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September 28, 2007

एक शाम-आय आय टी(मुम्बई) के नाम

एक शाम-आय आय टी(मुम्बई) के नाम


कुछ दिन पहले घूमते घामते मैं किसी विकास कुमार के ब्लोग पर पहुँच गयी। ब्लोग में विकास जी ने अपने स्कूल के दिनों की चर्चा करते हुए एक खेल के बारे में लिखा था, “कविताओं की अन्ताक्षरी”, बिल्कुल ऐसे ही जैसे गानों की अन्ताक्षरी”। इसे खेलने के लिए हिन्दी वर्णमाला को ध्यान में रखते हुए कई कविताएं कन्ठ्स्थ करनी पढ़ती थीं। उन्हों ने साथ में एक लिन्क भी दे रक्खा था उन कविताओं के संकलन का जो उन्हों ने बचपन में याद की थीं। ये पढ़ते ही हमारी आखें चमक उठीं। अभी अभी ‘हिन्दी दिवस समारोह’ मनाया गया था हमारे कोलेज में , ज्यादातर छात्र मराठी भाषी हैं इस लिए उतने बढ़े पैमाने पर नहीं मना पाए जितने बढ़े पैमाने पर मनाने की इच्छा थी। पर हमारे छात्र भी गीतों के, कविताओं के रसिया हैं। मन में ख्याल आया कि अगर हमें इस खेल के बारे में पहले से पता होता तो शायद ‘हिन्दी दिवस’ का समां कुछ और ही बधंता। वैसे इस बार की खास बात ये थी कि हमने आलोक पुराणिक जी के व्यंग लेख (अपनी पसंद के) प्रदर्शित किए थे( उनकी अनुमति से)और छात्रों की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। हमारे कोलेज के ज्यादातर छात्रों के पास घर पर क्मपुयटर की सुविधा नहीं है फ़िर भी वो आलोक जी के ब्लोग का नाम नोट कर रहे थे। तो अगर कहीं कविताओं की अन्ताक्षरी का आयोजन होता तो छात्र कितना आनंद उठाते, और हिन्दी साहित्य से छात्रों का सान्निध्य अपने आप बढ़ जाता ये सोच कर ही हम मुस्कुरा लिए।


विकास जी की पोस्ट के नीचे एक लिन्क था उनके एक वाणी नाम के समूह का। बिना एक क्षण गवाये हम उस समूह के सदस्य बन गये। बाद में हमें पता चला कि विकास जी आय आय टी (मुम्बई) के छात्र हैं चौथे वर्ष में । हिन्दी को प्रोत्साहन देने के लिए ही उन्होंने आय आय टी में ये समूह बनाया है और इस में 100 से ज्यादा सदस्य है लेकिन सब आय आय टी (बम्बई) के छात्र्। मैं शायद अकेली सदस्या हूँ जो
बाहर से हूँ( ये मुझे बाद में पता चला)। विकास जी हिन्द युगम के लिए कविताओं को अपनी अवाज़ से और आनंदमय बनाते हैं। इस समूह की एक खासियत ये भी है कि सदस्य बनते ही इ-मेल्स आने लगते हैं और कोई भी सदस्य किसी और सदस्य से जो कुछ भी कह्ता है वो बाकी के सभी सदस्य देख सकते हैं। तो सदस्य बनते ही हमें इनकी आपसी बातचीत से पता चला कि गणेश विसर्जन के दिन वाणी समूह ने एक काव्य संध्या का आयोजन किया है। मेरी तो बाछें खिल गयीं। इधर कई वर्षों से प्रत्य्क्ष कवि सम्मेलन का मज़ा नहीं लूट पाए थे, टी वी पर ही प्रसारित होते कवि सम्मेलन देख कर ही संतोष कर लेते थे। विकास जी से फ़ोन पर बात हुई, हमें ना जानते हुए भी उन्हों ने न सिर्फ़ सहर्ष आने का न्यौता दिया बल्कि निर्णायक का पद भी सौंप दिया।

