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September 03, 2007

अपराधी कौन

अपराधी कौन

कल का TOI पढ़ रही थी, फ़्रटं पेज पर ही खबर छपी थी कि एक स्कूली छात्र ने अपने ही सहपाठी का कत्ल सिर्फ़ इस लिए कर दिया कि एक दिन स्कूल में छुट्टी हो जाए। मन क्षुब्ध हो गया। उसके एक दिन पहले ही तो अदनान के खून के बारे में पड़ा था, जिसका खून उस के दोस्तों ने 2 करोड़ की फ़िरौती की लालसा में कर दिया था।
अचानक यादों में कौंध गयी और कई वारदातें, 2/3 साल पहले बांद्रा के St. Andrew कालेज के छात्रों ने अपने ही दोस्त के घर जा कर उसकी माँ की ह्त्या कर दी,कुछ पैसों की ख़ातिर, और वो बोरीवली की तरफ़ का केस, जँहा कुछ छात्रों ने पैसों की खातिर, अपनी पड़ोसन,उसके एक साल के नाति, और गर्भवती बेटी की निर्मम ह्त्या कर दी।

मन सोचने लगा, बाल- अपराध की खबरें जो टी वी पर अमेरिका में फ़ैलती महामारी के रूप में देखते थे आज हमारे घर प्रवेश कर चुकी है। देश की भविष्य पौध में ये कीड़ा कैसे और क्युं कर लग गया? अखबारों में जब देश की बड़ती जी डी पी के बारे में पढ़ते हैं तो सकून मिलता है कि चलो अपनी तो कट गयी, अब हमारे बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है। पर उसी खबर के साथ जब चोरी, डकैती, मार-धाड़,बलात्कार, और न जाने क्या क्या , वो भी इन बच्चों के हाथों, पढ़ते हैं तो दिल काँप उठता है। क्या अब समाज विरोधी (antisocial)/ मनोरोगी (psychopathic) व्यक्तित्व की पौध तैयार हो रही है जो कोई भी अपराध कर गुजरने को तैयार है और जरा भी पछ्तावा नहीं होता। अदनान के मित्रों को ही ले लिजिए, उन्हें अपने किए का जरा भी पछतावा नहीं। अगर इन खबरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अपराधी ज्यादातर सपंन्न परिवारों से है।

सवाल ये उठता है कि क्युं ये किशोर अपराध की ओर अग्रसर हो जाते हैं? कोई भी बच्चा जन्मजात अपराधी नहीं होता, हालांकि कुछ केस में गुणसूत्रों की असमानता अपराधी प्रवती का कारण हो सकती है, पर ये अपवाद हैं।

अदनान के केस में पहले ऐसा माना जा रहा था कि उसे घर से बाहर बुलाने में उसकी ओर्कुट की दोस्त अन्जेल का हाथ था, बाद में यह गलत साबित हुआ पर मीडिया में एक बहस छिड़ गयी कि ओर्कुट जैसी सोशल साइट्स पर कोई अकुंश होना चाहिए या नहीं। क्या विर्चुल दुनिया हमारी युवा पीडी का सर्वनाश कर रही है?

आजकल मीडिया वाले ओर्कुट को बड़ते किशोर अपराध का जिम्मेदार ठहरा रहें हैं, पर क्या इसका जवाब सीधे सीधे हाँ या ना में दिया जा सकता है? क्या ये युवा वर्ग के बड़ते गुनाह बदले समाजिक मुल्यों का आइना नहीं? असली कारण तो कुछ और ही लगते हैं जैसे हमारा समाजिक ढाचाँ, आज की जीवन शैली, बदलते समाजिक मूल्य, टूटते परिवार, शिक्षण प्रणाली, इत्यादि।

