" स्ट्रीट शॉट्स फ़्रोम जर्मनी"
दोस्तों संजीत जी ने और ज्ञान जी ने सुझाया और हम आज पारिवारिक पोस्ट लेकर हाजिर हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि विनोद जी हिन्दी में अभी नहीं लिख सकते इस लिए ये पोस्ट हमारे अंग्रेजी वाले ब्लोग "चिर्पिंग्स" पर डाली है। विनोद जी फ़ोटो ब्लोग बनाना चाह्ते हैं। इस पहली पोस्ट के लिए भी उन्हों ने कुछ 20-25 फ़ोटोस निकाली और कहा इन्हें डाल दो। हमने कौशिश की पर तीन से ज्यादा लोड ही नहीं हो रही थी। उनके चेहरे पर निराशा देख हमें बहुत खराब लग रहा था पर क्या करते, दोनों टेकनॉलिजिकली चैलेंजड्।
हम सोच रहे थे क्या करें और साथ में अपनी पोस्ट पर आयी टिप्पणियाँ देख रहे थे। एक नाम दिखा अभिषेक ओझा -ये कौन है वैसे भी उनका धन्यवाद देने के लिए ईमेल पता चाहिए था सो हम उनके ब्लोग पर गये, जैसे ही उनका ब्लोग खोला विनोद बड़े एक्साइटिड हो कर बोले " देट इस इट, आई वान्ट टू मेक इट लाइक दिस"। ओझा जी ने कम से कम पंदरह फ़ोटो लगा रखे थे वो भी समोसे बनाने के लिए। अब ओझा जी को ढूंढना शुरु किया उनसे पूछ्ने के लिए कि भाई कैसे इत्ते सारे फ़ोटू डाले। अभिषेक जी का ईमेल पता भी नहीं मिला उनके ब्लोग पर, हार कर टिप्पणी के रुप में एस ओ एस छोड़ आये। पति देव से कहा सो जाइए कल सागर जी के आगे भी गुहार लगाते हैं। दूसरे दिन सागर जी ऑन लाइन न मिले।
हमारी हैरानी देखने लायक थी जब शाम को पतिदेव को दरवाजे पर खड़ा पाया( रात को दस बजे से पहले तो कभी नहीं आते) पूछने पर कुछ ऐसे ही अनमना सा बहाना था, फ़िर बोले हमारी पोस्ट बन गयी क्या। अच्छा तो ये बात थी…:) हमने कहा नहीं सागर जी आज नहीं मिले चलो खुद ही ट्राई करते हैं। अब हम दोनो यूं ही चिठ्ठों पर घूम रहे थे। मन में गाना घूम रहा था
" दो बेचारे, बिना सहारे, देखो घूम घूम के हारे, बिन ताले की चाबी ले कर( फ़ोटोस थी पर लोड करने का तरीका नहीं) फ़िरते मारे मारे…:)) ।"
तभी चिठ्ठाजगत में एक टेकनिकल पोस्ट दिखाई दी। ज्यादातर हम ऐसी पोस्ट नहीं खोलते, कुछ समझ ही नहीं आता न, पर आज पोस्ट का शीर्षक देख कर खोली, शीर्षक था "सर्च इंजन पर इमेज"। इमेज शब्द ने हमारी जिज्ञासा जगा दी थी और काम बन गया। जहां हम उल्लु हैं और रात को बहुत देर से सोते हैं विनोद हमसे एकदम उल्टे हैं। दस बजते न बजते उनकी आखें झपकने लगती हैं। पर कल तो सारी पोस्ट तैयार करते और फ़िर पोस्ट करते रात का एक बज गया, जनाब की आखों से नींद गायब थी। तो ये बनी विनोद जी की पहली पोस्ट " स्ट्रीट शॉट्स फ़्रोम जर्मनी" । अभी अभी ऑफ़िस से फ़ोन आया और कुछ शर्माते हुए , कुछ झिझकते हुए पूछा गया " कोई टिप्पणी?"…हा हा , टिप्पणीयों को लेकर लिखी गयी सभी पोस्ट मेरे दिमाग में कौंध रही हैं।
याद आ रहा है कि जब मैंने पहली बार आलोक जी के ब्लोग पर लिखा था तो कैसे कॉलेज से यूं भागी आयी थी मानो जैल से छूटी कैदी और आते ही पी सी ऑन कर दिया था। इस बात को लेकर पिता पुत्र दोनों ने कितना मुझे चिढ़ाया था।
ये पहले ही वार में ब्लोग बाबा ने मेरे धीर गंभीर पति का ये हाल कर दिया- जय हो ब्लोग बाबा। चुपचाप जाके दूसरा पी सी खरीद आती हूँ , अब इस पर से मेरा साम्राज्य खत्म होता दिखता है। यारों क्या तुमरा भी था ऐसा हाल?