हॉल में घुसते ही सामने एक लड़का बैठा दिखाई दिया, बड़े अट्पटे से बाल बनाए हुए, लोग धीरे धीरे आ रहे थे। थोड़ी देर में हम क्या देखते हैं, आलोक ने उसी अट्पटे बालों वाले लड़के को मंच संचालन का भार सौंप दिया। नाम है उसका मोन्टी, एक बार जो मोन्टी ने बोलना शुरु किया तो बस हम तो देखते ही रह गये, कमाल का सेंस ओफ़ हुम्यर है जनाब उसका, साफ़ जाहिर था कि वो एक मंजा हुआ रंगमंच का कलाकार होगा और बड़िया कवि भी । चुटकी लेने में उसने किसी को नहीं छोड़ा । हमें इतना मज़ा आया कि दूसरे दिन हम कोलेज में भी उसके सुनाये चुट्कले दूसरों के साथ बाटँ रहे थे।
हालांकि ऐसी कोई बन्दिश नहीं थी पर 90% छात्रों ने स्वरचित कविताएं सुनायी। ज्यादातर कवि प्रथम वर्ष के छात्र थे पर कविताओं की गुणवत्ता इतनी बड़िया थी कि लगा हम जैसे प्रतिशिष्ठ कवियों को सुन रहे हैं। पिछ्ले 25 सालों में सैकड़ों बार निर्णायक की भूमिका निभायी है पर ये काम कभी इतना मुश्किल नहीं लगा जितना इस शाम्। सब एक से बड़ कर एक, किसके नम्बर काटें और कहाँ काटें निश्चित करना इतना कठिन कभी नही था। आशिश ने अपनी कविता में मित्रता का गुणगान कर और छ्त्तीसगड़ का स्तुतिगान प्रस्तुत कर ऐसा भाव विभोर किया की सब के पांव थिरक उठे। नीरज ने समुद्र की लहरों से प्रेरित हो कर छोटी सी लहर के अस्तित्व के संघर्ष को जितने मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया वो सराहनीय था। हर रस की कविता का आंनद उठाने को मिला।
बहुत जल्द इन सबकी रचनाएं वाणी के ब्लोग पर होंगी। मोन्टी की लच्छेदार बातों का लुत्फ़ तो आप नहीं उठा पायेगें पर इनकी कविताओं का स्वाद तो चख ही पायेगें।

मेरे घर के पिछवाड़े प्रकाश पुंज है और मुझे उसकी झलक अब मिली वो भी हिन्दी की बदौलत । गर्व से मेरा माथा ऊँचा हो रहा है ये सोच कर कि ये हमारे देश का भाविष्य हैं, कौन रोक पायेगा भारत को विश्व नेता बनने से? हमने आय आय टी से सिलिकॉन वैली तक का सफ़र के बारे में सुना है ,पर अब जानते है कि तकनीकी क्षेत्र में ही नहीं साहित्य और कला के क्षेत्र में भी हम नये आयाम हासिल करने वाले हैं।वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी का प्रचार ऐसा होगा कि लोग फ़क्र से कहेगें मेरा बेटा हिन्दी माध्यम से पढ़ा है। तब शायद हमारे ‘हिन्दी दिवस’ का रूप एकदम अलग हो। क्या ये सपना हमारे जीवन काल में ही…………।
आमीन