अब देखिए ना आजकल जोइन्ट फ़ेमिली में रहना पुराना फ़ैशन माना जाता है। अगर कोई जोइन्ट फ़ेमिली में रहना भी चाहे तो उन्हें बड़ी बेचारगी की नजर से देखा जाता है। लोग न सिर्फ़ नुयकिलर फ़ेमली में रहना पसंद करते हैं, बल्कि अगर कोई महिला सिर्फ़ ग्रहणी बन कर रहना चाहे तो लोग उसे नक्कारा समझते है। लिहाजा आज हर दम्पति ये मान कर चलता है कि दोनों का काम पर जाना जिन्दगी की बुनयादी जरूरत है। लोगों के पास वक्त की इतनी कमी है कि बच्चे पैदा करने का भी टाइम नहीं। परसों की अखबार में पढ़ रही थी कि बैंग्लोर में नव दम्पति अपने अपने sperm sperm bank में जमा करा देते हैं और फ़िर भविष्य में जब देवी जी को छुट्टी मिले और कुछ वक्त हो वो जा कर artificial insemination के द्वारा गर्भवती हो जाती है जब की पतिदेव अमेरिका में बिल गेट्स की चाकरी कर रहे होते हैं।
पैदा होते ही बच्चे पिंग पोंग गेंद बन जाते हैं, कभी नानी के पास तो कभी क्रेश में और कभी नौकरों के सहारे और अगर माता पिता वहन कर सकें तो बोर्डिग में। अब इन पिंग पोंग बने बच्चों की शारीरिक और कुछ हद्द तक मानसिक जरूरतें तो पूरी की जाती हैं पर उनके नैतिक/आध्यात्मिक उत्थान को जरूरी नहीं समझा जाता। ये मान लिया जाता है कि जैसे सेक्स की जानकारी बच्चे अपने आप हासिल कर लेते हैं उसी तरह नैतिक विकास भी अपने आप हो ही जाता है। आखिरकार नानियों भी तो काम पर जाती हैं, अभी रिटायर कहाँ हुई हैं।

होश संभालते सँभालते बच्चों को ये एहसास होने लगता है कि वो माता पिता की व्यस्त जिंदगी में एक मुसीबत से ज्यादा कुछ भी नही। सुबह शाम दरवाजों से अंदर-बाहर भागते माता पिता की फ़्लाइंग किस्सिस उन्हें आश्वस्त नहीं करते, अकेलेपन और नकारेपन को और गहरा देते हैं। माँ की दुलार भरी अवाज के बदले आ गयी हैं फ़्रिज पर चिपकी हिदायतों की चिन्न्दियाँ- खाना गरम कर के खाना, किसी को दरवाजा नहीं खोलना, इत्यादि,इत्यादि। बच्चों के साथ गुजारने का वक्त टाइम टेबल से बंधा है और उस वक्त में भी नसीहतें, डांट-डपट ज्यादा- तुम ये भी नहीं कर सकते, वो भी नहीं कर सकते। बच्चों का आत्म विश्वास और आत्म सम्मान छिन्न छिन्न कर तोड़ती। बच्चे पहले आत्मग्लानी और फ़िर विद्रोह से भर उठते हैं।
रिसर्च स्डीज बताती हैं कि अगर पिता अपनी व्यस्तता के चलते जरूरत के वक्त घर पर न हों, माँ बहुत रोबिली और जिद्दी स्वभाव की हो, आवश्कता से अधिक कड़ा अनुशासन और मार पीट हो, बच्चे अपने आप को तिरस्कर्त महसूस करें तो मन के तार जुड़ें कैसे?

