सुस्वागतम
से पधारे हैं, आपको यह चिट्ठा कैसा लगा? अपनी बहूमूल्य राय से हमें जरूर अवगत करावें,धन्यवाद।
September 28, 2008
आवाज़: चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों
Posted by
anitakumar
at
9/28/2008 11:24:00 AM
12
टिप्पणियाँ अब तक
September 26, 2008
चाँद की सैर
चैन की सांस लेते हुए हमने धन्यवाद की मुस्कुराहट फ़ैंकी और लौट लिए। हाथ रेडियो की तरफ़ बढ़े, “नहीं, नहीं दोपहर को अभी इतने अच्छे गाने नहीं आते न जो हमें चांद पर पहुंचा दें। वैसे भी ये चाँद की सैर बहुत महंगी है।”……है न?……J
Posted by
anitakumar
at
9/26/2008 09:50:00 PM
19
टिप्पणियाँ अब तक
श्रेणी किस्सागोई
September 14, 2008
जानने का हक है

जानने का हक है
आज की ताजा खबर ये है कि विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि हमारा दिमाग और मन छुट्टी से लौट रहे हैं। आज 14 सेप्टेंबर है, गणपति जी के जाने का दिन आ गया, हर साल की तरह इस साल भी बरखा की झड़ी लगी है। ऊपर की फ़ोटो हमारे कमरे की बैकसाइड है लेकिन इसमें बरसती बरखा का जो आनंद हम ले रहे हैं वो आप को दिखाई नहीं दे पाएगा। सागर जी ने बताया कि इस बार उन्होंने अपने घर गणपति जी जी आराधना हमारे ब्लोग पर लगी आरती से की। जान कर अच्छा लगा कि उन्हें भी ये आरती पसंद आयी।
नीरज जी का न्यौता
हमें याद आ रहा है 7 सितंबर, इस महिने का पहला इतवार्। सितंबर शुरु होते ही नीरज भाई का न्यौता आया था "अनिता जी आते इतवार को खपोली में कवि सम्मेलन का आयोजन किया है आप जरूर आइयेगा।" न्यौता आने के ठीक एक मिनिट पहले हम उनके बलोग पर खपौली में बहते बरसाती झरनों का आनंद उठा कर आ रहे थे। ऐसी बरसात और ऐसे झरनों को देख किसका मन न मचल उठेगा। मन तो ललचाया लेकिन अकेले इतनी दूर हम कभी गये नहीं । विनोद जी को पूछा " ले चलोगे?" बोले कोई ओप्शन है क्या? हम हंस दिये।
अभी जाने में एक सप्ताह बाकी था, दो दिन बाद कुलवंत जी का फ़ोन आया, खपौली चलने का न्यौता दोहराते हुए कहा कि बम्बई से कुछ पंद्रह लोग जा रहे हैं इस लिए हम बस कर रहे हैं । हमने कहा हम भी फ़िर बस में ही चलेगें। सिर्फ़ प्रकृति के साथ ही नहीं लोगों के साथ भी तो जुड़ना था। विनोद जी को पता चला तो उन्होंने राहत की सांस ली। हमारे बहुत ललचाने पर भी वो किसी कवि सम्मेलन को झेलने के लिए तैयार न थे। ये सोचते हुए कि हर आदमी को हफ़्ते भर कड़ी मेहनत करने के बाद एक दिन अपनी मर्जी से बिताने का हक्क है हमने भी साथ आने पर जोर नहीं दिया।
वो इतवार आ ही गया। इंद्र देव हम पर मेहरबान थे, रास्ते भर बरसात की फ़ुहारों का मजा लेते अंताक्षरी खेलते करीब डेढ़ घंटे में हम खपौली पहुंचे। खेल तो रहे थे अंतक्षारी लेकिन मन ही मन बस में बैठे सहयात्रियों पर नजर डाली तो देखा सिर्फ़ एक लड़की, महिमा ,को छोड़ दें तो सब या तो पचास पच्च्पन को छू रहे थे या उससे भी कहीं आगे निकले हुए थे। गाने वालों में महिमा ही सबसे खामोश थी बाकी सब बेसुरे गा रहे थे।
बैरन यादाश्त
भूषण स्टील पहुंचते ही नीरज जी अपने कुछ साथियों के साथ गेस्ट हाउस के बाहर ही स्वागत करते मिले। दुआ सलाम होते ही हम सब के आराम करने के लिए कई कमरे खोल दिए गये। मैं, महिमा, आशा शर्मा जी और अनामिका शाहनी एक कमरे में थी बाद में रेखा रौशनी जी भी हमारे कमरे में आ गयीं। एक बजे का वक्त, चाय के शुरुआती दौर के साथ आपस में परिचय का दौर चला। कुछ देर बाद अनामिका जी ने हमसे पूछा आप ने आशा जी को नहीं पहचाना? हमने ध्यान से उनकी तरफ़ देखा, दिमाग पर बहुत जोर दिया, कहीं किसी कवि सम्मेलन में, किसी ब्लोग पर देखा है क्या? लेकिन क्या करें हमारे दिमाग और मन की तरह हमारी यादाश्त भी हमारे बस में नहीं रहती ऐन मौके पर दगा दे जाती है। हमसे कुछ शर्मसार होते हुए हल्की सी मुस्कुराहट के साथ ना में सर हिलाया।