September 13, 2007

आती क्या खंडाला


अर्पणा (जो ओर्कुट पर खुद को ऐपी कह्ती है) मुझे ठेल रही थी 10 सेप्टेंबर को खंडाला में होने वाले जमावड़े में आने के लिए। 40+ ऐंड रोकिंग कमयुनटि का ये दूसरा आयोजन था ऐसे जमावड़े काइस कम्युनटी की सदस्य होने के बावजूद मेरा वहाँ जाना कम ही होता है और मैं वहाँ से बहुत कम लोगों को जानती हूँअर्पणा मुझे समझा रही थी कि ज्यादातर लोग एक दूसरे को नहीं जानतेबम्बई से सब इंतजाम करने का जिम्मा उठाया था विजय ने, जो ओर्कुट पर खुद को भूत कहलवाता हैहमने उससे कभी बात नहीं की थी, पहली बार जब उसका स्क्रेप आया तो हमने ये कह कर रिजेक्ट कर दिया कि भूतों से हमें बहुत डर लगता है और हम सिर्फ़ जिन्दा लोगों से ही बात करते हैंबाद में पता चला कि वो 40+ रॉकर है तो जान में जान आयीखैर ऐपी के बहुत जोर देने पर हमने पतिदेव के सामने बात उठाईहमें पक्का विश्वास था कि एक लम्बा लेक्चर सुनना पड़ेगा ओर्कुट के खतरों के ले करवैसे भी मैं और मेरे पति ज़रा झेपू किस्म के बंदे हैपर मेरी हैरानी का ठिकाना रहा जब सिर्फ़ उन्होंने अपनी सहमति दिखायी बल्कि खुद भी साथ चलने को तैयार हो गयेउसी कम्युनटी में हमारे एक और मित्र हैं उदय जी-60 साल के, रिटायरड पर अभी भी प्रोफ़ेसरी का काम करते हैं, एकदम जिन्दादिल इन्सानइधर बहुत दिनों से उनसे बात नहीं हुई थीअचानक उनका स्क्रेप गया, “आती क्या खंडाला”, पढ़ते ही मेरी हंसी छूट गयीउनको तो मैंने जवाब दिया, “ क्या करूं आके मैं खंडालापर अब जाने का मन बना लिया


बम्बई और पूना दोनों तरफ़ के रॉकरस की एक्साइट्मेट देखते ही बनती थीवहीं नेट पर रोज सब इन्तमाजात की जानकारी, लोगों के सुझाव, जो नहीं रहे थे उनकी निराशा, सब था वंहाआखिर वो इतवार ही गयानवी मुम्बई से हम तीन जन चढ़ने वाले थे, एक और सद्स्य हैं 40+ के जो इस बार के जमावड़े में नहीं सकते थे, पर उन्हों ने अपनी पत्नी को प्रोत्साहित किया था कि वो जरुर जाएँ, सो नीतू जी हमारे एरिआ से आने वाली थीं, हम उनको नहीं जानते थे, खैर! क्या शखसिय्त है जनाब ये नीतू जी की, मजा गयामिलते ही बोलीं कि आते आते उन्हें एक पंडित जी दिखाई दिए, धोती कुर्ते में लैसउन्हों ने भूत को पिछ्ले जमावड़े में ऐसे ही देखा था तो सोचा भूत है, उन्हें देर हो गयी है इस लिए इन्तजार कर रहा होगावो दूर से ही चिल्लायीं, “ हाय भूत”, अब वो पंडित जी का चेहरा देखने लायक थाअपनी गल्ती का एहसास होते ही नीतू जी बगलें झांक रही थींहंस हंस कर हमारे पेट में बल पड़ गयेइतने में बस गयीबस में बैठे ये अन्जान लोग ऐसे मिले जैसे हम बरसों पुराने मित्र होंहमारी झिझक एक मिनट में उड़न छू हो गयीचुहलबाजी, अन्ताक्शरी के दौर चल पड़े, गरमा गरम समोसों के साथपूना के रास्ते में दो तीन लंबी सुरंगो से गुजरना पड़ता है, किसी ने सुझाया कि सुंरग में गाने की आवाज ऊँची कर दी जाए और उसकी प्रतिध्वनी सुनी जाएबस फ़िर क्या था, सुंरग टूट कर हमारी बस पर नहीं गिरी यही गनिमत हैइतना सिली आइडिया, पर कितना आंनद आया ऐसी बचकानी हरकत करने में