सुस्वागतम
से पधारे हैं, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।
May 13, 2008
" स्ट्रीट शॉट्स फ़्रोम जर्मनी"
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anitakumar
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5/13/2008 02:22:00 PM
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श्रेणी इक खबर
May 12, 2008
क्या आप ने इसे देखा है?
क्या आप ने इसे देखा है?
काली साड़ी में मैं, मेरा बेटा आदित्य और इंदिरा
एम ए के दिनों में हमारी एक बहुत ही प्यारी सी सहेली थी इंदिरा शर्मा। बहुत ही स्नेही और मिलनसार्। हमें उसके घर जाना बहुत अच्छा लगता था। वो यू पी से थी। उसके घर जा कर हम कुछ न बोलें और सिर्फ़ उसे अपनी मम्मी और दो छोटी बहनों से बतियाते सुने तो भी पूरा दिन निकाल सकते थे। आक बातचीत में भी उनका शब्दों का चयन और बोलने का लहजा हमारे कानों में रस घोलता था और दिल को एक अजीब सा सकून मिलता था। इंदिरा ये बात जानती थी। उस्के घर हम कितने बजे भी जाएं वो कभी खाना खाएं बिना न आने देती, जानती थी कि हम वैसे खाने को तरसते हैं। कई घंटे वहां गुजर जाते थे। हमारी शादी के बाद भी ये सिलसिला जारी रहा। हमारी ससुराल उसके घर के पास ही थी। पर समय कब एक सा रहा है। हमारी शादी के दो साल बीतते बीतते वो अपने भाइयों के पास अमेरिका चली गयी और हमने भी अपना नीड़ कहीं और बसा लिया। आदित्य की जिम्मेदारी भी आ गयी। अब इंदिरा का आना साल में सिर्फ़ एक बार होता था, दिसंबर के अंत में या जनवरी के शुरु में। अमेरिका में छुट्टी लेने का वही सही समय है। पर हमारी बदकिस्मती ऐसी थी कि वही समय होता था आदित्य के युनिट टेस्ट या फ़ाइनल परिक्षाओं का। उन दिनों में हमारे पास कोई वाहन भी न था। तो बस जगह की दूरी और समय की कमी के चलते हमारा एक दूसरे से मिलना छूटता चला गया। और हमारी ये प्यारी सी सहेली कहीं खो गयी है। हम यहां उसकी तस्वीर लगा रहे हैं इस उम्मीद में कि हिन्दी भाषी होने के कारण शायद वो ब्लोगस पढ़ती हो या आप में से शायद कोई इसको जानता हो। अगर आप इंदिरा को जानते हैं तो कहिएगा कि इंदू अनिता आज भी तुम्हारा इंतजार कर रही है।
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anitakumar
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5/12/2008 06:02:00 PM
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May 10, 2008
एहसास
एह्सास
मेरे एक नेट मित्र हैं देहली से राजेश जी, उनका लड़का विरल त्रिवेदी लगभग मेरे लड़के की ही उम्र का होगा। नयी पीढ़ी का नवयुवक जिसका आत्म चिंतन भी अंग्रेजी में होता है। किताबों से दूर, आत्मविश्वास और अपने अंदर के टेलेंट के बूते पर आगे बढ़ने का सलीका लिये एक आम बम्बईया पैदावार लगता है, है नहीं । नीचे लिखी तस्वीर उसी ने नेट पर से ढूंढ निकाली थी और इसे देख कर उसके मन से जो फ़ूटा वो आप भी देख सकते हैं। हम तो हैरान हुए ही उस अक्ख्ड़ सी शख्सियत के पीछे छुपे इस संवेदनशील मन को देख कर, सोचा आप से भी बांट लें। भविष्य में सकारात्मक संभावनाएं अभी बाकी हैं।

