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सुस्वागतम

आपका हार्दिक स्वागत है, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।

December 11, 2011


जुड़ी एक और कड़ी

मनीष कुमार का जब मेल मिला कि वो अपने कॉलेज में ब्लोगिंग पर सेमिनार करने जा रहा था तो सिद्धार्थ जी के वर्धा में करवाये सेमिनार की सुखद यादें ताजा हो गयीं। फ़िर ये सेमिनार तो हमारे घर से महज 50 कि मी की दूरी पर हो रहा था। जाना तो तय था।
सिद्धार्थ जी का फ़ोन आया कि हम आप के शहर आ रहे हैं आप शहर में ही होगीं या कहीं बाहर । बत्तीसी पूरी बाहर आ गयी, हमने कहा हम न सिर्फ़ शहर में होगें बल्कि सेमिनार में भी आयेगें और आप घर पर भी आइएगा। दर असल वर्धा जाने से पहले सिद्धार्थ जी मेरे लिए एक सिर्फ़ नाम भर थे, एक अजनबी, लेकिन उनकी और उनकी पत्नी की आत्मियता और मेजबानी ने ऐसा जादू डाला कि जब तक हम वर्धा से वापसी की ट्रेन पर बैठे हमें लगा हम अपने छोटे भाई के घर से वापस जा रहे हैं। खुशी तो होनी ही थी।

पता चला शैलेष भारतवासी भी आ रहा है। हमने सोचा लगे हाथों हम भी अपने कॉलेज के बच्चों के लिए एक छोटी सी वर्कशॉप रख लें ब्लॉग कैसे बनाया जाता है सिखाने के लिए। प्रिसिंपल से बात की, बात आगे बड़ते बड़ते यहां तक पहुंची कि हम भी अपने कॉलेज में सेमिनार कम वर्कशॉप रख लें। हमने मनीष से बात की कि उसके रिसोर्स परसन हम इस्तेमाल कर लें तो कोई एतराज, उसने सहर्ष सहमति दे दी। तो निश्चित ये हुआ कि कल्याण का सेमिनार 9-10 दिसंबर को है और हम अपना सेमिनार 8 दिसंबर को रख लें। 

हमने अपना सेमिनार सुबह साढ़े आठ बजे से शाम के छ: बजे तक रखने का निश्चय किया। आठ की सुबह आठ बजे जब हम इंतजाम करने की आपा धापी में थे सिद्धार्थ जी का फ़ोन  आया। हमने पूछा कल्याण पहुंच गये क्या तो बोले नहीं हमारी तो ट्रेन छूट गयी अब हम प्लेन से आ रहे हैं शाम तक पहुंचेगें। उस समय डिटेल्स लेने का समय न था हमने कहा हम शाम को फ़ोन करेगें। शैलेष जिस दोस्त के घर ठहरा था वो दोस्त का घर मेरे घर से पांच मिनिट की दूरी पर था। खैर शैलेष दोपहर को अपने आप कॉलेज पहुंचा और शाम को हम साथ में वापस आये। अब हमने सिद्धार्थ जी को फ़ोन लगाया, करीब सात  बजे होगें। हमने कहा शैलेष भी यहीं है आप भी रवींद्र और अविनाश जी के साथ आ जाइए साथ में खाना खायेगें। उन्हों ने मन तो बना लिया लेकिन शायद गाड़ी का इंतजाम न हो पाया। उन्हों ने कहा ये निमंत्रण कल तक के लिए स्थगित कर दिया जाए। प्रस्ताव मान लिया गया और शैलेष अपने दोस्त के घर चला गया। अगले दिन वैसे भी शनिवार था, हमारे पति देव को ऑफ़िशली छुट्टी होती है मतलब उस दिन थोड़ा जल्दी ऑफ़िस से आ जाते हैं। हमने बता दिया कि हमारे वर्धा वाले मित्र आ रहे हैं, कहीं ऐसा न हो कि आप की वजह से हमें खाने की टेबल पर इंतजार करते रहना पड़े। जवाब में एक हल्की सी मुस्कुराहट मिली। 

हमें कभी कल्याण जाने का अवसर नहीं मिला था,क्या रूट लेना है इस बात को ले कर थोड़ी चिंता थी। पतिदेव ने पूरा रुट लिख कर दिया, साथ ही काफ़ी डरा दिया था - अगर वापसी में देर हो जाए तो शॉर्ट कट से मत आना, संकरी रोड है दो पहाड़ियों के बीच में, स्ट्रीट लाइट भी नहीं है, ट्रकों का ट्रेफ़िक मिलेगा। खैर हम चल दिए। 