वहाँ पूना वाले भी ऐसे मिले जैसे बरसों से जानते होंकुल मिला कर हम 30 जन थेकुछ के जीवन साथी ऑर्कुट के सद्स्य होते हुए भी आये थेतो कोई अपने छोटे बच्चों को भी लाई थींहॉट्ल से घाटी का द्र्श्य इतना मनोरम था कि बस मन करता था कि बरसाती झरने को ही देखते रहोवहाँ एक बड़े से कमरे का इन्तजाम किया गया था



शुरु हुआ कुछ गेम्स खेलने का दौर- सबसे पहले एक दूसरे परिचित होने के लिए ये खेल खेला गया कि सब जन एक घेरा बना कर बैठ जाएं फ़िर एक जन शुरुवात करेगा, अपना नाम बोलेगा और साथ में कोइ विशेषण लगाए, फ़िर दूसरा जन पहले वाले का नाम और विशेषण बोले और फ़िर अपना नाम और विशेषण, यानि कि 30स्वें जन को बाकी 29जन के नाम और विशेषण बताने थे और फ़िर अपना नाम और विशेषण, इनाम भी रक्खा गया था(जो हमें मालूम नहीं था) बिना एक भी गल्ती किए जो सब नाम और विशेषण दोहरा देदिन के पहले ही गेम में इनाम जीतते हुए हमें बहुत अच्छा लगा, और हमारे हर्ष का ठिकाना रहा जब इनाम में शुभा(पूना से आई रॉकर) ने अपने हाथों से पेन्ट किया हुआ एक कप हमें दिया जिस पर 40+ कम्युनटी का पह्चान चिन्ह पेन्ट किया हुआ थाफ़िर शुरु हुआ सगींत और डांस का प्रोग्राम। 40 साल से ले कर 65 साल के सभ्रांत स्त्री पुरुष थिरक रहे थेकजरारे, बिड़ी जलई ले, नच बलिए, और जाने कौन कौन से गीतों की धुन परउस समय पहली बार नाच जानने का रंज हो रहा था, अब सीखूंगी


नीरज जी पूना से सपत्नी आए थेउनकी पत्नी भी जरा झेंपू टाइप की थीं हमारे जैसे, सो उन्होंने हमारे साथ बैठ्ने ने ही अपनी भलाई समझीबातों बातों में पता चला कि नीरज जी और नीरु जी( उनकी पत्नी) दोनों अलिगढ़ से हैं, सुन कर मेरी तो बाछें खिल गयीं, बचपन की यादें ताजा हो आयीं, नीरू जी भी उसी स्कूल से पढ़ी हैं जिससे हम पढ़े थे, बस फ़िर क्या था हम यादों में अलिगढ़ घूम आयेतब तक नीरज जी पार्टी की जान बन चुके थे, ऐसा मधुर गला पाया है कि बस सुनते ही रहो



शाम के 6.30 बज चुके थे किसी का भी लौटने का मन था, पर लौटना तो था हीबस जैसे जैसे बम्बई के नजदीक पहुँच रही थी स्मिता प्लान बना रही थी कि हम सब साथ साथ एक पिक्चर देखने चलें और फ़िर खाना, मोबाइल नंबर लेने का दौर चलाघर पहुँचते ही हमने कम्पुय्टर ऑन कर दिया, पतिदेव बोले अरे अभी तो आई हो लेकिन हम ऑलरेडी उन लोगों को मिस कर रहे थे, लो क्या देखती हूँ, व्रंदा जो हमसे थोड़ा पहले उतरी थी उस का दोस्ती का पैगाम ऑर्कुट पर आया पढ़ा है, और शंकर जो पूना से आए थे उन्हों ने फोटोस अपलोड कर दी हैंऔर भी कई लोग अपने अपने संस्मरण लिख चुके थेमैं सोच रही थी हम सब 50 के है या 15 के