दुनिया में बिरला ही कोई ऐसा बच्चा होगा जो अपने माँ बाप के व्यक्तित्व से प्रभावित न होता हो और उनके नक्शे कदम पर न चलना चाहता हो। अगर पिता शराबी हो, निर्दय, निर्मम हो, समाज विरोधी आचरण में समझदारी समझते हो, कानून तोड़ना या अपनी प्रतिष्ठा का प्रयोग कर कानून को अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ लेना , ये जताना कि दुनिया में पैसे से सब खरीदा जा सकता है, सेक्सुयल इमोर्लटी कोई बड़ी बात नहीं, झूठ फ़रेब आगे बढ़ने के लिए जरूरी हैं तो बच्चों का आचरण कैसा होगा उसका अनुमान लगाने की जरूरत नहीं।
1) माता पिता समझ नहीं पा रहे कि बच्चों के साथ कैसा रवैया रखना चाहिए, कितनी आजादी दें और कितना अकुंश रखें। पश्च्मी सभ्यता का अनुसरन करते हुए बच्चों को पैदा होते ही अपने बराबरी का दर्जा देते हुए दोस्ताना सबध रखें या व्यस्क होने तक अनुशासन में। ये दुविधा उच्चस्तिर्य माता पिता को ज्यादा है। अति कठोर अनुशासन या अति ढीलाई माता पिता की अंसमजता की निशानी है और बच्चों के बिगड़ने का पक्का रास्ता। अब अदनान का ही केस देखें,उसने बाहर से फोन कर दिया कि मैं पूल खेल रहा हूँ और रात को नहीं लौटूंगा। क्या इतनी छूट पहले दी जाती थी?माँ बाप हजार सवाल पूछ्ते थे-किसके घर, कौन लोग?
उसके रिश्तेदारों का कहना है कि 12 वर्ष की आयु से ही अदनान मर्स्डीज चलाता था और हाई स्पीड पर चलाना उसका शौक था, ओर्कुट पर उसने एक फोटो डाली हुई थी जिसमें उस का स्पीडोमीटर 180 का वेग दिखा रहा था पर उसके मरने के बाद भी उसकी माँ को इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती। 12 वर्ष की आयु से ही वो शराब पीता था और 5000 से 10000 रुपये रोज गेम खेलने और दोस्तों पर लुटाता था, ये पैसे का प्रद्र्शन ही अंत में उसकी मौत का कारण बना। दोस्तों ने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही काटने का प्लान बना लिया। इन्हीं दोस्तों ने, जिन्होंने उसका कत्ल किया , कुछ महीने पहले उसके मोबाइल पर हाथ साफ़ कर चुके थे, और अदनान इस बात को जानता था, फ़िर भी उसने उन दोस्तों के साथ दोस्ती बरकरार रखी। क्या सोच कर? ये जान कर भी उसको मन विचलित क्युं न हुआ? आज भी उसके माँ बाप ऐसा नहीं मानते कि अपने लाइफ़ स्टाइल की वजह से उसकी ह्त्या हुई। हाँ मीडिया के पूछ्ने पर अब अदनान के पिता दूसरे माता पिता को सलाह दे रहें हैं कि बच्चों पर नजर रखो, उनके दोस्त कौन हैं, इस पर नजर रखो।
सिर्फ़ इतना ही नहीं, आज हर माँ बाप दिजाइनर बच्चा चाहते हैं- विश्व्नाथ आंनद, सचिन तेन्दुलर, अमिताभ बच्चन और नारायण मूर्ति का मिश्रण्। औसत बच्चों के लिए घर पर भी ठौर नहीं। औसत से ज्यादा वाले बच्चों को भी शांती नहीं, उनसे भी उम्मीद की जाती है ऊँची और ऊंची ऊंचायी हासिल करो। मुझे याद है, ,मेरी एक ऐसी ही महत्वाकांक्षी सहेली अपना दुखड़ा रो रही थी कि उसका 9 वर्षिय लड़का competitive प्रवति का नहीं, aggressive और dominant type का नहीं, बस में सब को चढ़ जाने देता है फ़िर चढ़ता है। मरी सहेली को डर था कि बाद में लोग उस पर पावँ रख आगे बढ़ जाएगें। बच्चे के तनाव का अन्दाजा लगाना कोई मुश्किल नहीं।
जिंदगी में एक ही चीज महत्त्वपूर्ण रह गयी है-पैसा। और इन मूल्यों को बढ़ावा देने में मिडिया का भी बहुत बड़ा हाथ है, पर उसके बारे में फ़िर कभी।
खेलकूद समाजिक और नैतिक मूल्यों के पनपने का मूलभूत आधार होते हैं। जब मनोरजंन के साधन अपर्याप्त हों, सही न हों, और अनियमित हों तो बच्चों का अपराध की तरफ़ अग्रसर होना लाजमी है। बढ़ती अनुशासन हीनता का एक कारण है हमारी शिक्षा प्रणाली, जो शिक्षा देने का मतलब समझती है दिमाग रुपी बोरी में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान भरना, चरित्र बनाने की जिम्मेदारी माँ बाप और स्कूलों के बीच पिंग पोंग की गेंद बन कर रह गयी है।
बड़े शहरों में जहाँ जगह की इतनी कमी है, ज्यादातर स्कूल कालेजों में और कई जगह तो घर के पास भी खेल के मैदान नहीं होते, बच्चों के पास टी वी देखने या computer games खेलने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। माताएँ बच्चों की चें चें से बचने के लिए एक साल की उम्र से कार्टून चेनल के आगे बिठा देती हैं जो बाद में बड़े होते होते warcraft जैसे गेम्स में परिवर्तित हो जाते हैं। ये जग जाहिर बात है कि इन कार्टून चेनलों और गेम्स से ज्यादा violent और लती कोई प्रोग्राम नहीं। इन प्रोग्रामों को देखते देखते और विर्चुल गेम्स खेलते खेलते लोग असली नकली का फ़र्क भूल जाते हैं।

