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July 04, 2008

नकुल: भाग 4

नकुल: भाग ४
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इस चौथे किस्त में आपको यह बताना चाहता हूँ कि समाज सेवा और पर्यावरण रक्षा के क्षेत्र में नकुल की क्या भूमिका रही।
मैं नहीं सोचता कि उसने यह सब इस छात्रवृत्ति हासिल करने कि लिए किया था क्योंकि इन गतिविधियों में बहुत पहले से वह सक्रिय था।हाँ, बाद में उसे अवश्य लाभ हुआ।
समाज सेवा
करीब तीन साल पहले अचानक एक दिन वह एक भारी भरकम lap top घर ले आया। मैंने सोचा अपने किसी दोस्त का laptop उठाकर लाया है कुछ दिनों के लिए । लेकिन कुछ दिन बाद मैंने नोट किया वह लैपटॉप उसके पास अब भी है और घर में उसका उपयोग कभी करता नहीं था। उसके बारे में पूछा तो पता चला कि यह लैपटॉप किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की संपत्ति है (Microsoft ? या IBM? ठीक से याद नहीं) और अमानती तौर पर उसके पास कुछ समय के लिए रहेगा एक खास प्रोजेक्ट के सिलसिले में। शुरू शुरू में उस प्रोजेक्ट के बारे में वह बहस नहीं करना चाहता था हम लोगों के साथ शायद यह सोचकर के हम लोग इसका अनुमोदन नहीं करेंगे। वह शायद सोचता था कि हम उसको अपनी पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान देने को कहेंगे ।
"नकुल अण्णा"
प्रोजेक्ट था Spreading computer awareness among the children of under privileged sections of society।
नकुल इस प्रोजेक्ट में स्वयंसेवक बन गया था। इस काम के लिए उसे कुछ निर्धारित समय देना पढ़ता था और इसके लिए कंपनी उसे बदले में कुछ नहीं देती थी। हमारे घर से करीब एक किलोमीटर दूर, किसी स्लम जैसी एक कोलोनी में जाकर, वहाँ अति निम्न-वर्गीय जाती और झुग्गी झोपडियों में रहने वाले बच्चों को कंप्यूटर सिखाता था। सप्ताह में कोई तीन या चार घंटे समय निर्धारित किया था। किसी समाज सेविका से जुडकर, और इस झुग्गी कोलोनी के मुखिया की अनुमति लेकर, वहाँ एक अलग साफ़ सुथरा स्थान का इन्तजाम हुआ जहाँ बिजली का इन्तज़ाम भी हो गया। इन गरीब बच्चों को (१० से लेकर १६ साल तक और जो सरकारी स्कूलों में पढते थे) कंप्यूटर का मूल ज्ञान देने लगा। बहुत ही छोटे बच्चों को PC Paintbrush के बारे में बताकर, उनको mp3 संगीत सुनाकर, विडियो क्लिप्स दिखाकर उनका मनोरंजन करता था और बडे बच्चों को फ़ाईल मैनेजमेंट, Word, Excel, वगैरह के बारे में बताने लगा।
बच्चे बडे चाव से यह सब सीखने लगे थे और जब भी वह वहाँ जाता था सारे मुहल्ले में उसका जोरदार स्वागत होता था और बहुत ही छोटे बच्चे तो "नकुल अण्णा" "नकुल अण्णा" (नकुल भाई) पुकारते पुकारते उसके पीछे पीछे भागते आते थे।
मुझे बाद में पता चला इसके बारे में और एक दो बार मैं भी उसके साथ चलकर देखा वहाँ का माहौल । मुझे आश्चर्य हुआ। कितने प्यार से यह बच्चे उसका स्वागत करके और कितने चाव और रुचि के साथ उससे सीखते थे। बच्चों की लाइन लग जाती थी कंप्यूटर पे हाथ चलाने के अवसर के लिए। महिलाएं कमरे के बाहर खडी होकर खिड़कियों से अन्दर झाँककर देखती रहती थी अपने अपने बच्चे क्या सीख रहे हैं। मर्द तो हमारे लिए चाय-नाश्ता का इन्तजाम करने में लग जाते और कमरे के बाहर की भीड का नियंत्रण करने में लगे रहते थे। हम दोनों को एक अलग ही दुनिया का अनुभव हुआ।
आजकल बैंगलौर में इस श्रेणी के लोगों के बच्चे शिक्षित बनते जा रहे हैं।हर महीने के अंत में नकुल कंपनी के कुछ अफ़सरों और इस इलाके की समाज सेविका को रिपोर्ट करता था। प्रोजेक्ट कई महीनों तक चला था और अंत में नकुल को एक विशेष समारोह में बुलाकर उसे बधाई पत्र और सर्टिफ़िकेट देकर उसका सम्मान किया गया। इस नेक काम, बिना पूर्व योजना बनाए हुआ, सेलेक्शन में बहुत ही उपयोगी साबित हुआ।
उसका संगीत प्रेम भी कमैटी ने नोट किया था। संगीत विद्यालय में स्वयं उच्च शिक्षा पाने के साथ साथ, वह नवागुन्तों को और बच्चों को संगीत सिखाता था इसी विद्यालय में जिसके कारण इस विद्यालय से भी प्रमाण पत्र मिला था।
GreenPeace
पर्यावरण के संबन्ध में उसके कुछ निबन्ध छपे थे। वह GreenPeace का सक्रिय सदस्य था और कई seminars में उसने भाग लिया था।जब भी GreenPeace को अपने काम में स्वयंसेवकों की आवश्यकता थी, वह सामने आ जाता था। इसके भी प्रमाण पत्र थे उसके पास।
बिना योजना बनाए हुए ही, और अन्जाने में ही, उसकी गतिविधियाँ इस छात्रवृत्ति के लिए एक किस्म की तैयारी बन गई जो ऐन वक्त पर बहुत काम आया था।
इसके अलावा अंतिम साक्षातकार से पहले उसे एक निबन्ध लिखना पढ़ा था। विषय था क्यों वह अपने को इस छात्रवृत्ति के लिए योग्य समझता है। इस निबन्ध पर सेलेक्शन कमैटी से बहस होती है। बड़ा कठिन विषय है। कैसे बिना डींग मारे, विनम्रता और आत्मविश्वास के साथ उसने अपने को योग्य ठहराया था, यह निबन्ध पढ़ने सी ही ज्ञात होगा।
मैं कोशिश करूँगा नकुल से निबंध की एक प्रतिलिपी पाने की। चालाकी से हासिल करना पढ़ेगा। उस समय पढ़ा था इस निबन्ध को और अब मेरे पास उसकी प्रतिलिपी नहीं है। मैं तो बहुत प्रभावित हुआ था इस लेख को पढ़कर और मौका पाकर आप सब को भी पढ़वाऊँगा।
इस पोस्ट के साथ मैं कुछ तस्वीरें पेश कर रहा हूँ जो मेरे पास तैयार हैं।बहुत कुछ इसपर लिखा जा सकता है पर मैं समझता हूँ अब इस लेख को समाप्त करूँ। जो रुचि रखते हैं और मुझसे सीधे संपर्क करके पूछते हैं उनको और आगे कुछ बता सकूँगा जो बहुत ही व्यक्तिगत है और ब्लॉग पर छापना शायद आप लोगों की राय में मुनासिब न होगा।
यहाँ इसके बारे में इतना ही बताना काफ़ी है कि पिछले ८ साल से, मेरे पेशे से संबन्धित मैं कुछ अंतरराष्ट्रीय ई मेल चर्चा समूहों का सदस्य हूँ और कभी कभी विषय से हटकर हम इधर -उधर की बातें भी करते हैं। मेरे करीब सौ अन्तरराष्ट्रीय मित्र होंगे जिनसे मैं इस चर्चा समूह के बाहर, सीधा संपर्क करके non - technical और व्यक्तिगत बातें भी करता हूँ। यह पत्र व्यवहार अंग्रेज़ी में होता है। मैंने नकुल के बारे में यह खुशखबरी सब को दी थी।उत्तर में संसार के कोने कोने से, जान पहचान वालों और कुछ अज़नबियों से भी मुझे उत्तर प्राप्त हुआ जो शायद पठनीय हो। अगर आप लोग ठीक समझते हैं तो इस श्रृंखला में एक और किस्त जोड़ सकता हूँ और इन उत्तरों का सार छापता हूँ। अन्यथा इस कहानी को मैं यहीं समाप्त कर रहा हूँ।
अनिता जी को विशेष धन्यवाद देना चाहता हूँ। न सिर्फ़ उन्होंने इस विषय का चयन किया था बल्कि मुझे प्रोत्साहित भी किया कि इस विषय पर विस्तार से लिखूँ। वह आश्वासन भी देती रही कि यह विषय रोचक और पठनीय है। ब्लॉग जगत में अब तक मेरा कोई ठिकाना नहीं है और निकट भविष्य में होगा भी नहीं । इधर - उधर यायावर बनकर भटकता हूँ और Nukkad।info के पंकज बेंगाणी, ज्ञानदत्तजी और अनिता कुमार जी जैसे मित्रों का अतिथि बनकर काम चला लेता हूँ।और अंत में, इस लेख के सभी पढ़ने वालों और टिप्प्णी करने वालों को भी मेरा हार्दिक धन्यवाद।
गोपालकृष्ण विश्वनाथ,
जे पी नगर,
बेंगळूरुई
मेल आई डी:gvshwnth AT याहू डॉट कॉम
geevishwanath AT जीमेल डॉट कॉम