वहां जा कर सिद्धार्थ जी, अविनाश जी, अशोक मिश्र जी, रवींद्र जी से मिल कर वर्धा मुलाकात को चाय की चुस्कियों के साथ ताजा किया जा रहा था कि रवि रतलामी जी दिख गये, वो दो साल पहले मेरे कॉलेज में सेमिनार में आ चुके थे, दो साल बाद उनसे मिल कर भी हम खुश हो रहे थे। शैलेष तो आते ही लाइव वेबकास्टिंग के चक्कर में व्यस्त हो गया और हम सब सबसे आगे वाले सोफ़ों पर पसर गये। हरीश अरोड़ा जी और केवलराम जी से मैं पहले नहीं मिली हुई थी, उनसे मिल कर भी ऐसा नहीं लगा जैसे पहली बार मिल रही हूँ। केवलराम तो बातचीत में इतने विनम्र रहे कि मुझे लगा अपने किसी छात्र से बात कर रही हूँ। 

मनीष ने नमस्कार करते ही कह दिया कि आप सिर्फ़ गप्पें नहीं मारेगीं आप को काम भी करना है। अब एक शहर के हैं, ब्लोगर बंधु हैं एक ही प्रोफ़ेशन के हैं तो इतना तो हक बनता है उसका। उसने हमें कहा कि आप को दोनों दिन की सभी सत्रों की रिपोर्टिंग करनी होगी। लो जी यहां भी कलम घसीटी। न नुकुर करने का तो सवाल ही नहीं उठता था

सिद्धार्थ जी ने लाइव सेमिनार की कमैंट्री देने के लिए अपना लैपटॉप संभाला और हमने कागज कलम्। हम दोनों के बीच में बैठे रवींद्र जी कभी लैपटॉप में झांकते तो कभी हमारी चलती कलम। जैसे ही मनीष ने मंच संभाला और बोलना शुरु किया हम समझ गये कि जिस तेजी से ये बोल रहा है हम उतनी तेजी से लिख नहीं पायेगें और रिपोर्टिंग में कुछ न कुछ जरूर छूट जायेगा। तो हमने जो कुछ बोला जा रहा था उसको उसी समय अंग्रेजी में अनुवादित कर लिखना शुरु कर दिया। रवींद्र जी अचरज में थे कि जिस धाराप्रवाह में बोला जा रहा है हम उसी धाराप्रवाह में उसे अनुवाद कर कैसे लिख रहे हैं। हमने कहा बाद में हम इसका फ़िर हिंदी अनुवाद कर रिपोर्ट लिखेगें। 

शाम को निकलते निकलते साढ़े पांच बज गये। वादे के मुताबिक सिद्धार्थ जी, रवींद्र जी और अविनाश जी को मेरे साथ घर चलना था, मेरी ही गाड़ी में। शैलेष तो था ही साथ में। अविनाश जी दांत के दर्द से पीड़ित थे, उन्हों ने आने से मना कर दिया। अब रवींद्र, सिद्धार्थ, शैलेष और मैं वहां से निकले, शाम के छ: बज गये थे। अंधेरा गहराने लगा था और हम में से किसी को रास्ता नहीं पता था, पूछ पूछ कर जाना था।