एहसास
तेरी गरम बाहों को आज भी ओढ़ कर सोता हूँ मैं
तेरी सासों की महक से आज भी मदहोश होता हूँ मैं
तेरे केसुओं को आज भी अपनी उंगलियों से सहराता हूँ मैं
तेरी रूह के आइने में खुद को आज भी देख पाता हूँ मैं
तेरे जिस्म का एहसास आज भी वैसा ही बरकरार है
तेरे बदन की खुशबु से आज भी दिल की दुनिया गुलजार है
तेरे हाथ को अपनी दो हथैलियों में रख कर
निगाहों से हाले दिल सुनाने का सिलसिला भी जारी है
मेरी बेजुबान आखें तेरी सिलवटों का आइना बनकर
मुझे रोज सहर में झिंझोड के जगा देती है
मैं महसूस करता हूँ ये सब, इन एह्सास को जी नहीं पाता
फ़िर भी, वो एह्सास है जो जिन्दा है आज भी , सांस ले रहा है
काश हम थोड़ी देर और साथ जी पाते, तुम और मैं
खैर, इन एहसासों का मैं शुक्रिया कैसे करुं
कि तुम्हें अब तक मुझसे जोड़ के रखनेवाले वो ही तो हैं
ये एहसास ही तो है, जो हमको जोड़े रखेगें…हमेशा।
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5/10/2008 04:17:00 PM
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श्रेणी कविता
May 07, 2008
कविताई शाम -भाग 2
कली जब फूल हुई खिल के एक रोज तो फिर आस पास भवरे मडराने वाले आ गये
औ कवि गन जो कविता सुनाने वाले आये तो श्रोता गन तालियाँ बजाने वाले आ गये
कविता की मौत मंच पे हो गई उसी दिन जो घूम घूम चुट्कुले सुनाने वाले आ गये
इसके संग जीने की तो उसके संग मरने की बात बात मे ही सारी कसमे भी खा ली है
तो सिर्फ कॉलेज नही जितने भी नॉलेज मे है बारी बारी पींगे सब से प्रेम की चढा ली है
और उनके भाई जब लाठी लेके आ गये तो हर एक से जाके खुद ही राखियाँ बंधा ली है
पत्नी से बोला तूने सुना तो जरूर होगा तीन रानियाँ थी दशरथ के भवन मे
सुनते ही पत्नी के दिल से धुँआ उठा और आग लग गई जैसे पूरे तन मन में
बोली गर दशरथ बनने की सोंचोगे तो मैं भी बन जाउंगी द्रोपदी एक छन में
सच ब्यानी की ठान ली जब से , हाल तब से ही ये फ़टेला है
ताजगी मन में आ न पाएगी, घर भी चारों में तू सड़ेला है
रात गम की ये बेअसर काली, चांद आशा का गर उढेला है
लोग सीढ़ी है काम में ले लो, ये जो बात बचपन से पढ़ेला है
रोक पाओगे तुम नहीं नीरज, वो गिरेगा फ़ल जो पकेला है।
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anitakumar
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5/07/2008 05:24:00 PM
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May 06, 2008
ब्लोगी कीड़ा काट गया



अगर आप को ये पोस्ट पसंद आयी तो पारिवारिक पोस्ट का सिलसिला आगे बढ़ायेगें।