September 08, 2007

बैरी मन


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी





बैरी मन


दुनिया के रेले, आते जाते लोग,

सड़क किनारे बैठे हम अकेले,

उड़ती सी नजर, ठिठके कदम,

जाते अपने रास्ते,

कौतुहल, खिलती मुस्कान,

दौस्ताना फ़ैले हाथ,

कछुए सी खुद में सिमटना,

कैसे भूलूँ,

वो सब कुछ कदम हम कदम,

कर गये मुझे,

अपने ही अधेंरों में गुम,

नीलकठं सा बैरी मन,

आज भी दूसरों की पीड़ा से

इसका गहराता नीला रंग,

हसीं की खनक से जब कोई

कछुए का खोल टकटकाता है,

तू सब भूल जाता है,

रस्सी छुड़ाए बैल सा बाहर निकल आता है,

कितना समझाया,

अब बस कर,

ये गिरने पड़ने का खेल,

अब इन हड्डियों में तेरी चोटें सहने की ताब कहाँ,

खुशी, इमानदारी सब कोरी मर्गतर्षणा हैं,

सच है सिर्फ़ धोखा, खुदगर्जी,

झूठ से प्यार कर,

खुशी मिले या न मिले,

चोट तो न खायेगा!!

September 03, 2007

अपराधी कौन

अपराधी कौन

कल का TOI पढ़ रही थी, फ़्रटं पेज पर ही खबर छपी थी कि एक स्कूली छात्र ने अपने ही सहपाठी का कत्ल सिर्फ़ इस लिए कर दिया कि एक दिन स्कूल में छुट्टी हो जाए। मन क्षुब्ध हो गया। उसके एक दिन पहले ही तो अदनान के खून के बारे में पड़ा था, जिसका खून उस के दोस्तों ने 2 करोड़ की फ़िरौती की लालसा में कर दिया था।
अचानक यादों में कौंध गयी और कई वारदातें, 2/3 साल पहले बांद्रा के St. Andrew कालेज के छात्रों ने अपने ही दोस्त के घर जा कर उसकी माँ की ह्त्या कर दी,कुछ पैसों की ख़ातिर, और वो बोरीवली की तरफ़ का केस, जँहा कुछ छात्रों ने पैसों की खातिर, अपनी पड़ोसन,उसके एक साल के नाति, और गर्भवती बेटी की निर्मम ह्त्या कर दी।

मन सोचने लगा, बाल- अपराध की खबरें जो टी वी पर अमेरिका में फ़ैलती महामारी के रूप में देखते थे आज हमारे घर प्रवेश कर चुकी है। देश की भविष्य पौध में ये कीड़ा कैसे और क्युं कर लग गया? अखबारों में जब देश की बड़ती जी डी पी के बारे में पढ़ते हैं तो सकून मिलता है कि चलो अपनी तो कट गयी, अब हमारे बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है। पर उसी खबर के साथ जब चोरी, डकैती, मार-धाड़,बलात्कार, और न जाने क्या क्या , वो भी इन बच्चों के हाथों, पढ़ते हैं तो दिल काँप उठता है। क्या अब समाज विरोधी (antisocial)/ मनोरोगी (psychopathic) व्यक्तित्व की पौध तैयार हो रही है जो कोई भी अपराध कर गुजरने को तैयार है और जरा भी पछ्तावा नहीं होता। अदनान के मित्रों को ही ले लिजिए, उन्हें अपने किए का जरा भी पछतावा नहीं। अगर इन खबरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अपराधी ज्यादातर सपंन्न परिवारों से है।

सवाल ये उठता है कि क्युं ये किशोर अपराध की ओर अग्रसर हो जाते हैं? कोई भी बच्चा जन्मजात अपराधी नहीं होता, हालांकि कुछ केस में गुणसूत्रों की असमानता अपराधी प्रवती का कारण हो सकती है, पर ये अपवाद हैं।

अदनान के केस में पहले ऐसा माना जा रहा था कि उसे घर से बाहर बुलाने में उसकी ओर्कुट की दोस्त अन्जेल का हाथ था, बाद में यह गलत साबित हुआ पर मीडिया में एक बहस छिड़ गयी कि ओर्कुट जैसी सोशल साइट्स पर कोई अकुंश होना चाहिए या नहीं। क्या विर्चुल दुनिया हमारी युवा पीडी का सर्वनाश कर रही है?

