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November 15, 2007

साधारण सी

साधारण सी

शब्द कैसा गाली के जैसे तीर सा जा लगता है। आजकल असाधारण का चलन है। आप जो भी हो, जो भी करे असाधारण होना चाहिए। वो दिन लद गये जब लोग किस्मत का लिखा मान साधारण सी जिन्दगी जी लेते थे। आज आप अगर महत्त्वकांशी नहीं हैं, हर क्षेत्र में अव्वल नही हैं और साधारण सी जिन्दगी जीना भी चाहें तो लोग आपको हिकारत की नजर से देखेंगे।

मैने अक्सर माओं को बड़े दीन भाव से स्कूल की टीचर से कहते सुना है," मेरा बच्चा बहुत ही जहीन है, बस इच्छा शक्ती की कमी है, जिस दिन इसमें कुछ कर दिखाने की इच्छा जाग गयी, ये सबसे आगे होगा"?, टीचर अगर सह्रदय है तो बड़े सब्र से मां के मुख से बच्चे के गुणगाण सुनेगी और मानेगी कि उसका बच्चा साधारण है, और कुछ नहीं तो सुशील तो है ही, और हाँ कुछ बच्चे अपनी प्रतिभा देर से दिखाते है…लेट बलूमर्स । न जाने कितनी बार टीचरों ने ये बातें सुनी होगीं।

टीचर होने के नाते मैने भी कितनी मांओं को ढाढस बंधाया। अपना टीचर होने का फ़र्ज निभा रही थी, इसमें बोलने वाली कौन सी बात है जी? लेकिन एक दिन ये पहाड़ मुझ पर भी टूटा, मैं खुद ऐसी मांओं की पक्ती में खड़ी थी और इन सब बातों की निर्थरकता को जानते हुए भी दोहरा रही थी किसी और टीचर के सामने। वो टीचर शायद सिर्फ़ इस लिए मेरी बातों को काट नही रही थी क्योंकि मैं प्रोफ़्शन के हिसाब से उसी बिरादरी की थी। मेरा उन टीचरों को सलाम्।
मुझ पर ये पहाड़ तब टूटा जब मेरा लड़का-आदित्य(मेरी इकलौती संतान) बारहवीं में थाउसके नाजुक कधों पर मां-बाप, नाना-नानी, दादी और जाने कितनों के सपनों का भार था, जो उससे उठाए नहीं उठ रहा थासमाजिक मुल्यों के चलते उसके दिमाग में ये बात घर कर गयी थी कि सब अच्छे लड़के सांइस लेते हैं, चाहे चले या चलेसांइस ले तो ली पर अब वो रसहीन लग रही थी और बेकार का बोझ लग रही थीबहुत समझाया कि देखो बेटा तुम्हारे मां-बाप भी तो आर्ट्स ले कर अच्छा खासा जीवनयापन कर रहे हैं, सांइस छोड़ दो पर नहीं जी, उसकी इच्छा को आदर देते हुए जैसे तैसे साइंस कॉलेज में दाखिला करा दियाऔर तब शुरु हुआ फ़ेल होने का चक्कर, एक के बाद एक तीन साल निकल गयेये वहीं के वहीं

फ़ैल होने का सिर्फ़ यही कारण नही था कि वो रसहीन लग रही थी, दूसरा कारण ये था कि जनाब को बहुत ही अनुशासन प्रिय स्कूल से नया नया छुट्कारा मिला था और नये नये दोस्त, दोस्तनियां, लेक्चर बंक करने के चान्स, कॉलेज के वार्षिक उत्सव में हिरोगिरी करने के और दोस्तों से वाहवाही लूटने के मौके।