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anitakumar
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5/06/2008 01:40:00 PM
21
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श्रेणी लेख
May 05, 2008
कविताई शाम
कविताई शाम
ह्म्म! अब कुछ पल सुस्ताने बैठी हूँ तो कल शाम को याद कर खुद ही हैरान हूँ। मैं जिसका हिन्दी प्रेम सरस्वती नदी की तरह कई परतों के नीचे दफ़न था और जिसके घर के सदस्यों के लिए हिन्दी साहित्य काला अक्षर भैंस बराबर है, उसके घर पर हिन्दी कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। ये चमत्कार नहीं तो और क्या हो सकता है। ये मुमकिन हुआ बतरस की बदौलत्। जैसा हमने बताया था कि पिछ्ले कुछ महीनों से हमने इसकी गोष्ठियों में जाना शुरु किया है। हमारे घर से काफ़ी दूर पड़ता है फ़िर भी हम हिम्मत कर ही डालते हैं। ऐसी हिम्मत वेस्टर्न मुम्बई में रहने वाले नहीं कर पाते( है न यूनुस जी?…J)। खैर पिछली बार हमने ठिठाई दिखाते हुए मई महिने की बतरस हमारे घर रखने का प्रस्ताव रखा और ये बतरस के सदस्यों का बड़प्पन और न्यायप्रियता ही है कि उन्हों ने हमारा प्रस्ताव तुंरत मान लिया। त्रिपाठी जी को डर था कि हमारा घर इतना दूर और कवि सम्मेलन का आयोजन रात के समय होने के कारण शायद बहुत से लोग नहीं आये और शो कहीं फ़्लोप न जाए।
आख़िर वो दिन आ ही गया, मानसिक तनाव अभी बरकरार था। हमारे एरिआ में लोड शैडिंग होती है तो रोज 4-5 शाम को लाइट नहीं होती, मकान है आठ्वें माले पर, आने वालों में कई बुजुर्ग्। पर हमारी किस्मत देखिए शायद रविवार होने के कारण कल बिजली भी नहीं गयी। हॉल धीरे धीरे भरना शुरु हुआ और एक घंटे में कम से कम 45 लोग आ चुके थे। और लोगों का आना अभी जारी था। अब आश्चर्यचकित होने की बारी त्रिपाठी जी की थी।
ऊपर से अरविंद शर्मा राही जी( ये कवि भी हैं और बिल्डर भी) के कहने पर लोकल टी वी चैनल वाले आ गये पूरा प्रोग्राम रिकॉर्ड करने और तीन टेकनिशियन और कैमरा स्टेंड ने मिल कर चार लोगों की जगह कब्जे में ले ली तो युवा कवियों ने हॉल के साथ सटी सीड़ियाँ हथियाई देख हमें अपने कैम्पस के दिन याद आ रहे थे। आने वाले कवियों में से कुछ को हम ब्लोगजगत की वजह से पहचानते थे जैसे बसंत आर्या, विकास और अलोक (आय आय टी से), नीरज गोस्वामी जी का जब फ़ोन आया कि वो भी आ रहे हैं तो हमें सुखद आश्चर्य हुआ। इनके अलावा आने वालों दिग्गजों की लिस्ट भी काफ़ी लंबी
थी, जैसे दवमणि पांडेय( ये कवि भी हैं, फ़िल्मों के
लिए गाने लिखते हैं और फ़िर भी टाइम बच जाए तो इन्कम टैक्स ऑफ़िस में काम कर लेते हैं बसंत आर्या जी के साथ),
देवमणि जी की सुनाई कविता की चार पंक्तियाँ-
"हर खुशी मिल भी जाए तो क्या फ़ायदा
गम अगर न मिले तो मजा कुछ नहीं
जिन्दगी ये बता तुझसे कैसे मिलें