 साढ़े छ: बजे पतिदेव का फ़ोन आया मैं आ गया हूँ। हमें घर पहुंचने में कम से कम दो घंटे और लगने वाले थे, सब को जोरों की भूख लगी हुई थी। हमने पतिदेव से कहा कि वो हॉटेल से खाना ले आयें। जो जो सब्जी हमने लाने को कहा था वो उन्हें कुछ भी याद न रहा। खैर राम राम करते थकान से चूर हम सब करीब साढ़े आठ बजे घर पहुंचे। पता चला कि पति देव खाना तो ले आये लेकिन खास मेहमान नवाजी करने के लिए उन्हों ने चावल अपने हाथों से बनाने का निश्चय किया और जब हम पहुंचे तो वो चावल अभी बनाने जा रहे थे। जब तक चावल बनते भूख से अपना ध्यान हटाने के लिए सिद्धार्थ जी ने अपना कैमरा निकाल लिया और लगे लेने दनादन फ़ोटो पे फ़ोटो, कभी इधर की तो कभी उधर की, उस सागर की खाड़ी की भी जो कोहरे की वजह से नजर नहीं आ रही थी। फ़िश टैंक में जो मछलियां हैं उनके नाम क्या है इस बात पर रवींद्र जी और सिद्धार्थ जी में एक छोटी सी बहस चल पड़ी। इतने लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं ये देख कर मछलियां में उल्लासित हो कर नाचने लगीं। हमें तो किसी मछली की प्रजाति का नाम वाम पता नहीं, हमने कहा अगर मेरे पतिदेव से पूछने की गलती की तो फ़िर एक घंटे का लेक्चर निश्चित है बेहतर यही होगा कि खाना खाने के बाद पूछें। उन्हें हमारा आइडिया जंच गया और हम सब खाने की टेबल पर पहुंच गये। करीब दस बजे शैलेष ने कहा वो अपने दोस्त के घर वापस जाना चाहता है। हमने बहुत कहा कि भाई गप्पें लग रहीं हैं यही रह जाओ पर वो नहीं माना। 


खैर उसके जाने के बाद सिद्धार्थ जी हमारे कंप्युटर पर अपनी रेलवे की टिकट का प्रिंट आउट निकालने की जद्दो जहद करते रहे पर वैबसाइट प्रिंट आउट लेने ही न देती थी। कहती थी कागज बरबाद नहीं करना चाहिए, पेड़ बचाओ। मैं किचन संभालने चली गयी, इतने में रवींद्र जी नहा कर आये तो रेलवे की वैब साइट डर गयी और फ़ौरन अपनी मस्ती छोड़ प्रिंट आउट लेने की इजाजत दे दी। हम सब खूब हंसे। रवींद्र और सिद्धार्थ जी ने मेरे पतिदेव को भी ब्लोगर बनने के लिए उकसाया,हम तो कब से कह रहे हैं कि इस बिरादरी में शामिल हो जाओ। खैर वो इस शर्त पर मान गये कि कोई उन्हें ब्लोग बनाना सिखा दे और उस पर फ़ोटो अपलोड करना सिखा दे। देखें अब किस दिन उनका ब्लोग बनता है। हमने उन्हें ऑफ़र किया कि हमारा अंग्रेजी वाला ब्लोग वो ले लें। सिद्धार्थ जी और रवींद्र जी के अपने कमरे में जाने के बाद हम कंप्युटर पर बैठे, दूसरे दिन हमें प्रपत्र पढ़ना था और हमने आज के दिन में जो कुछ दूसरों को कहते सुना था उस से जुड़ी कुछ बातें उसमें जोड़ना चाह्ते थे। पी पी टी ठीक करते करते रात का एक बज गया। 


दूसरे दिन जब हम सेमिनार हॉल में पहुंचे तो यूनुस जी बैठे मिल गये और गप्पों का एक और दौर चल पड़ा। लोग तो मंच पर खड़े हो कर ब्लोगिंग के फ़ायदे गिनवा रहे थे पर हम तो मंच के सामने बैठे उन फ़ायदों को जी रहे थे। कभी सोचा न था कि ब्लोग मित्रों से मिलना इतना सुखद होगा कि वक्त कैसे गुजर गया पता ही न चला।  सुखद यादों के सिलसिले में एक कड़ी और जुड़ गयी। 

सेमिनार की रिपोर्ट परिकल्पना के लिए रवींद्र जी ने बुक कर ली है। इस लिए वो रिपोर्ट वहां देखने को मिलेगी एक दो दिन बाद्…।:)         

December 31, 2010

स्वागतम


अमूमन जब सुबह कॉलेज सवा सात बजे पहुंचते हैं तो इधर उधर देखने की फ़ुरसत नहीं होती, लपकते, फ़ांदते, हांफ़ते क्लास में भागे चले जाते हैं। पर कल की तो बात ही कुछ और थी। सुबह पौने आठ बजे पहुंचे, हलकी हलकी खुशनुमा ठंड में एक लंबी सांस ले ताजी हवा अपने नथुनों में भरनी चाही, नजर इधर उधर घुमायी तो पेड़ों के ऊपर सूरज धरती की बिंदिया सा चमकता नजर आया, एकदम गोल नारंगी। बम्बई में कब से इतनी ठंड पड़ने लग गयी कि सूरज महाराज आठ बजे आराम से हाजिरी बजा रहे हैं।