आजकल मीडिया वाले ओर्कुट को बड़ते किशोर अपराध का जिम्मेदार ठहरा रहें हैं, पर क्या इसका जवाब सीधे सीधे हाँ या ना में दिया जा सकता है? क्या ये युवा वर्ग के बड़ते गुनाह बदले समाजिक मुल्यों का आइना नहीं? असली कारण तो कुछ और ही लगते हैं जैसे हमारा समाजिक ढाचाँ, आज की जीवन शैली, बदलते समाजिक मूल्य, टूटते परिवार, शिक्षण प्रणाली, इत्यादि।

अब देखिए ना आजकल जोइन्ट फ़ेमिली में रहना पुराना फ़ैशन माना जाता है। अगर कोई जोइन्ट फ़ेमिली में रहना भी चाहे तो उन्हें बड़ी बेचारगी की नजर से देखा जाता है। लोग न सिर्फ़ नुयकिलर फ़ेमली में रहना पसंद करते हैं, बल्कि अगर कोई महिला सिर्फ़ ग्रहणी बन कर रहना चाहे तो लोग उसे नक्कारा समझते है। लिहाजा आज हर दम्पति ये मान कर चलता है कि दोनों का काम पर जाना जिन्दगी की बुनयादी जरूरत है। लोगों के पास वक्त की इतनी कमी है कि बच्चे पैदा करने का भी टाइम नहीं। परसों की अखबार में पढ़ रही थी कि बैंग्लोर में नव दम्पति अपने अपने sperm sperm bank में जमा करा देते हैं और फ़िर भविष्य में जब देवी जी को छुट्टी मिले और कुछ वक्त हो वो जा कर artificial insemination के द्वारा गर्भवती हो जाती है जब की पतिदेव अमेरिका में बिल गेट्स की चाकरी कर रहे होते हैं।
पैदा होते ही बच्चे पिंग पोंग गेंद बन जाते हैं, कभी नानी के पास तो कभी क्रेश में और कभी नौकरों के सहारे और अगर माता पिता वहन कर सकें तो बोर्डिग में। अब इन पिंग पोंग बने बच्चों की शारीरिक और कुछ हद्द तक मानसिक जरूरतें तो पूरी की जाती हैं पर उनके नैतिक/आध्यात्मिक उत्थान को जरूरी नहीं समझा जाता। ये मान लिया जाता है कि जैसे सेक्स की जानकारी बच्चे अपने आप हासिल कर लेते हैं उसी तरह नैतिक विकास भी अपने आप हो ही जाता है। आखिरकार नानियों भी तो काम पर जाती हैं, अभी रिटायर कहाँ हुई हैं।