एक महत्त्वकांशी महिला जिसने कभी हार का मुंह न देखा हो अपने जीवनकाल में वो आज असहाय सी अपने जीवन के सबसे अहम भाग में हार पर हार झेल रही थी। खुद अपनी ही नजरों में गिरती हुई,सेल्फ़-एस्टीम चकनाचूर, हर पल हजार मौतें मरती हुई, मैं सबसे कन्नी काटने लगी। स्टाफ़-रूम से उठ कर लायब्रेरी में किताबों के बीच ज्यादा वक्त गुजारती हुई, डरती थी कोई मेरे लड़के के बारे में न पूछ ले। यार दोस्तों, रिश्ते नाते दारों से भी दूर रहने लगी, मानों खुद को काल कोठरी की सजा दे दी हो। मेरी कॉलेज के जमाने की सहेलियां छूट गयीं, जिन्हें मैं बता न सकी कि मै क्युं न मिलने के बहाने ढूढती हूँ। दूसरों के बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर की डिग्रीयों की तरफ़ अग्रसर होते देख मेरे मन पर अमावस की रात का ढेरा होता था। तबियत खराब रहने लगी। तीन साल गुजर गये इसी तरह्। लगता था जमीन फ़ट जाए और मै उसमें समा जाऊँ।

जब तीसरे साल भी वो फ़िर फ़ैल हो गया तो मैंने जोर डाला कि अब वो पढ़ाई छोड़ किसी काम धंधे की तलाश करे और साथ साथ में डिस्टेंस मोड से ग्रेजुएशन करें। इन तीन सालों में अगर कुछ अच्छा हुआ था तो सिर्फ़ इतना कि उसने एन आई आई टी से तीन साल का कंप्युटर प्रोग्रामिंग का डिप्लोमा कर लिया था। अब तक वो भी अंदर से काफ़ी टूट चुका था। उसने फ़ौरन मेरा प्रस्ताव मान लिया बिना किसी हील हुज्जत के। अब कोई अफ़सरी तो मिलनी नहीं थी। छोटे से दफ़्तर में प्रोग्रामर की नौकरी मिली और शुरु हुआ मालिक द्वारा उसके शोषण का दौर्। जिन्दगी की पाठ्शाला में दाखिल हो गया था। डिस्टेंस मोड के तहत आर्ट्स में दाखिला ले लिया था।

ये वो स्टेज थी जहां हम ने मान लिया था कि मनोविज्ञान की किताबों में जो पढ़ा था कि अगर हम चाहें तो किसी को भी प्रसीडेंट बना दें या भिखारी बना देँ(वाट्सन), सिर्फ़ कोरी किताबी बातें हैं। न चाह्ते हुए भी किस्मत पर विश्वास होने लगा था। खैर, हमने बिल्कुल पूछना बंद कर दिया कि अब पढ़ रहे हो या नहीं। जनाब पास होने लगे।

एक दिन हमने सुझाया कि तुम कॉल सेंटर में क्युं नहीं ट्राई करते, सुना है वहां ग्रेजुएशन की जरुरत नहीं पड़ती। शोषण तो सब जगह ही है। जाने में उसे हिचकिचाहट थी क्युं कि उसका भी आत्मविश्वास मार खाया हुआ था। हम समझते थे, एक बार फ़िर खुद के जख्म छुपा कर उसका मनोबल बढ़ाने में जुट गये। आखिरकार उसने कॉल सेंटर में पदादर्पण किया और अच्छी अंग्रेजी, कॉलेज के जमाने में उत्सव आयोजकों की मंडली में रह कर सीखी नेतागिरी, प्रंबधक बनने के गुण, मिलनसारिता और भी कई गुणों के कारण कई पदाने आगे बढ़ गया और आज प्रोजेक्ट मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत है। हर पदान पर कम से कम 300-400 लोगों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती थी, नया पद पाने के लिए। साथ साथ में ग्रेजुएशन भी खत्म कर एम बी ए करना शुरु कर दिया जो अब खत्म होने के कगार पर है।

उसका आत्मविश्वास कई गुना बड़ कर लौट आया है और मैने एक बार फ़िर जीना शुरु कर दिया है। उसकी मानसिक परिपक्वता अक्सर मुझे हैरत में डाल देती है, और अब मुझे उसके भविष्य की कोई चिन्ता नहीं। आज मुझे उस पर नाज है। मैं फ़िर से स्टाफ़ रूम में बैठ्ने लगी हूँ और फ़्री पिरीयड में गुनगुनाती हूँ, मेरी सहेलियाँ अकसर इस गुनगुनाने में मेरा साथ देती हैं। मैं भूल गयी हूँ कि कभी ये ही मेरी तरफ़ सहानुभूती की नजर से देखती थी मानों मुझ में ही कोई कमी हो।