 
क्लास की तरफ़ मंथर गति से बढ़ते हुए ख्याल आया कि अरे! सर्दी को बम्बई में पसरे पूरा एक महीना होने को आया और हमने अभी तक घर आयी इस मेहमान का ठीक से स्वागत भी नहीं किया। मन में ठान लिया कि आज कुछ करना होगा लो जी ठंड में सरसों का साग और मकई की रोटी नहीं खायी तो ये तो सर्दी मैडम की तौहीन होगी। अरे, और कुछ नहीं तो कम से कम छिलकेवाली मूंगफ़ली तो ढूंढनी पड़ेगी। 


वापस लौटते हुए सोचा कि आज सब्जी मार्केट जाया जाए। सुना है आजकल सब्जी बहुत मंहगी हो रही है। सुना सिर्फ़ इस लिए है कि जब से शॉपिंग मॉल से सब्जी लेने का रिवाज चल पड़ा है तब से सब्जी वाले से तोलमोल करने का सुख छूट सा गया है।पतिदेव को शनिवार की छुट्टी होती है और शॉपिंग का जिम्मा अपने सर ले उन्हों ने हमारा काफ़ी बोझ कम कर दिया है। लेकिन इस आरामदेई के चलते पिछले कई महीनों से हम सिर्फ़ पत्ता गोभी, फ़ूल गोभी और शिमला मिर्च ही खा रहे हैं, वो भी कोल्ड सटोरेज की। लौकी की पतिदेव को एलर्जी है इस लिए छूते भी नहीं,टिंडों का न तो नाम सुना है उन्हों ने, न ही देखा है।


 पिछले हफ़्ते एक दिन खाना बनाने वाली नही आयी और हमने फ़ोन कर पति देव से कहा कि आते हुए किसी होटेल से कुछ लेते आयें। जनाब ने सोचा बीबी भी क्या याद करेगी, मक्की की रोटी और सरसों का साग ले चलते हैं, अपने लिए मुर्ग मुसल्लम। हम भी कृतार्थ हुए कि पतिदेव को कितना ख्याल है, जब खाने लगे तो रोटी से घी की धाराएं बह रही थीं, मुस्कुरा के बोले मैं ने खास बटरवाली मक्की की रोटी देने को कहा। हमने उनके इस बटरी लाड़ को प्लेट में निचोड़ते हुए एक कौर तोड़ा तो रोटी टूटती ही नहीं थी, रंग तो पीला ही था पर पता नहीं रोटी मैदे की थी या कोई अमरीकन मकई की। हाँ उसके साथ गाजर का हलवा जो लाया गया था वो बढ़िया था।   
  
सब्जी मार्केट में घुसने से पहले तय किया गया कि रौशन की दुकान पे जायेगें मक्की का आटा उसकी दुकान का सब से अच्छा होता है( और कोई दुकान हमें पता भी नहीं) दुकान में घुसे तो लगा पूरा पंजाब वहीं समाया हुआ है, मक्की का आटा, आटे के बिस्किट, सूजी के टोस्ट, गुड़ की चिक्की, अदरक की कतरनें सिरके में और पता नहीं क्या क्या लेते चले गये। वहां से निकले तो सोच में थे कि सब्जी मार्केट का रुख करें या उसके पहले ही सिगनल से मुड़ लें। असमंजस पार्किंग की वजह सा था, ज्यादातर सब्जी मार्केट के बाहर कार पार्क मिलना मुश्किल होता है, खैर आज तो मन बना ही लिया था, सो ओखली में सर देने को तैयार हो लिए। मेरी किस्मत अच्छी थी जो सब्जी मार्केट के बाहर दो मोटरसाइकलों के बीच कार मुश्किल से घुसा सके। थोड़ी कम ही सही पर जगह मिल गयी यही क्या कम था। मार्केट की शुरुवात में ही बड़े बड़े अमरुद देख कर मन ललचा गया, संतरे के दाम पूछे तो पता चला दस दस रुपये का एक संतरा और अमरूद तीस रुपये किलो। खैर अमरूद ले कर वहीं कार में डाले और वापस आये। लौकी, मैथी लेने का मन था। मैथी की दुकान पर पहुंचे तो एक महिला कह रही थी," भैया एक जूड़ी सरसों और एक जूड़ी पालक दे दो"। उसकी देखा देखी हमने भी सब्जी वाले से वही मांगा, दोनों जूड़ी दस दस रुपये, पतली पतली मूलियां दिखीं- पांच रुपये की एक्। सोचा सर्दियों में मूली के परांठे भी खाने जरूरी हैं, सो तीन मूलियाँ खरीदीं गयीं। उम्मीद थी कि मार्केट के अंदर सब्जी थोड़ी वाजिब दामों पर मिलेगी, लेकिन यहां भी लौकी मिली पच्चीस रुपये किलो, मुए कांटे वाले बैंगन भी पच्चीस रुपये थे। टमाटर साठ रुपये थे तो मटर पच्चीस रुपये किलो। 