जीने वालों को तेरा पता कुछ नहीं"
"यूं ही तो लोग कहते नहीं उनको किंग खान
शाहरुख ने बादशाहत का रुतबा दिखा दिया
चक दे की हाकियों से जो भी कमाया माल
क्रिकेट की चियर गर्ल्स पर वो सब लुटा दिया॥"
कपिल कुमार( ये 76 वर्षिय युवा हैं जो एक्टर, गीतकार और मॉडल हैं),
कनक तिवारी( ये कवियत्री तो हैं ही साथ साथ में इंजिनियरिंग कॉलेज में कम्युनिकेशन स्किल्स पढ़ाती हैं, हिन्दी फ़िल्म राइटरस एसोसिएशन की सदस्या हैं, दो अखबारों में एडिटर रह चुकी हैं और भी न जाने क्या क्या),
अक्षय जैन से मैं आप को पहले भी मिलवा चुकी हूँ । सत्तर को पार कर चुके जैन साहब एक बहुत ही डायनमिक शख्शियत के मालिक हैं,मूलत: मार्क्सवादी पर फ़िर भी मार्क्सवादियों और आर एस एस को उनकी अवसरवादिता पर लताड़ने से नहीं झिझकते। उनके बारे में लिखने जाऊँ तो कई पन्ने लग जाएं यहां मैं उन्हीं की म्युसिक एलबम "आगे और लड़ाई है" के कुछ अंश सुनाती हूँ
"जिस घर में मिट्टी मुलतानी
जिस घर में मटके का पानी
जिस घर में तुलसी की पूजा
जिस घर में मीठा खरबूजा
जिस घर में दादी के किस्से
उस घर के न होवें हिस्से
घर से बड़ा न कोई मंदिर
तीरथ ऐसा न कोई दूजा
जाप करो तुम लाख हजारों
घर से बड़ा न कोई पूजा"
जाफ़र रजा-
ये तो नवी मुम्बई के ही शायर निकले। उन्हों ने अपनी नयी गजलों की किताब दूसरा मैं की एक प्रति हमें भेंट की, उसी में से कुछ शेर सुनाती हूँ-
“कदम कदम पे दिले-गमजदा दुखाया गया
तमाम उम्र मेरा सब्र आजमाया गया
कसम तुम्हारी अभी तक खबर नहीं मुझको
सलीब-ओ-दार पे कब कब मुझे चढ़ाया गया
तेरी निगाह से गिरना मेरा बिखर जाना
वो कत्ल था कि जिसे हादसा बताया गया” ।
पूर्ण मनराल- इनका नाम हमने ही नहीं सुन रखा था, इन की भेंट की किताब में इनका परिचय देख लगता है कि आप सब इनसे परिचित ही होगें। पत्रकारिता, रेडियोस्टेशन से जुड़े हुए शासकिय सेवारत।
खन्ना मुजफ़रपुरी, राकेश शर्मा, रितुराज सिंह, रवीन्द्र मौर्या, राजेन्द्रनाथ शर्मा, मनीष ठाकुर, सविता अग्रवाल, तारा सिंह, और भी बहुत सारे। कुमार शैलेन्द्र,हस्तीमल हस्ती ये वो कवि हैं जिनकी कविता कई दिनों तक जहन में छायी रहती है।
कुमार शैलेंद्र जी की कविता की कुछ पक्तियाँ देखिए
"कबिरा बैठा लिए तराजू
तौल रहा दुनियादारी
जो भीतर से जितना हल्का
बाहर से उतना भारी"।
हस्तीमल हस्ती जी पेशे से सुनारे हैं , दुकानदार हैं। अब उनकी कविता की चार लाइन देखिए
"ये नहीं कहता मैं कि खवाब न लिख
अपने कांटों को तू गुलाब न लिख
जिससे लिखता है प्यार की चिठ्ठी
उस कलम से कभी हिसाब न लिख।
राकेश शर्मा जी को सुनिए
" दिल देता जो हुकुम हम वही करते हैं
चाहत पर कुर्बान जिन्दगी करते हैं
इस दर्जा नफ़रत है हमें अंधेरों से
घर को अपने फ़ूंक कर रोशनी करते हैं।"
