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December 27, 2010

' धूप की कचहरी' मे हाजिर हों---2


कहते हैं कि बोलने वाले अक्सर दूसरों को सुन नहीं सकते, सिर्फ़ अपनी ही हांकते रहते हैं। यही हाल हम टीचरों का है, किसी और के भाषण में अपनी आखें खुली रखना बहुत मुश्किल होता है। तो जब श्रीमाली जी ने पहले वक्ता को बुलाया, हमने मन ही मन गिनना शुरु कर दिया कि मंच पर कितने वक्ता हैं और कितना समय बोलेगें। पहली ही पंक्ति में बैठ कर कहीं हमारी आखें बंद न होने लगें इस लिए एक कप चाय भी गटक लिए। दिमाग कहने लगा कि जब तुम्हें मालूम हैं कि दूसरों का भाषण शुरु होते ही तुम्हारी आखें बंद होने लगती हैं तो एकदम आगे बैठने की क्या जरूरत थी? क्या करें आदत से मजबूर है, बड़ी पुरानी बिमारी है आगे ही बैठने की। 

पहले वक्ता तो ठीक ठाक ही थे, फ़िर आयीं राजम जी जिनका जिक्र मैं पिछली पोस्ट में कर चुकी हूँ। उन्हें सुनना तो सुखद था ही, उनके बाद आये नंदलाल पाठक जी। हमें आश्चर्य तब हुआ जब उनके भी भाषण में हमारी पलक तक न झपकी। वो बोलते जा रहे थे और मैं सोच रही थी कि उनकी बातें हमारे ब्लोग जगत पर भी कितनी सटीक बैठती हैं।


उन्हीं के शब्दों में हिंदी कविता अब केवल हिंदी भाषाभाषी क्षेत्रों में नहीं लिखी जाती। बाढ़ की नदी की तरह देश और विदेश में दूर दूर तक फ़ैल गई है। बाढ़ के साथ पानी मटमैला भी हो जाता है। समालोचना जगत, प्रकाशन क्षेत्र, पत्रकार वर्ग सभी इससे प्रभावित हैं। काव्य मंचो पर अलग छीना झपटी चल रही है। कुछ समर्थ कवियों ने समीक्षकों के रूप में चारण पाल रखे हैं। कुछ पत्र पत्रिकाओं ने कुछ कवियों को गोद ले रखा है। ऐसे में मूल्यांकन का प्रश्न दलबंदी के दलदल में फ़ंस गया है……पुरस्कारों पर कुंडली मारे विषधर बैठे हैं। सारे जीवन का राजनीतिकरण हो गया है। हम अब व्यक्ति नहीं, वोटर ही वोटर हैं। राजनीति का काम है बांटना और वह अपना काम बड़ी तन्मयता से कर रही है…।


मुझे वर्धा में ब्लोगिंग में आचार सहिंता पर हुए सेमिनार की, हाल ही में हुए ब्लोगजगत में हाल ही में हुए विवादों की याद आ रही थी। नींद कैसे आती?

और अब चलते चलते, कुमार शैलेंद्र जी की एक और कविता

कबिरा बैठा लिए तराजू
कबिरा बैठा लिए तराजू, तौल रहा दुनियादारी।
जो भीतर से जितना हल्का, बाहर से उतना भारी॥

जो कबिरा को ही न जाने, खुद को भी कैसे पहचाने।
राम झरोखे बैठ कर देखे- दीन-धरम मज़हब के झगड़े,
पंडित मुल्ला व्यापारी॥

दर्शन के बाजार बड़े हैं। नीचे गिर कर लोग खड़े हैं।
मान मिले ईमान बेचकर- पूजा, वंदन या अभिनंदन,
सभी समर्पण बाज़ारी॥

नेकी तो बस बंजारा है, बदी आज का ध्रुवतारा है।
काग़ज से हल्की है काया दस से कहीं बड़ी है छाया,
गौरव गाथा अखबारी॥

बचपन बिकता, यौवन बिकता, अपनों का अपनापन बिकता
हर पलड़े पर सिक्का भारी- खुद सौदा, खुद ही सौदागर,
हम रिश्तों के व्यापारी॥   

7 comments:

Suresh Chiplunkar said...

कविता अच्छी लगी…

वर्धा का "भूत" अभी भी पीछे लगा हुआ है… :) :)

यह तो बहुत छोटा था, सो बोर होने का सवाल ही नहीं था… अब फ़िर अगले लेख का इंतज़ार करते हैं… :)

प्रवीण पाण्डेय said...

जिनको बोलने की पड़ी है, उन्हें सुनने का समय नहीं।

MANVINDER BHIMBER said...

bahut din baad aapko padane ka mouka mila ......laga mai aapke paas hi hun or "dhoop ki kachahri" ko khangaal rahi hun ......maja aa gya ....

बी एस पाबला said...

अरे! पढ़ना शुरू किया और खत्म!! बोर होने ना होने का ऑप्शन ही नहीं रहा :-)

vinay said...

यह बात तो अच्छी लगी हिन्दी साहित्य का प्रचार देश,विदेश में हो गया है,लेकिन अक्सर हिन्दी में पुरुसकार और उपाधि पाने के लिये एक होड़ सी लगी रहती है,अब कहां वोह निर्मल समालोचना वस युं कहिये केवल आलोचना ।

Sanjeet Tripathi said...

llo ji aap par to wardha se jyada bore wala bhoot lagaa hua hai, aap ko is bhoot ne kahan pakad liye aur ye guman kyn ho gaya ki aapka likha padh kar ham pathak bore honte hain, dekho suresh ji ne pichhli post me shikayat ki thi thi na ki aap itni der se kyn post daal rahi hain blog par to use hi satya mana jaye bas,

kavita pasand aai....

GirishMukul said...

जन्म दिन मुबारक हो