खैर सब्जी ले कर जब हम वापस आये तो देख कर हैरान रह गये कि एक लंबी सी कार ठीक हमारी कार के पीछे लगी हुई है और ड्राइवर नदारत। इंतजार करते करते आधा घंटा गुजर गया। जैसे जैसे सूरज गरम होता जा रहा था और पेट में चूहों का क्रिकेट मैच शुरु हो गया हमारा पारा उसी रफ़्तार से ऊपर की तरफ़ छलांग लगा रहा था। मन तो कर रहा था कि इस नयी नवैली कार को लंबा सा स्क्रेच मार दें पर किसी तरह से खुद को ऐसा करने से रोक लिया। हम सोच ही रहे थे कि टो करने वाली गाड़ी आ जाए कि इतने में टो करने वाली गाड़ी आती दिखी, हम भाग कर उसके पास गये और बोले इस गाड़ी को टो कर के ले जाओ। ट्रेफ़िक कासंटेबल बड़ा हैरान था, ज्यादातर लोग बोलते है जाने दो, छोड़ दो, और यहां हम कह रहे थे कि आओ हम बताते है कौन सी गाड़ी नियम के खिलाफ़ पार्क कर खड़ी है। कांसटेबल ने फ़ट से टायर को लॉक लगवाया और हमारी गाड़ी निकलवाने का इंतजाम कर ही रहा था कि उस पकड़ी हुई गाड़ी का मालिक आ गया, और जैसी उम्मीद थी कहने लगा 'जाने दो'। हम लपक कर हवलदार के पास पहुंचे और धमकाते हुए बोले कि अगर उसने उस गाड़ी को जाने दिया तो हम उसके खिलाफ़ शिकायत दर्ज कर के आयेगें अभी के अभी और फ़ट से हवलदार का नाम और गाड़ी का नंबर नोट किया। गाड़ी की मालकिन हमें गालियां देने पर उतर आयी, उस कार के ड्राइवर ने किसी को फ़ोन लगा कर हवलदार की तरफ़ बढ़ा दिया। हवलदार के चेहरे का रंग बदलने लगा। हम समझ गये कोई नेता फ़ेता होगा, पर हम फ़िर भी हवलदार के सामने अड़े रहे कि चाहे किसी का भी फ़ोन हो तुम चालान काटो नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं। बेचारे के सामने कोई रास्ता नहीं था, वो हमसे भी डर रहा था कि हमने उसका नाम वगैरह नोट कर लिया है और हमारे लिए रास्ता बन जाने के बावजूद अब हम वहां से जाने को तैयार न थे। खैर उसने चालान दिया।रात को हमने बड़े मजे लेते हुए जब पतिदेव को पूरा किस्सा बताया तो बोले
"तुम कब दुनियादारी सीखोगी?"
 हमने पूछा "क्युं हमने कुछ गलत किया?"
"नहीं तुम सही थीं, लेकिन वो हवलदार तुम्हें उल्लु बना गया।"
"वो कैसे?"
बोले "उसने उस ड्राइवर का लाइसेंस लिया था?'
हमने यादाश्त पर जोर डालते हुए कहा ," हाँ लिया तो था पर देख कर वापस कर दिया"
बोले " तो फ़िर उस चालान का क्या मतलब?"
एक बार फ़िर मेरा पारा उछाल मारने लगा, निश्चय किया कि कल ही चौकी जा के उस हवलदार की खबर लूंगी, लेकिन थोड़ी देर बाद ही सोचा कि क्या फ़ायदा है, अब शायद वो हमें पहचानने से भी इनकार कर दिया, बेकार में अपनी ऊर्जा बेकार करने का कोई मतलब नहीं सो पूरे किस्से को जहन से उठा के बाहर फ़ैंक दिया।