नीरज जी की कविता नीरज जी की ही आवाज में सुनाने का मन है लेकिन क्या करें ये टेकनॉलोजी चैलेंजड होना बीच में आ जाता है। कौशिश जारी है( संजीत , मुस्कुराओ मत,हमें सुनाई दे रहा है, कौशिश करने वालों की हार नहीं होती। तुम देख लेना एक दिन हम गायेगें “ जीत जायेगें हम , बस थोड़ी कसर है “…J) आखिर नीरज जी ही हमारी मदद को सामने आये और आज अपने मोबाइल से खीचीं तस्वीरें हमें में भेज दीं। ये तस्वीरें जो आप देख रहे हैं वो नीरज जी के ही सौजन्य से हैं । नीरज जी धन्यवाद्।
कविताओं के दौर के बाद खाना, समय कैसे उड़ा और कब एक बज गया पता ही न चला।
यहां एक किस्से का जिक्र करना बहुत जरुरी है। नीरज जी खाना खाए बिना जा रहे थे, हमारे हजार आग्रह करने के बाद भी वो टस से मस नहीं हुए। और भी कुछ लोग बिन खाए गये हमें इतना बुरा नहीं लगा पर नीरज जी तो ब्लोगर मित्र हैं, इनका इस तरह से जाना हमें बहुत खराब लग रहा था। हमने अंतिम ब्रह्म शस्त्र चलाते हुए कहा कि अगर आप खाए बिना गये तो आप की शिकायत कलकत्ते पहुंचा दी जाएगी, शिव भैया फ़िर देखना आप को कितना गुस्सा करेगें। आप यकीन नहीं करेगें नीरज जी चुपचाप खाने की टेबल की तरफ़ बढ़ लिए और मिठाई का टुकड़ा मुंह में डाल शिव भैया के नाम का मान रख लिया। शिव भैया, ऐसी पक्की दोस्ती कैसे की जाती है जरा हमें भी गुर सिखाए दो प्लीज्।
इस कवि सम्मेलन का एक अप्रत्याशित परिणाम भी निकला, पर उसके बारे में कल बताएगें। लेकचर के पचास मिनिट खत्म हो गये हैं और मुझे खर्राटे सुनाई दे रहे हैं…J
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anitakumar
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5/05/2008 03:52:00 PM
23
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श्रेणी लेख
May 04, 2008
पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी...
मित्रों आप सब अब सत्यदेव त्रिपाठी जी को जानते हैं जिनके बारे में हम अक्सर जिक्र करते हैं । हैं तो विद्वान लेकिन अभी तक ब्लोग की दुनिया से रुबरु नहीं हुए। हमारी सोहबत में इस ब्लोग नशे का थोड़ा सा रस्वादन किया है बस्। वो हर हफ़्ते "आज समाज" नामक समाचार पत्र के लिए फ़िल्म रिव्यु लिखते हैं। कभी कभी हमें भी पढ़ने का मौका मिल जाता है। उनके अनुरोध पर उनका लिखा एक फ़िल्म रिव्यु यहां पेश कर रही हूँ, आशा करती हूँ आप को भी ये उतने ही पसंद आयेगें जितने हमें आये।
बिन पानी सब सून...
पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी...
बिन पानी सब सून’ पर लिखने के लिए बात करते हुए आदरणीय विश्वनाथजी ने कहा - ‘पानी’ को आप किस रूप में देखते हैं, लिखिए। और मेरे अध्यापक ने शायद फ़ौरन ‘हाँ’ कर दी - तीस साल के अध्यापन के दौरान छिटफुट दोहों के अलावा कभी रहीम को ठीक से पढाने का मौका जो नहीं मिला... तो सोचा होगा कि इसी बहाने कुछ कह पायेंग़ॆ...