ओह! पोस्ट इतनी लंबी हो गयी कि फ़ुरसतिया जी को भी मात दे गयी,समीर जी सॉरी, सॉरी के डेढ़ घंटे में शायद फ़िट न हो तो छोड़ दिजिएगा या स्पीड रीडींग्…। मैं सिर्फ़ ये कहने की कौशिश कर रही हूं कि हर मां बाप अपने बच्चे को स्टार के रूप में देखना चाह्ते हैं और बच्चा स्टार बन भी सकता है अगर मां बाप या टीचर उसके रास्ते में न आये तो। मेरी कहानी का सुखद अंत तभी हुआ जब मैने हार के निश्च्य किया कि मैं अपने साधारण से बेटे को असाधारण बनाने की कौशिश नहीं करुंगी क्योंकि मै खुद बहुत साधारण सी हूँ। अब हम दोनों साधारण बन कर बहुत खुश हैं…॥:)

26 comments:

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

बिल्कुल सही। यथार्थ के धरातल पर रहना जरूरी है। आपने इतने अच्छे ढंग से अपने मन की बात रखी। निश्चित ही सब को प्रेरणा देगी।

Kamod said...

सफलता और असफलता सिक्के के दो पहलू हैं. असफलता से सबक लेकर, बड़ों के आशीर्वाद और परिवार के सहयोग से सफलता दूर नहीं रह सकती है.

मीनाक्षी said...

बहुत सीधी सादी सरल भाषा में सहज रूप से आपने जीवन का अर्थपूर्ण चित्र खींच दिया.... काश सभी अभिवावक आपकी साधारण सी पोस्ट में असाधारण अर्थ को समझ सकें !
आज पोस्ट बिल्कुल लम्बी नहीं लगी.... बहुत प्रवाहमयी थी और हम उसी प्रवाह में पढ़ गए..... !

Gyandutt Pandey said...

असाधारणता में ही श्रेय है - यह तो सही नहीं है। मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं यह हमेशा से जानता था। बहुत ही पेन फुल तरीके से जाना है। वही हाल आपका भी है।
सामान्य जीवन को सफलता से फेस करने में श्रेय है - यह आप और आप के बच्चे ने जाना है - और यह मैदान जीतने जैसा है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने जिस सहजता से अपने अनुभव को परोस दिया है उस से अनेक माताओं और पिताओं और उन के असफलता का सामना कर चुकी संतानों का नैराश्य टूटेगा। एक छोटे काम से प्रारम्भ कर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। आप के इस सरल प्रस्तुति करण में बहुत गहराई छिपी है।

काकेश said...

बहुत अच्छी तरह से आपने अपनी बात कही.और यह लंबी तो लगी ही नहीं एक ही प्रवाह में पढ़ी गयी पूरी पोस्ट.

हर्षवर्धन said...

साधारण ही नहीं अब तो बहुत सीधा है मतलब बेवकूफ माना जाता है। यानी साधारण के सीधा होना भी गाली है।

PD said...

जो आप पर गुजरी, वैसा ही कुछ मेरे माता पिता पर भी गुजरी थी.. बस उसके रंग कुछ बदले हुये थे.. घटनाऐं कुछ अलग तरह की थी..

खैर आपका लिखा हुआ पढना अच्छा लगा.. समीर जी तो इसके लिये आधे घंटे और भी निकाल सकते हैं.. :)

बाल किशन said...

आपका का अनुभव बहुत ही प्रेरणादायक है. मैं एक रोचक बात बताना चाहता हूँ की अपने छोटे से जीवन काल मे मैंने दोनों पीडाओं को महसूस किया है. कुछ सालों पहले मैं आदित्य की जगह था और आज अपने आपको आपकी जगह पाता हूँ लेकिन आपका ये अनुभव जीवन मे एक संबल का काम करेगा. धन्यवाद.

Shiv Kumar Mishra said...