होश संभालते सँभालते बच्चों को ये एहसास होने लगता है कि वो माता पिता की व्यस्त जिंदगी में एक मुसीबत से ज्यादा कुछ भी नही। सुबह शाम दरवाजों से अंदर-बाहर भागते माता पिता की फ़्लाइंग किस्सिस उन्हें आश्वस्त नहीं करते, अकेलेपन और नकारेपन को और गहरा देते हैं। माँ की दुलार भरी अवाज के बदले आ गयी हैं फ़्रिज पर चिपकी हिदायतों की चिन्न्दियाँ- खाना गरम कर के खाना, किसी को दरवाजा नहीं खोलना, इत्यादि,इत्यादि। बच्चों के साथ गुजारने का वक्त टाइम टेबल से बंधा है और उस वक्त में भी नसीहतें, डांट-डपट ज्यादा- तुम ये भी नहीं कर सकते, वो भी नहीं कर सकते। बच्चों का आत्म विश्वास और आत्म सम्मान छिन्न छिन्न कर तोड़ती। बच्चे पहले आत्मग्लानी और फ़िर विद्रोह से भर उठते हैं।
रिसर्च स्डीज बताती हैं कि अगर पिता अपनी व्यस्तता के चलते जरूरत के वक्त घर पर न हों, माँ बहुत रोबिली और जिद्दी स्वभाव की हो, आवश्कता से अधिक कड़ा अनुशासन और मार पीट हो, बच्चे अपने आप को तिरस्कर्त महसूस करें तो मन के तार जुड़ें कैसे?