और सोचते हुए सबसे पहले रहीमदास की वह लोकवृत्ति ख्याल में आयी, जिसने उनसे न ही लोकजीवन व लोकसंस्कृति के ‘टिपिकल’ (खास व अछूते) प्रसंगों को दोहों का माध्यम बनवाया (काश, कुछेक उदाहरण दे पाता !) , वरन लोक के शब्दों का भी सहज-सटीक प्रयोग कराया। ‘पानी’ ऐसा ही लोक का- लोगों का, बहुजन का शब्द है । विशिष्ट जन का तो ‘जल’ है, जहां जलपान होता है। आमआदमी तो ‘पानीकानौ’ व ‘मीठा-पानी’ करता था। देवताओं को आज भी ‘जल’ देते हैं, पित्रों को पानी देते हैं, मित्रों को पानी पिलाते हैं और शत्रुओं को पानी पिला-पिलाकर मारते भी हैं...। हम पानी पीते-पिलाते हैं, तो समाज में होते हैं, वरना तो कहते हैं - उसके यहां कोई पानी तक नहीं पीता...। सो, लोक-जीवन का मानदण्ड है - पानी। लोक के लिए प्रयुक्त पानी के शब्द-युग्मों में दाना-पानी, रोटी-पानी...और ‘हुक्का-पानी’...। फिर तो उसका हुक्का-पानी बन्द होने लगा, जिसने कोई समाज विरोधी काम किया हो। इस तरह वह इज्जत-पानी हो गया- भाई, इज्जत-पानी बनाये रखना...।
और तब यह इज्जत राष्ट्र तक पहुंच गयी, जब हमारे भोजपुरी कवि के मरणासन्न बूढे पात्र ने अपने बेटे से कहा - ‘पानी बचाय के ना रखबेया, तब ना हम लेबै सराध में पानी’। देखिए, ‘इज्जत’ शब्द निकल गया। अकेले पानी ही वह काम करने लगा। मेरी समझ से पानी के इज्जतविषयक अर्थ का यह चरम है, जो हमारे लिए सबसे मह्त्त्वपूर्ण है। इज्जत के वजन पर ही पद-पानी, पत-पानी भी चलते हैं। पद-पानी तो समझा जा सकता है, पर ‘पत-पानी’ में ‘पद’ से ‘पत’ का भेद मात्र भाषा-शास्त्र का नहीं है। इसके पीछे छिपा समाज-शास्त्र काफी बारीक है, पर यहां बताने का अवकाश (स्कोप) नहीं...।
इज्जतदार के लिए तो पानीदार कुछ कम भी कहते हैं (गोकि उसमें थोडा अलग व ज्यादा अर्थ भी भर उठा हैं - ‘आदमी ‘पानीदार’ है’ में कुछ-कुछ ‘कौल का पक्का’, ‘बात पर मर-मिटने वाला’ का भाव भी आ जाता है। ‘वो तो एक पानी पर रहता ही नहीं’, में यह अर्थ साफ़ देखा जा सकता है) , पर ‘बेइज्जत’ के लिए ‘बेपानी’ तो धडल्ले से चलता है। काफी व्यंग्यात्मक भी हो गया है। हम अपने मित्र ‘नीरन’ को ‘नीर-न’ के विच्छेद के साथ विनोद में बेपानी कह्ते हैं । पानी का चढना तो पानी ही रह गया, पर ‘पानी उतरने में’ तो इज्जत ही उतरती है। और पानी उतरने से ज्यादा पानी उतारा जाता है। इसीलिए ‘भरे बाज़ार उनका पानी उतर गया’ से ज्यादा सटीक व प्रचलित है- ‘उसने भरे बाज़ार उनका पानी उतार दिया’। और जिसका ‘पानी उतर गया’, वो समाज में ‘पानी-पानी’(शर्मसार) हो जाता है। वो फ़िर कैसे सर उठाकर चलेगा ?
तो हो गया न उसके लिए ‘बिन पानी सब सून’। इसीलिए ‘पानी रखने’ याने बचाये व बनाये रखने की बात रहीमदासजी ने कही है - ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून’। और