अनामिका: अरे ये बहुत सारी फ़िल्मों में और टी वी सिरियलों में आ चुकी हैं अमिताभ बच्चन की मां का रोल भी निभा चुकी हैं। हमने आखें चौड़ी कर अपनी यादाश्त को झकझोरने की कौशिश की लेकिन वो टस से मस नहीं हुई। आशा जी ने हल्की सी मुस्कुराहट से हमें माफ़ किया। हमने उन्हें न पहचानने के अपराध की क्षमा मांगी और उन्हों ने तपाक से माफ़ कर दिया। जो हमने उनसे नहीं कहा वो ये कि जब हम अमिताभ बच्चन की फ़िल्म देखते हैं तो सिर्फ़ अमिताभ बच्चन को देखेगें न उसकी मां को थोड़े ही देखेगें। खैर, इस परिचय कार्यक्र्म के बाद खाने का दौर आया और फ़िर वापस हम अपने अपने कमरों में। कवि सम्मेलन शाम को 4 बजे शुरु होना था। अब गप्पबाजी का दौर चला। अनामिका जी किसी और कमरे में चली गयीं जहां उनके एक दूसरे मित्र ठहरे हुए थे।
आप की आवाज
आशा जी से गपियाते हुए हमने जो एक बात नोट की वो ये कि उनके व्यवहार में,वेश भूषा में, बातचीत में लेशमात्र भी फ़िल्मीपन नहीं था। एक बार भी उन्होंने ये जताने की कौशिश नहीं की कि वो फ़िल्मों से जुड़ी हैं और फ़िल्म आर्टिस्ट्स ऐसोशिएन कार्य समिति की मेम्बर हैं। उलटे वो हमारी ही तारिफ़ करने लगीं कि आप की आवाज सुन कर ऐसा लगता है कि आप अच्छा गाती होगीं, हमने हंस कर कहा जी गाती तो नहीं अल्बत्ता चिल्लाती जरूर हूँ। पलट कर पूछने लगीं फ़िल्मों में काम करोगी और हम ठठा कर हंस दिये लेकिन देखा वो तो एकदम सिरियस चेहरा लिए हमारी तरफ़ देखती रहीं। इतने में रेखा जी आ गयी और रेखा जी जहां हों वहां किसी और को बोलने का मौका मिलना मुश्किल है। बस यूं ही चार बज गये और हम सब हॉल में जा डटे।
दुर्घटना
मरियम गजाला, मिश्रा जी, कुलवंत जी, चेतन शाह, देवी नाग रानी, अनामिका जी, रेखा रौशनी जी, महिमा और भी न जाने कितने ही कवि वहां जमा थे। देवमणी पांडे जी ने मंच संभाला और एक एक कर कविताओं का दौर शुरु हुआ। हम इन शब्दों के सागर में आनंद विभोर होते मजे लूट रहे थे कि अचानक हम पर गाज आ गिरी जब देवमणी पांडे ने अचानक हमारा नाम ऐनाउंस कर दिया। हम हक्के बक्के उनको देख रहे थे, ये बिल्कुल अप्रत्याशित था, हम उन्हें इशारे से मना कर रहे थे कि तभी तपाक से हमें बुके भी पेश कर दिया गया, अब मरता क्या न करता कि तर्ज पर स्टेज पर जाना ही था। हम हाथ में कोई कविता लाए नहीं थे और याद हमें कुछ रहता नहीं है। मन कर रहा था कि धरती फ़ट जाए और हम उसमें समा जाए या जोर से तुफ़ान आ जाए और लोगों का ध्यान बंट जाए। हमने बड़ी असहाय नजर से देवमणि जी की तरफ़ देखा। बड़ी सहानुभूती जताते हुए बोले कि ठीक है आप अपना परिचय ही दे दिजिए, हम पता नहीं क्या बोल कर आ गये। बाद में कुलवंत जी और देवमणी जी ने हमसे माफ़ी मांगी कि इस तरह हमें ऐसी परिस्थति का सामना करना पड़ा। उन्हें इस बात का विश्वास था कि हर कवि अपनी जेब में अपनी एक दो कविताएं तो ले कर घूमता है और जैसे लोग बात बात में अपने विजिटिंग कार्ड निकाल कर बांटते हैं वैसे ही हर कवी हर जगह अपनी चार लाइना तो ठेलता ही रहता है। उनके हिसाब से हमें शुक्रगुजार होना चाहिए था कि हमें मौका दिया गया, अब उन्हें कैसे बताते कि हम तो कवि हैं ही नहीं न्। कविता सुनना और लिखना दो अलग अलग बाते हैं।खैर, सिर्फ़ इस दुर्घटना के सिवा दिन बहुत अच्छा बीता। नीरज जी की खातिरदारी देख कर ऐसा लगता था मानों हम सब बराती हैं जो बिना दुल्हे के आ गये हैं। वापस लौटने के समय ही पता चला कि जिस बस से हम इतने आराम से खपौली आये हैं और वापस जा रहे हैं वो नीरज जी की भेजी हुई है।