आदित्य का आत्मविश्वास लौट आया है, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है. मुझे जो भी थोड़ा-बहुत अनुभव है उससे मैं बता सकता हूँ कि बहुत सारे पढे-लिखे और ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को जब तक हम दूर से देखते हैं, वे असाधारण लगते हैं. लेकिन जब इन्ही लोगों को पास जाकर देखने का अवसर मिलता है तो मन में एक ही बात आती है; 'अरे ये इंसान तो बहुत औसत दर्जे का है. ये जहाँ है, वहाँ के लायक नहीं.'

आदित्य ने जब बाहर की दुनिया देखी होगी, और तथाकथित 'सफल' लोगों को देखा तो उसका विश्वास ख़ुद पर जरूर बढ़ा होगा........ नतीजा सामने है. आपने अपनी बात को बहुत ही अच्छे तरीके से रखा है.

Sanjeet Tripathi said...

बहुत कुछ मैं भी आदित्य सा हूं और बहुत कुछ मुझे आदित्य सा बनना भी है!!

Rajesh said...

Waah Anitaji, Kitne "Sadharan" se tarike se aap ne apni "Asadharan" lekhan shaili ka phir power bata diya. U have rightly narrated the reality show which is a fact of life. Every parent expect such big heights for their wards and if they do not meet with the expectations, the parents always get depressed. Here was the same story of Viral too. He failed for two years in last year of B.Sc. (Computer Science).Then at last he finished the graduation of course. Then he decided to join a call centre job at Mumbai alongwith his few friends, he went, then they went to Hyderabad call centre, then Ahmedabad call centre and so on. As you rightly said about the english language command, vocablary, netagiri style, and many worse experiences came out with a very good positive energy and he lastly left the call centres and joined the present job as Sr. Content Editor in a Multi-national company, a new horizon for him and he has been succeeding there. First time when he failed, we were also in the same position of yours but now after giving him his skies open, we could see and realize that he could fly at a very positive direction, as per his own choice, oneself. We had to never ask anyone to kindly give some job to our son Viral. And as you know him, he is doing very well.
This is the fact of life. I am sorry, when u said something about yours, I also in reply gave u a very biiiiiiiiig lecture, hope may not be boring..............
Anyways good eye opener article for the parents whose wards are not "Asadharan", but who can do better in a "Sadharan si" style.......
Regards

Pratyaksha said...

बहुत अच्छी बात आपने कही । हममें से बहुत इस दौर से गुज़रते हैं । हर अँधेरी सुरंग के अंत में रौशनी की किरण है ।

anuradha srivastav said...

अनिता जी सही कहा आपने बच्चों पर अनावश्यक उम्मीदों का बढता बोझ और उम्र के नाजुक मोड पर खडे ,युवा होते बच्चे कभी -कभी वो खुद तय नहीं कर पाते कि चाहते क्या हैं ? वक्त गुजरने पर जब अहसास होता है तब तक विकट स्थिति हो जाती है । जिस तरह आदित्य ने हौसला पाया वो सभी के लिये प्रेरणादायी है।

आशीष said...

माँ तो माँ ही होती हैं.. हर माँ को मेरा प्रणाम

विकास कुमार said...

मुझे तो लगता है कि आज के युग में साधारण होना सबसे असाधारण बात है.

सागर चन्द नाहर said...

अनिताजी
मैं अपने जीवन में खास कुछ नहीं कर पाया एकदम साधारण रहा और अब मैं अपने बच्चों से असाधारण बनने की उम्मीद कर रहा था।
आज आपकी पोस्ट ने मेरी आँखे खोल दी, इस पोस्ट का प्रिंट आऊट निकाल कर अपनी श्रीमतीजी को भी पढ़्वाऊंगा, और कोशिश करूंगा की बच्चों को जबरन असाधारण बनाने की कोशिश ना करूं।
आदित्य को बहुत बहुत शुभकामनायें!

rkrai99 said...

bahut hi sundar vichar bare hi acche shabdo mai likha gaya hai. yeh yatarth hai aur hame yatarth se bhagna nahi chahiye aisa anita ne kahne ki koshish ki hai

HARI SHARMA said...