चलिए अब आते हैं कि आप पहचानेगे कैसे कि बच्चे मनोरोगी हो रहे हैं। ऐसे बच्चे किसी से ज्यादा मिलना पसंद नहीं करते सिर्फ़ अपने दोस्तों के, क्रूर, चिढ़चिढ़े, जिद्दी, आत्म केंद्रित ,सशंयी, अकेलेपन और बदला लेने की भावना से भरे हुए, अपने किसी भी कार्य से पश्चाताप न महसूस न करने वाले, दूसरों के दुख दर्द इन्हें दर्वित नहीं करते, सेक्सुअल आचरण पर कोई अंकुश नहीं, भावनात्मक रुप से अपरिपक्व, और आत्म हीनता की भावना से भरे हुए। इन्हें मदद की जरुरत है, प्रताड़ना की नहीं।




7 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया जानकारी!!
शुक्रिया, ऐसे ही ज्ञानवर्धन करते रहें

Mired Mirage said...

आपने एक ऐसा मुद्दा उठाया है जिसपर बातचीत होना आवश्यक है । कई बातों से मैं सहमत हूँ कई से नहीं । पर इस विषय पर अभी बहुत सोचना बाँकी है ।
घुघूती बासूती

Basant Arya said...

अनीताजी, आपका लंबा लेख और आपके विचार, आपकी चिन्ता से अवगत हुआ. आपके विचार मुझे स्तब्ध कर गये. आपकी सक्रियता और लगन से मुझे बडी प्रेरणा मिली है. शुभकामनाये

Rajesh said...

A very important MUDDA is raised here by you Dear Anita ji. Reality yahi hai ki hamare aaj ke samaj ka jo dhancha ban gaya hai usi ke chalte yah sab BAAL APRAADH aakaar le rahe hai. Parents ke paas samay ki kami aur paiso ki jyada amdani, phir unhi paison ko aur badhane ki lagi hui hodd aaj bachhon ko yah avkaash de rahe hai. You have rightly said about the joint families too. If people live in joint families their wards will be taken care by the elders in their own absence.

ORKUT, YAHOO, GMAIL are the social sites which have been formed unanumously by their founders with a good intention, but such teens have changed its intention and made these platforms very dirty n worse.
The parents will have to be alert now for their wards whom they give as much money as needed by them but will have to watch them carefully, cautiously. And if need arises, they should stop such children doing any harm both to themselves and to the society also. I hope let more n more people join this debate n some fruitful results may come in.
Regards,

Anonymous said...

mam
your post has been marked for adults on chittah jagat
have you marked it , if yes then its ok other wise please get he tag removed from there
a a very valid point has been raised by you
rachna

parul k said...

aisey sajag karney vaaley lekh chhaptey rahney chahiye,aksar sab samjhtey hue bhi hum sacchayi se nazar churaa jaatey hain.anita di bahut dhanyavaad aapka.....aur ab mai chali apney bachhon ko cycling karvaaney............

Mrs. Asha Joglekar said...

अनिताजी, भधाई इतने विचार प्रवर्तक लेख के लिये । आपने सही लिखा है प्यार के अभाव में ही ये बच्चे कुंठा के शिकार हो जाते हैं और इसका विकल्प कहीं और ढूंढने लगते हैं, चाहे वह अर्कुट जैसी वेब साइट हो या गलत दोस्त । परिवार का सही वातावरण और प्रेम ही इसमें मददगार हो सकते हैं । मेरा ई-मेल है ashaj45@goole.com