वैसे इससे याद आया कि पिछले महीने मानखुर्द के सिगनल पे हमें ट्रैफ़िक हवलदार ने पकड़ा, हमने बड़ी रुखाई से कहा कि हमने सिगनल नहीं तोड़ा। लाइसेंस दिखाने को कहा तो हमें आदतन लाइसेंस में पचास का नोट रख कर दे दिया। ट्रैफ़िक हवलदार लड़का सा था, अभी अभी नौकरी पर लगा था। हमारे पचास रुपये देने पर बहुत आहत हुआ। पहली बार हम हवलदार देख रहे थे जो कह रहा था कि मुझे पचास रुपये नहीं चाहिए, आप मेरी वर्दी की इज्जत करें बस यहीं चाहते हैं।उसने न सिर्फ़ रिश्वत लेने से इंकार कर दिया बल्कि हमारा चालान भी नहीं काटा क्युं कि हमें नहीं लग रहा था कि हमने सिगनल तोड़ा। मन में बहुत आत्मग्लानी हुई। उस समय तो हम चले गये, देर हो रही थी। लेकिन बाद में जब हमने पूरे वाक्ये पर फ़िर से विचार किया तो लगा कि हमारी रुखाई और झुंझालाहट का असली कारण था कि हम जल्दी में थे और उसने हमें रोक लिया था, और हो सकता है कि सिगनल जंप किया ही हो। सो अगले दिन उसी समय हम फ़िर उस चौराहे पर गये, ये सोच के कि वो वहीं मिलेगा पर दूसरे दिन कोई और हवलदार खड़ा था। हमने पूछा "
वो कल वाला हवलदार कहां गया?"
 तो बोला "कौन सा हवलदार?"
"अरे वही जो जवान सा था।"
उसे हमारा जवाब बिल्कुल अच्छा नहीं लगा
" मैडम जवान तो हम सभी हैं"
हम कुछ कहते इतने में एक दूसरा हवलदार आ गया जो कल वाले का साथी लग रहा था। उसने पूछा कि हमें क्या काम है? हमने कहा कि कलवाले हवलदार से हमने ठीक से बात नहीं की थी और इस बात का हमें अफ़सोस है और हम उस से माफ़ी मांगने आये हैं।
उस दूसरे हवलदार की बत्तीसी खिल गयी कहने लगा,
" अरे मैडम कोई बात नहीं, हमारा पाला तो सभी तरह के लोगों से पड़ता है, हमें अब कोई फ़रक नहीं पड़ता"
हमारे फ़िर भी जोर डालने पर उसने कहा कि शायद उसकी ड्यूटी अगले चौराहे पर है, वैसे मैं आप का मैसेज दे दूंगा। हम अगले चौराहे तक घूम आये पर वो हवलदार हमें नहीं मिला, आशा कर रही हूँ कि मेरा माफ़ीनामा उसके पास पहुंच गया होगा।

खैर, तो शाम को सरसों का साग बनाने का प्रोग्राम था। बहुत दिन हो गये थे, याद नहीं आ रहा था सरसों का साग कैसे बनाते हैं, यादाश्त में सिर्फ़ मां के हाथ कुकर में मदानी चलाते नजर आ रहे थे बाकि कुछ याद नहीं आ रहा था। खुद को कोसा कैसी पंजाबन हूँ मैं, कोई सुनेगा तो क्या सोचेगा? जिसका कोई नहीं उसका नेट तो है ही:) सो नेट पर रेसिपी देखी, संजीव कपूर की रेसिपी---न न बेकार लगी, यू ट्युब पर गये और वाह रे वाह डॉट कॉम की रेसीपी अच्छी लगी, साग बहुत अच्छा बना। रात को पति देव से कहा पालक बनायी है, लेकिन वो कहां झांसे में आने वाले थे। 

बाजार में कहीं भी फ़ीका मावा न मिलने के कारण कल गाजर का हलवा नहीं बन सका। आज भी कहीं नहीं मिला, तब दिमाग की बत्ती जली कि भैया फ़ीका मावा मिलेगा भी नहीं, अरे उसी मावे की बर्फ़ी बना के हलवाई कम से कम दो सौ चालिस रुपये किलो के हिसाब से बेचेगा जब कि फ़ीका मावा वो किस भाव से बेच लेगा? सो शाम को बिन मावे के गाजर का हलवा बनाया, जय नेसले कंडेस्ड मिल्क्। ऑफ़िस से आते ही पतिदेव सीधा सुगंध का पीछा करते किचन में और हलवा के आनंद उठाते हुए बोले अच्छा बना है। हमने मुस्कुरा के मन में कहा,
जय शीत देवी आप का स्वागत है। 
आप सब को नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं
       