Anita jee ka yah blog dil ko chhoo gaya. ye un angin parents kee antarvyatha hai jo shabdo ka intzaar kar rahee thee. mere apne jeevan kee kahanee jaise kah dee ho. aur ab ek pita ke roop mai apne bete se meri ummede bhee lagta hai itihaas apne ko dohrata hai. hataash mai bhee hota hoo. aur chinta jaroore bhee hai. per ek bahas mai yaha karna chahunga ki ham safal aur achhe aulaad kise mante hai.

mere pita chahte the mai kam se kam Engineer ho jau aur kahee office ban jau. Mujhe ye bilkul attract nahee karta tha. mere bade bhai is lakeer per safalta se chale aur aaj vo iocl mai dgm hai. mujhe unse irshya to nahee hui per lagta tha ki ghar mai meri mitte kharab unhee ke karan hotee hai.

khair jaise anita jee ke bete ne call centre se shuruaat kee aur aaj jam gaye so maine state bank kee clerki se shuruaat kee aur aaj branch manager hoo. lagta hai bahut kuchh nahee khoya ( papa ke hisaab se bhee ).

Prashan mera ye hai ki kya achha hona aur officer type hona ek hee baat hai

kya manviya guno ka koi mulya nahee hai.

kya vyabhaar kushlata kisee kaam kee nahee hai.

ham apne bachho ko jeevan mai kaisee khushiya dena chahte hai - vyaktitva vikaas kee ya post vikaas kee.

mai apne bete se kam se kam itna chahta hoo ki jab vo padhe to utna achha padhe ki vo kah sake jitna usne padha hai utna use aata bhee hai. jitna gyan use ho utna vo jane bhee. jitnee kitabe vo padhe utnee uske samajh bhee badhe. phir jo sambhav ho vo bane.

meri betee ne pichhle saal jab vo 10 mai thee mujhse kaha mai drawing mai higher studies karna chungee mujhe khusee hui ki meri beti itnee jagrat hai ki vo jantee hai use kya karna hai. phir 6 month baad usne kaha mai nift se fashion desining karna chahungee maine kaha bahut achee baat hai. usne vishay chune drawing, economics aur english maine kaha bahut achhe. ab meri ishwar se itnee hee kamna hai ki use apnee choice per kabhee sharminda na hona pade.

mujhe lagta hai parents ko itna hee dekhna chahiye ki jo lakshya vo chunta hai usmai use cooperate kare encourage kare aur parinaam kee nahee prayaas kee prashansha kare

HARI SHARMA said...

IT IS SIMPLE TO VE GREAT
BUT
IT IS GREAT TO BE SIMPLE

अनूप शुक्ल said...

अद्भुत, असाधारण पोस्ट्। बहुत अच्छा लगा इसे पढ़्कर। आपके मेहनती बच्चे के लिये जिन्दगी में सफ़लता के लिये शुभकामनायें।

सुभाष कान्डपाल said...

अनीता जी बहुत दिनों के बाद टिपण्णी करने का समय मिला है . आपने अपनी लेखनी से बहुत अच्छी बात कही है.

mamta said...

हम अभी आप वाले दौर से गुजर रहे है। मतलब साधारण से।

बहुत अच्छा और सरल शब्दों मे आपने लिखा है।

PD said...

जी, आप मेरा e-mail address ले लीजिये.. मैं आपके मेल का इंतजार करूंगा...
prashant7aug@gmail.com

पुनीत ओमर said...

wakai me sochne par vivash kiya aapne. waise socha to is bare me pahle bhi tha ki kya gujarti hogi aise parents ke dil par. shukr hai ki maine apne mata-pita ko is bare me jyada sochne ka mauka nahin diya.
anita ji, is vishay me kahne ke liye vakai me kuchh hai mere pas, aur puchhne ke liye bhi, par shayad comments me akar use likhna uchit na hoga. jaldi hi apko mail likhunga. apne bete ko ekdam safal aur khushhal jivan dene ke liye apko badhaiyan.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत खूब। कहने को तो ये आपके बेटे से जुडी एक घटना है, पर आपने इसे जिस प्रकार से शब्दों से बांधा है, वह अदभुत है।
ऐसी पोस्ट पर इतने कमेंट होने भी चाहिए। रचना और ढेर सारे कमेंटस के लिए ढेर सारी बधाई।