe bhi GOA jana chahiye.

शैलेश भारतवासी said...

अच्छा संस्मरण। यह भी एक अच्छी विधा है, अपनी यादों को दूसरों से बांटने का।

rkrai99 said...

Bahut hi barihya aur wakai lagta hai ki aapke sansmaran ke baad mujhe bhi GOA jana chahiye.

anitakumar said...

benaami ji, Shailesh ji, Ramesh ji ...mere blog per aane ke liye aur lekh pasand kerne ke liye mein tahe dil se aapki shukrgujaar hun

Rajesh said...

Anita ji, saadar namaskaar,
Bombay to Goa, aap ke article ka shirshak padhkar to kai saal wali Amitabhji ki picture hi yaad aa gayi, us pic mein comedy bharpoor thi aur aap ke article mein kudarati nazaron ki bharmar lagi hai. is tarah se donon hi kafi equal hai, ki donon se maje loote jaa sakte hai. haan aur ek cheej, agli baar jab aap Goa jaye ya aap ke pahchan wala koi bhi Goa jaye to ek "Doodh Sagar Fall" hai, jahan jana mat bhoolna. Its a beautiful place, fully worshiped by GOD. Bade se hill ke beech ek chhota sa talab hai, uper se jheel ka paani girta hai, aur har mausam mein itna thanda pani hota hai kp aap usme paon ya haath bhi nahi dal sakte. Anyways, a good memorable article. keep it up. Ab Gangaji per jaiye, Chhatisgarh to wahan ke anubhav jaroor batlana.......

ek insan said...

main nahee gaya kabhee goa tum le gayeen apne alfaz ke sath hsbdon ne rah bana dee mere liye aur ek bahut achhee safar se louta hoon abhee abhee

Anil masoomshayer

mamta said...

बहुत अच्छा यात्रा विवरण लिखा है।

वैसे अगर आप अब भी गोवा मे है तो यहां का spice plantation भी जरुर देखें और अगर हो सके तो dolphin भी।ताम्ब्री सुर्ला मे शिव का एक तेरह्न्वी सदी का मंदिर भी देखने लायक है। और अगर आप पंजिम मे आये तो हम से मिल सकती है। बस हमे ई -मेल कर दीजिए।

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा आपका यात्रा वृतांत. और कहीं भी घूम आईये ताकि हम बिना गये ही घूम लें.

सही है, लिखती रहें.

Gyandutt Pandey said...

हमें तो ट्रेवेलॉग के साथ, फोटो के स्लाइड शो ने मोह लिया. अब तो हम भी ऐसा स्लॉइड शो बनाने पर हाथ अजमाइश करेंगे.
मैं भी ढ़ाई-तीन साल पहले गोवा गया था. पर यकीन मानिये मैं इतना बढ़िया नहीं लिख सकता उस विजिट पर. शायद मन में उत्साह बहुत जरूरी है अनुभव करने को. मैं तो होटल के कमरे से निकला ही नहीं था तीन दिन में!

Sanjeet Tripathi said...

बहु्त बढ़िया!
बढ़िया विवरण दिया है आपने!!
तस्वीरें भी बढ़िया आई है!!
आप ऐसे ही संस्मरण हमारे साथ बांटती रहें!!
शुक्रिया!!

ALOK PURANIK said...

ओजी अब समझा आप कहां थीं।
जी इस उम्र में भी इतना उत्साह धांसू है।
सौरी उम्र की बात गलत कर दी है।
अभी उम्र ही क्या है, मेरे से बीस-पच्चीस साल छोटी बस।
और घूमिये पर ब्लागिंग को रेगुलर कीजिये ना।

Manish said...

तकरीबन १० १२ साल पहले मैं भी बम्बई से गोवा की यात्रा पर गया था और सारे समुद्र तटों में अंजुना मुझे बेहद पसंद आई थी।
मांडोवी नदी सुंदर थी पर शायद उसमें से आती मछलियों की गंध ने जी को उतना सुकून नहीं पहुँचाया था।

mahashakti said...

सर्वप्रथम आपका हादिक स्‍वागत और अभिनंदन है।

बहुत ही अच्‍छा वृतान्‍त है,मुझे भी लगा कि आपके साथ घूम रहा हूँ। मै भी पिछले कुछ दिनों से अपनी दिल्‍ली यात्रा के बृतान्‍त लिख रहा हूँ। सही में बृतान्‍त लिखना और पढ़ना काफी अच्‍छा लगता है।

รтσC яσCK said...

Aapne Bombay To Goa
Yaatra Vrtant ko bahut hi achhe shabdo me bayan kiya hai.

Mai to yahi kahunga ki aap itni achha likhti hai ki mujhe lag raha tha jaise aapke saath hi yaatra pe nikla hun..........

plz aap aise hi aur bhi tour kijiye aur apne yaatra vritant hum logo ko sunaaiye..........

my all the wishesh with you........

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा संस्मरण लिखा आपने। शानदार। फोटुयें भी बड़ी अच्छी हैं। लगाई भी बढ़िया तरीके से हैं।आप ब्लाग नियमित लिखिये न जी।

अजित said...

कई दिनों बाद आपके ब्लाग पर आना हुआ। ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं खुल पा रहे थे। सारी पोसेट पढ़ डालीं। बहुत अच्छा , संयत और रोचक लिखती हैं आप। अंतराल कितना ही लंबा हो जाए उससे फर्क नहीं पड़ता । आपके ब्लाग पर ऐसी ही ताज़गी हमेशा मिलेगी, यह विश्वास है। शुभकामनाओं के साथ...

Niharika said...

mam ,apne itna accha blog banaya mein to dekhti hi reh gayi.. aur aap kehti ho ki "jyada computer paarangat nahi hoon" !! Its a nice blog and very well presented. Travelling is one of hobbies too... I love travelling therefore I loved the tour of Goa that you just gave to me. thanks.

ALOK PURANIK said...

बेहतरीन है जी।
और सब यात्री ही हैं तो जी। पूरी जिंदगी देखा जाये, तो ट्रेवल के अलावा क्या है जी। एक से दूसरे बंदे तक, एक इच्छा से दूसरी इच्छा तक, जिंदगी से मौत तक सब ट्रेवल ही है। ट्रेवल पर हिंदी में बहुत कम लिखा गया है, आप जमाइए।