वापसी में देवमणी पांडे जी सबको एक दूसरे कवि सम्मेलन में आने का निमंत्रण दे रहे थे जो हमारे घर के पास ही नेरुल में होने वाला था। बात आयी गयी हो गयी। परसों अरविंद राही जी ने फ़ोन दनदनाया और उसी नेरुल वाले कवि सम्मेलन में आने का आग्रह किया, ये हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित सर्व भाषा साहित्य सम्मेलन था। इसमें भी कई कवि नजर आये। देवी नागरानी ने सिंधी में कविता पढ़ी तो महात्रे साहब ने मराठी में, विष्णु शर्मा ने पंजाबी में पढ़ी और किसी ने मैथली में। लेकिन सबसे ज्यादा आंनद आया हमें जफ़र रजा साहब को सुनने का।
उनके कुछ शेर जो मुझे याद रहे सुनिये
नफ़स नफ़स तुझे महसूस कर रहा हूँ मगर,
दिखाई देता है सदियों का फ़ासला मुझको।
सितम थी या कि अदा थी हिजाब था क्या था,
मेरे रहे मगर अपना नहीं कहा मुझको।
खुशनुमा दिन
वैसे कल का दिन बहुत ही खुशनुमा दिन था, सुबह एक वीडियों देखा था "जानने का हक" और ये मेरे जेहन में ऐसा अटका कि अब तक नहीं निकला। इसे देखा तो था राइट टू इन्फ़ोरमेशन के संदर्भ में, लेकिन इस ऐक्ट के बारे में लिखने का हक्क दिनेशराय द्विवेदी जी को है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि वो हमें इसके बारे में डिटेल में बतायेगें। अभी तो आप ये वीडियो देखें, मुझे पूरी उम्मीद हैं कि आप को भी अच्छा लगेगा, वैसे ये भी हो सकता है कि आप में से कइयों ने इसे पहले देखा होगा, लेकिन अच्छी चीज एक बार और देखी जा सकती है, है न?
Posted by
anitakumar
at
9/14/2008 11:49:00 AM
24
टिप्पणियाँ अब तक
श्रेणी लेख
September 02, 2008
मोरया रे बप्पा मोरया रे
मोरया रे बप्पा मोरया रे
कल गणेश चतुर्थी है। महाराष्ट्र में गणेश पूजा का महत्त्व उतना ही है जितना बंगाल में दुर्गा पूजा का। चारों तरफ़ हर्षोल्लास का वातावरण है, ये बिगुल है कि त्यौहारों का मौसम आ चला। अब बीच में श्राद्ध पक्ष को छोड़ दें तो दिवाली तक सब तरफ़ रौनक रहेगी। चतुर्थी तो कल है लेकिन अभी से सड़कों पर बजते ढोल मजींरों की आवाज हमारे अंदर के कमरे तक आ रही है।
कल सुबह से ही आरतियों का दौर जो शुरु होगा तो दस दिन तक थमेगा नहीं। जहां एक तरफ़ लता मंगेशकर के स्वर गूंजेगें वहीं अनूप जलोटा के स्वर भी पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। खास कर उनका एक भजन मुझे बहुत अच्छा लगता है
"जाना था गंगा पार प्रभु केवट की नाव चढ़े " इस भजन में केवट की हौशियारी को अनूप जलोटा ने इतना मजे ले कर गाया है कि जब भी सुनते है मुस्कराये बिना नहीं रह पाते। वैसे गणेश जी की आरती तो सब जगह ही होती है लेकिन मराठी में गणेश आरती इतनी मधुर है कि जिसे मराठी नहीं समझ आती वो भी झूमे बगैर नहीं रह सकता। मेरी पंसद की दो आरतियां मराठी में प्रस्तुत कर रही हूँ , आशा है आप को भी इन्हें सुनने में उतना ही मजा आयेगा जितना हमें आता हैं। हम तो ये दोनों आरतियां दस दिनों तक हर गली कूचे में सुनेगे और इनके साथ जाती हुई बरसात का आंनद भी लेगे। सोचा आप के साथ भी ये आंनद बांट लें
अगर आप को आरतियां अच्छी लगे और इसके बोल जानना चाहेगे तो मुझे युनूस जी के दरवाजे पर गुहार लगानी पड़ेगी…।:)
Posted by
anitakumar
at
9/02/2008 08:18:00 PM
18
टिप्पणियाँ अब तक
श्रेणी लेख