    

December 27, 2010

' धूप की कचहरी' मे हाजिर हों---2


कहते हैं कि बोलने वाले अक्सर दूसरों को सुन नहीं सकते, सिर्फ़ अपनी ही हांकते रहते हैं। यही हाल हम टीचरों का है, किसी और के भाषण में अपनी आखें खुली रखना बहुत मुश्किल होता है। तो जब श्रीमाली जी ने पहले वक्ता को बुलाया, हमने मन ही मन गिनना शुरु कर दिया कि मंच पर कितने वक्ता हैं और कितना समय बोलेगें। पहली ही पंक्ति में बैठ कर कहीं हमारी आखें बंद न होने लगें इस लिए एक कप चाय भी गटक लिए। दिमाग कहने लगा कि जब तुम्हें मालूम हैं कि दूसरों का भाषण शुरु होते ही तुम्हारी आखें बंद होने लगती हैं तो एकदम आगे बैठने की क्या जरूरत थी? क्या करें आदत से मजबूर है, बड़ी पुरानी बिमारी है आगे ही बैठने की। 

पहले वक्ता तो ठीक ठाक ही थे, फ़िर आयीं राजम जी जिनका जिक्र मैं पिछली पोस्ट में कर चुकी हूँ। उन्हें सुनना तो सुखद था ही, उनके बाद आये नंदलाल पाठक जी। हमें आश्चर्य तब हुआ जब उनके भी भाषण में हमारी पलक तक न झपकी। वो बोलते जा रहे थे और मैं सोच रही थी कि उनकी बातें हमारे ब्लोग जगत पर भी कितनी सटीक बैठती हैं।


उन्हीं के शब्दों में हिंदी कविता अब केवल हिंदी भाषाभाषी क्षेत्रों में नहीं लिखी जाती। बाढ़ की नदी की तरह देश और विदेश में दूर दूर तक फ़ैल गई है। बाढ़ के साथ पानी मटमैला भी हो जाता है। समालोचना जगत, प्रकाशन क्षेत्र, पत्रकार वर्ग सभी इससे प्रभावित हैं। काव्य मंचो पर अलग छीना झपटी चल रही है। कुछ समर्थ कवियों ने समीक्षकों के रूप में चारण पाल रखे हैं। कुछ पत्र पत्रिकाओं ने कुछ कवियों को गोद ले रखा है। ऐसे में मूल्यांकन का प्रश्न दलबंदी के दलदल में फ़ंस गया है……पुरस्कारों पर कुंडली मारे विषधर बैठे हैं। सारे जीवन का राजनीतिकरण हो गया है। हम अब व्यक्ति नहीं, वोटर ही वोटर हैं। राजनीति का काम है बांटना और वह अपना काम बड़ी तन्मयता से कर रही है…।


मुझे वर्धा में ब्लोगिंग में आचार सहिंता पर हुए सेमिनार की, हाल ही में हुए ब्लोगजगत में हाल ही में हुए विवादों की याद आ रही थी। नींद कैसे आती?

और अब चलते चलते, कुमार शैलेंद्र जी की एक और कविता

कबिरा बैठा लिए तराजू
कबिरा बैठा लिए तराजू, तौल रहा दुनियादारी।
जो भीतर से जितना हल्का, बाहर से उतना भारी॥

जो कबिरा को ही न जाने, खुद को भी कैसे पहचाने।
राम झरोखे बैठ कर देखे- दीन-धरम मज़हब के झगड़े,
पंडित मुल्ला व्यापारी॥

दर्शन के बाजार बड़े हैं। नीचे गिर कर लोग खड़े हैं।
मान मिले ईमान बेचकर- पूजा, वंदन या अभिनंदन,
सभी समर्पण बाज़ारी॥

नेकी तो बस बंजारा है, बदी आज का ध्रुवतारा है।
काग़ज से हल्की है काया दस से कहीं बड़ी है छाया,
गौरव गाथा अखबारी॥

बचपन बिकता, यौवन बिकता, अपनों का अपनापन बिकता
हर पलड़े पर सिक्का भारी- खुद सौदा, खुद ही सौदागर,
हम रिश्तों के व्यापारी॥