कुछ तस्वीरें
































8 comments:

महेन said...

विश्वनाथ जी।
प्रतीक्षा थी इस कड़ी की बेसब्री से। एक निवेदन है कि जल्दी न करें, विस्तार से न सही, मगर थोड़ी बहुत कांट छांट करके ही और भी बताएँ। हाँ जो बातें आपको लगता है ब्लोग पर डालना उचित नहीं उनको जानने के लिये आपका घर मेरे घर से ज़्यादा दूर नहीं है। और हाँ उसके निंबंध का इंतज़ार रहेगा।
शुभम।

PD said...

जी कोई और चाहे ना चाहे पर हम तो जरूर चाहते हैं आगे देखना पढना.. :)

प्रभाकर पाण्डेय said...

नमस्कार। बहुत ही उल्लेखनीय और काम की जानकारी परोस रहे हैं आप। लिखते रहिए। धन्यवाद।

Gyandutt Pandey said...

यह सीरीज बहुत अच्छी लगी नकुल के विषय में पढ़ कर। और "नकुल अण्णा" वाला प्रसंद तो बहुत ही जमा।
जो विचार हम अपने मन में ही लिये रह गये, वह नकुल ने चरितार्थ किया।
नकुल को आशीष।

दिनेशराय द्विवेदी said...

अगली कड़ी जरूर जरूर चाहिए।

Lavanyam - Antarman said...

होनहार बिरवान के होत चिकने पात -
ये नकुल बेटे के हर कार्य और उप्लब्धि से जाहीर हो रहा है
बहुत अच्छा लगा उसके बारे मेँ पढना -
-लावण्या

Sanjeet Tripathi said...

शुक्रिया नकुल के बारे मे विस्तार से जानकारी देने के लिए।

सजीव सारथी said...

वाह बहुत खूब, आजकल आप के कलम में गजब का जादू भर गया है :)