दुनिया में बिरला ही कोई ऐसा बच्चा होगा जो अपने माँ बाप के व्यक्तित्व से प्रभावित न होता हो और उनके नक्शे कदम पर न चलना चाहता हो। अगर पिता शराबी हो, निर्दय, निर्मम हो, समाज विरोधी आचरण में समझदारी समझते हो, कानून तोड़ना या अपनी प्रतिष्ठा का प्रयोग कर कानून को अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ लेना , ये जताना कि दुनिया में पैसे से सब खरीदा जा सकता है, सेक्सुयल इमोर्लटी कोई बड़ी बात नहीं, झूठ फ़रेब आगे बढ़ने के लिए जरूरी हैं तो बच्चों का आचरण कैसा होगा उसका अनुमान लगाने की जरूरत नहीं।
1) माता पिता समझ नहीं पा रहे कि बच्चों के साथ कैसा रवैया रखना चाहिए, कितनी आजादी दें और कितना अकुंश रखें। पश्च्मी सभ्यता का अनुसरन करते हुए बच्चों को पैदा होते ही अपने बराबरी का दर्जा देते हुए दोस्ताना सबध रखें या व्यस्क होने तक अनुशासन में। ये दुविधा उच्चस्तिर्य माता पिता को ज्यादा है। अति कठोर अनुशासन या अति ढीलाई माता पिता की अंसमजता की निशानी है और बच्चों के बिगड़ने का पक्का रास्ता। अब अदनान का ही केस देखें,उसने बाहर से फोन कर दिया कि मैं पूल खेल रहा हूँ और रात को नहीं लौटूंगा। क्या इतनी छूट पहले दी जाती थी?माँ बाप हजार सवाल पूछ्ते थे-किसके घर, कौन लोग?
उसके रिश्तेदारों का कहना है कि 12 वर्ष की आयु से ही अदनान मर्स्डीज चलाता था और हाई स्पीड पर चलाना उसका शौक था, ओर्कुट पर उसने एक फोटो डाली हुई थी जिसमें उस का स्पीडोमीटर 180 का वेग दिखा रहा था पर उसके मरने के बाद भी उसकी माँ को इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती। 12 वर्ष की आयु से ही वो शराब पीता था और 5000 से 10000 रुपये रोज गेम खेलने और दोस्तों पर लुटाता था, ये पैसे का प्रद्र्शन ही अंत में उसकी मौत का कारण बना। दोस्तों ने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही काटने का प्लान बना लिया। इन्हीं दोस्तों ने, जिन्होंने उसका कत्ल किया , कुछ महीने पहले उसके मोबाइल पर हाथ साफ़ कर चुके थे, और अदनान इस बात को जानता था, फ़िर भी उसने उन दोस्तों के साथ दोस्ती बरकरार रखी। क्या सोच कर? ये जान कर भी उसको मन विचलित क्युं न हुआ? आज भी उसके माँ बाप ऐसा नहीं मानते कि अपने लाइफ़ स्टाइल की वजह से उसकी ह्त्या हुई। हाँ मीडिया के पूछ्ने पर अब अदनान के पिता दूसरे माता पिता को सलाह दे रहें हैं कि बच्चों पर नजर रखो, उनके दोस्त कौन हैं, इस पर नजर रखो।
सिर्फ़ इतना ही नहीं, आज हर माँ बाप दिजाइनर बच्चा चाहते हैं- विश्व्नाथ आंनद, सचिन तेन्दुलर, अमिताभ बच्चन और नारायण मूर्ति का मिश्रण्। औसत बच्चों के लिए घर पर भी ठौर नहीं। औसत से ज्यादा वाले बच्चों को भी शांती नहीं, उनसे भी उम्मीद की जाती है ऊँची और ऊंची ऊंचायी हासिल करो। मुझे याद है, ,मेरी एक ऐसी ही महत्वाकांक्षी सहेली अपना दुखड़ा रो रही थी कि उसका 9 वर्षिय लड़का competitive प्रवति का नहीं, aggressive और dominant type का नहीं, बस में सब को चढ़ जाने देता है फ़िर चढ़ता है। मरी सहेली को डर था कि बाद में लोग उस पर पावँ रख आगे बढ़ जाएगें। बच्चे के तनाव का अन्दाजा लगाना कोई मुश्किल नहीं।
जिंदगी में एक ही चीज महत्त्वपूर्ण रह गयी है-पैसा। और इन मूल्यों को बढ़ावा देने में मिडिया का भी बहुत बड़ा हाथ है, पर उसके बारे में फ़िर कभी।
खेलकूद समाजिक और नैतिक मूल्यों के पनपने का मूलभूत आधार होते हैं। जब मनोरजंन के साधन अपर्याप्त हों, सही न हों, और अनियमित हों तो बच्चों का अपराध की तरफ़ अग्रसर होना लाजमी है। बढ़ती अनुशासन हीनता का एक कारण है हमारी शिक्षा प्रणाली, जो शिक्षा देने का मतलब समझती है दिमाग रुपी बोरी में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान भरना, चरित्र बनाने की जिम्मेदारी माँ बाप और स्कूलों के बीच पिंग पोंग की गेंद बन कर रह गयी है।
बड़े शहरों में जहाँ जगह की इतनी कमी है, ज्यादातर स्कूल कालेजों में और कई जगह तो घर के पास भी खेल के मैदान नहीं होते, बच्चों के पास टी वी देखने या computer games खेलने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। माताएँ बच्चों की चें चें से बचने के लिए एक साल की उम्र से कार्टून चेनल के आगे बिठा देती हैं जो बाद में बड़े होते होते warcraft जैसे गेम्स में परिवर्तित हो जाते हैं। ये जग जाहिर बात है कि इन कार्टून चेनलों और गेम्स से ज्यादा violent और लती कोई प्रोग्राम नहीं। इन प्रोग्रामों को देखते देखते और विर्चुल गेम्स खेलते खेलते लोग असली नकली का फ़र्क भूल जाते हैं।

चलिए अब आते हैं कि आप पहचानेगे कैसे कि बच्चे मनोरोगी हो रहे हैं। ऐसे बच्चे किसी से ज्यादा मिलना पसंद नहीं करते सिर्फ़ अपने दोस्तों के, क्रूर, चिढ़चिढ़े, जिद्दी, आत्म केंद्रित ,सशंयी, अकेलेपन और बदला लेने की भावना से भरे हुए, अपने किसी भी कार्य से पश्चाताप न महसूस न करने वाले, दूसरों के दुख दर्द इन्हें दर्वित नहीं करते, सेक्सुअल आचरण पर कोई अंकुश नहीं, भावनात्मक रुप से अपरिपक्व, और आत्म हीनता की भावना से भरे हुए। इन्हें मदद की जरुरत है, प्रताड़ना की नहीं।